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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 282

जैसे सामान्य दृष्टिसे स्फटिक । आभास होता है मानो उदक ।
वैसा लगता ज्ञानी सकौतुक । नहीं है ज्ञानी ॥ १३ ॥
पवन जब गगनमें घुल जाता । उसका अस्तित्व भिन्न नहीं रहता ।
ज्ञानीका समरसमें विलय होता । रहता जैसे ॥ १४ ॥
हिलकर देखा पवन । दीखता गगनसे भिन्न ।
वैसे स्वभावसे गगन- । जैसे रहता ॥ १५ ॥
ज्ञानी वैसे काया-कर्मसे । दीखता उपासक जैसे ।
आंतरिक अनुभावसे । मद्रूप है जो ॥ १६ ॥
किंतु वह ज्ञानके प्रकाशसे । अनुभवता तत्वमसि ऐसे ।
मैं भी कहता तब आनंदसे । है वह “मम आत्मा” ॥ १७ ॥
जो जीव भाव परका बोध पाकर । करना जानता शुद्ध व्यवहार ।
पानेसे वह केवल भिन्न शरीर । मुझसे भिन्न है क्या ॥ १८ ॥
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥१८॥
ऐसे अपने स्वार्थके लोभसे । भक्त बनकर चिपकते मुझसे ।
किंतु मैं प्रेम करता जिनसे । वह है ज्ञानी मात्र ॥ १९ ॥
अजी ! दूध पय घृतकी जो आशा । उलझाती लोगोंसे गयको फांसा ।
किंतु उस पाशके बिन भी कैसा । दूध पाता है बछड़ा ॥ १२० ॥
क्यों कि वह तन मन प्राणसे । न जाने अन्य कुछ भी जिससे ।
जो सामनेसे दीखता है उसे । मानता माय मेरी ॥ २१ ॥
इस भांति जो हैं अनन्य गति । तभी करती है गाय भी प्रीति ।
इसलिये कहता लक्ष्मीपति । वह है यथार्थ ॥ २२ ॥
रहने दो फिर वे बोले । अब तुझसे हम बोले ।
वे तीन भक्त भी भले । भाते हैं मुझको ॥ २३ ॥
हैं ये उदार सारे ही ज्ञानी तो स्व-समान है ।
मुझमें स्थिर जो युक्त गति अंतिम जानके ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी २१२