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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 275

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १० ॥
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥
विश्वोत्पत्तिके कालमें जो था । गगन अंकुरसे खिलाथा ।
अंतमें अक्षर निगलाथा । प्रणव पटके ॥ ४० ॥
अब यह विश्वाकार रहता । विश्वके समानही है दीखता ।
महा-प्रलय दशामें है होता । निराकार ॥ ४१ ॥
ऐसा अनादि जो सहज । वह मैं ही हूं विश्व-बीज ।
हथेली पर वह आज । देता हूं तुझे ॥ ४२ ॥
इस पर पांडुकुमार । करेगा गंभीर विचार ।
इसका प्रभाव सुंदर । होगा श्रेष्ठ ॥ ४३ ॥
जाने दो अप्रासंगिक आलाप । अब न बोलूंगा ऐसा संक्षेप ।
जान तपस्वियोंमें है जो तप । वह रूप है मेरा ॥ ४४ ॥
बलियोंमें है जो बल । रहता है जो अचल ।
बुद्धिवंतोंमें केवल । बुद्धि है मैं ॥ ४५ ॥
भूतमात्रोंमें है जो काम । जिससे उत्कर्ष हो धर्म ।
मैं हूं कहता आत्माराम । जान निश्चल ॥ ४६ ॥
अन्यथा जो विकारोंके रूपमें । पडे इंद्रियानुकूल कर्ममें ।
किंतु धर्म-विरुद्ध पथमें । जाने नहीं देता ॥ ४७ ॥
शास्त्र निषिद्ध कर्मका जब कुपथ । तज चलता विहित कर्मका पथ ।
तब रहता नित मशालची साथ । धर्म-रूप ॥ ४८ ॥

बीज जो सब भूतोंमें वह हूं मैं सनातन ।
तेज मैं तेजस्वियोंमें बुद्धि मैं बुद्धिमानमें ॥ १० ॥
वैराग्य-युक्त निष्काम बल मैं बलवानका ।
धर्मसे अविरोधी मैं भूतोंकी काम-वासना ॥ ११ ॥
२०५ ज्ञान-विज्ञानयोग