ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहोता नियम-पटका विस्मरण । अधोगतिका रहता नहीं भान ।
किया जाता शास्त्र-निषिद्ध ही जान । अकार्य सब ॥ ४ ॥
क्यों किया शरीरका आश्रय । भूलकर ही मूल उद्देश्य ।
तदर्थ करणीय जो कार्य । छोडकर ॥ ५ ॥
इंद्रिय-ग्रामके चौराहेपर । अहं ममताके गप्पोंमें भर ।
विकारोंके समुदाय अपार । जुटाते रहते ॥ ६ ॥
दुःख-शोकके घावोंसे । प्रहारोंके विचारसे ।
बेभान माया-तमसे । ग्रस्त हैं जो ॥ ७ ॥
इसीलिये वे बिछुडे मुझसे । अन्य जो भजते चतुर्विधसे ।
उन्होंने आत्महित है जिससे । किया वृद्धिगत ॥ ८ ॥
चार प्रकारके मेरे भक्त ---
पहला आर्त कहलाता । दूसरा जिज्ञासू बनता ।
तीसरा अर्थार्थी है होता । चौथा है जो ज्ञानी ॥ ९ ॥
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७ ॥
दुःखी होनेसे भजता आर्त । जिज्ञासु भजता है ज्ञानार्थ ।
तीसरा है भजता अर्थार्थ । धनंजय ॥ ११० ॥
मत्प्रिय ज्ञानी भक्त—
अब बात चौथेकी रही । उसको करणीय नहीं ।
वही एक भक्त है सही । ज्ञानी है जो ॥ ११ ॥
होता है जो ज्ञानके प्रकाशसे । मुक्त सदा भेदाभेद तमसे ।
रहता मद्रूप-समरससे । तथा भक्त भी जो ॥ १२ ॥
श्रेष्ठ है सबमें ज्ञानी नित्य-युक्त अनन्य जो ।
उसे मैं प्रिय अत्यंत वह भी प्रिय है मुझे ॥ १७ ॥
२११ ज्ञान-विज्ञानयोग