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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 285

किंतु जो है अन्य देवता । भजनेकी चाह करता ।
इच्छा पूर्तिमें ही करता । उनकी भी ॥ ४३ ॥
देव-देवीमें मैं ही रहता । यह भी वह नहीं जानता ।
सबमें वह भाव धरता । भिन्न भिन्न ॥ ४४ ॥
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥ २२ ॥
फिर है वह श्रद्धायुक्त । आराधनामें जो उचित ।
सिद्धि तक सब समस्त । करता रहता है ॥ ४५ ॥
जैसा है जिसका भाव । वैसा फल देता देव ।
मिलता वह सदैव । मेरे ही कारण ॥ ४६ ॥
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजोयान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ २३ ॥
अन्य देवताओं द्वारा पाये गये भोग नाशवंत होते हैं
किंतु भक्त वे मुझे नहीं जानते । कल्पनाके बाहर नहीं पड़ते
इसीलिये कल्पित फल हैं पाते । नाशवंत जो ॥ ४७ ॥
अजी ! ऐसा जो यह भजन । वह है संसारका ही साधन ।
यहां फल भोगका ही स्वप्न । दीखे क्षणभर ॥ ४८ ॥
फिर जो भाता है दैवत । जिसका यजन सतत ।
होता है वही जिसे प्राप्त । धनंजय ॥ ४९ ॥
यहां जिसके तनमन प्राण । करता सतत मेरा स्मरण ।
होता है जब उसका निर्वाण । पाता मद्रूप ॥ १५० ॥
उसी श्रद्धा-शक्तिसे तो पूजते उस रूपको ।
मांगे जो उससे भोग पाते मेरे विधानसे ॥ २२ ॥
नाशवंत फल पाते जन जो अल्प बुद्धिके ।
देवोंके भक्त देवोंको मेरे जो मुझसे मिले ॥ २३ ॥
२१५ ज्ञान-विज्ञानयोग