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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 283

किंतु जिसने मुझे जानकर । मुड़कर देखा नहीं संसार ।
सरिता सागरको प्राप्तकर । न मुड़ती जैसे ॥ २४ ॥
जिसके हृदय गह्वरमें उगम । अनुभव गंगाका मुझसे संगम ।
कैसे गायें फिर महिमा अनुपम । शब्दोंसे उसकी ॥ २५ ॥
अजी ! जो ज्ञानी कहलाता है । वह तो मेरा चैतन्य ही है ।
यह बात कहनेकी नहीं है । कहता हूं तुझसे ॥ २६ ॥
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ १९ ॥
ज्ञानी भक्तिका महान् अनुभाव—
वह तो घने वनमें विषयोंके । आया है आतंकसे काम-क्रोधके ।
पाकर छुटकारा सद्वासनाके । पहाड़पर ॥ २७ ॥
फिर वह साधु-संगसे धनुर्धर । विहित कर्म-पथ पर चलकर ।
निषिद्ध-प्रवृत्ति पथ छोड़कर । कर्म-मार्गसे ॥ २८ ॥
शत-जन्मोंका है प्रवास करता । फलाशाका जूता नहीं पहनता ।
फल-हेतुका लेख कौन लिखता । ऐसी स्थितिमें ॥ २९ ॥
शरीर संयोगकी रातमें ऐसे । सर्व-संग त्यागकी सिद्धतासे ।
दौडनमें पौ फटी अनायाससे । कर्मक्षयकी ॥ १३० ॥
फिर चमकी उषा गुरु-कृपाकी । खिल फैली स्वर्ण-किरण ज्ञानकी ।
वहां प्रतीति हुई साम्य-सिद्धिकी । अंतर दृष्टिमें ॥ ३१ ॥
जिस ओर देखो तब मैं हूं । एकांत लोकांतमें मैं ही हूं ।
सदा सर्वत्र मैं एक ही हूं । मैं ही उसका ॥ ३२ ॥
उसके लिये सदा सर्वत्र कहीं । मैं छोड़कर अन्य कुछ भी नहीं ।
तलावमें डूबी गगरीको कहीं । जैसे जल सर्वत्र ॥ ३३ ॥
होता है वह मेरे भीतर । उसको मैं बाहर भीतर ।
इसको शब्दोंमें गूंथकर । कहा नहीं जाता ॥ ३४ ॥
अनेक जन्मके पीछे पायो हैं शरणागति ।
विश्व देखें वासुदेव संत है अति दुर्लभ ॥ १९ ॥
२१३ ज्ञान-विज्ञानयोग