ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
क्रिया विशेषको बहुव । नहीं लोपते विधिवत ।
निपुण हो धर्ममें रत । करते हैं नित्य ॥ ४९ ॥
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयाऽपहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ ४४ ॥
किंतु करते एक बुरी बात । स्वर्ग कामनामें हो लिप्त चित्त ।
भूलते हैं यज्ञ पुरुषको नित । भोक्ता है जो ॥ २५० ॥
बनाकर जैसे कर्पूरका ढेर । उसमें आग लगाकरके फिर ।
अथवा मिष्ठान्न भला पकाकर । मिला दिया विष ॥ ५१ ॥
पाकर अमृतकुंभ दैवसे । ठुकराते हैं उसको पैरसे ।
नासते हैं धर्म-कृत्यको वैसे । करके फलाकांक्षा ॥ ५२ ॥
पुण्य करते हैं सायास । धरके संसारकी आस ।
विवेक बिनु करें नास । करें क्या ॥ ५३ ॥
जैसे घरका सुग्रास भोजन । बेचते लेकरके कुछ धन ।
वैसे खाते हैं धर्म मति-हीन । भोगार्थि जो ॥ ५४ ॥
इसीलिये सुन तू पार्थ । दुर्बुद्धिमें होकर लिप्त ।
ये वेदवाद रत सतत । आचरते हैं ॥ ५५ ॥
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥४५॥
तीन गुणोंसे है आवृत । जानो ये वेद निर्भ्रांत ।
उपनिषदादि समस्त । हैं सात्विक ॥ ५६ ॥
है यहां रज रज-तमात्मक । जहां है निरूपण कर्मादिक ।
जो हैं केवल ही स्वर्ग सूचक । धनुर्धर ॥ ५७ ॥
लुभायी जिससे बुद्धि भोग वैभवमें फंसी ।
न होती बुद्धि स्थायी समाधिमें कंभी स्थिर ॥ ४४ ॥
तीन गुण वदे वेद उनसे हो अलिप्त तू ।
तथा निश्चित निर्द्वन्द्व सत्वस्थ योग क्षेममें ॥ ४५ ॥
ज्ञानेश्वरी ६०
इसलिये तू जान अर्जुन । ये हैं सुख दुखके कारण ।
न जाने देना अंतःकरण । इसमें कभी ॥ ५८ ॥
गुणत्रयोंका कर अनादर । मैं मेरा ऐसा कभी न कर ।
केवल आत्म-सुखका अंतर । कर आश्रय ॥ ५९ ॥
यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ ४६ ॥
तू निष्काम कर्म कर-
वेद यदि अनेक बोलते । विविध भेदोंको है सुझाते ।
अपना हित आप देखते । उसमेंसे ही ॥ २६० ॥
जैसे सूर्यका उदय होते । सारे पथ दिखायी पड़ते ।
किंतु सभी पथ क्या चलते । कहो मुझे ॥ ६१ ॥
या जलमय सकल । हुआ सभी महीतल ।
लेते हम जो केवल । आवश्यक ॥ ६२ ॥
वैसे ही ज्ञानी जन । कर वेदार्थ चिंतन ।
शाश्वत जो तत्व-ज्ञान । स्वीकारते हैं ॥ ६३ ॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ ४७ ॥
इसीलिये सुन तू अर्जुन । करके ऐसे अवलोकन ।
तुझे यह उचित है जान । जो स्वकर्म ॥ ६४ ॥
विचार किया हमने पूर्ण । यह हमारा निश्चय जान ।
अनुचित त्यजना अर्जुन । विहित कर्म ॥ ६५ ॥
सभी ओर भरा पानी कुएंमें क्या धरा रहा ।
ब्रह्मज्ञ-तत्वज्ञानीको वेदोंमें सार जो रहा ॥ ४६ ॥
कर्मका अधिकारी तू न कर फल-कामना ।
न कर्म-फलमें हेतु न हो राग अकर्ममें ॥ ४७ ॥
६१ सांख्ययोग
किंतु कर्म फलकी आशा न करना । तथा कुकर्मका संग भी न धरना ।
सत्कर्मका आचरण सदा करना । बिन हेतुके ॥ ६६ ॥
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय ।
सिद्धयसिद्धयोःसमो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥४८॥
ईश्वरार्पित कर्म सदैव पूर्ण ही-
तू योगयुक्त होकर । फलाशाको छोड़कर ।
अर्जुन ! मन देकर । कर कर्म ॥ ६७ ॥
किंतु हुआ कर्म सफल । दैव था यदि अनुकूल ।
न होना संतुष्ट बहुत । मनमें भी ॥ ६८ ॥
या हुआ कोई कारण । कार्य रहा जो अपूर्ण ।
जिससे तू अंतःकरण । न कर क्षुब्ध ॥ ६९ ॥
काम हुआ हाथका पूर्ण । यदि रहा वह अपूर्ण ।
इससे विचार सगुण । ऐसे मानना ॥ २७० ॥
कर्मका जो है मूल कारण । उसको ही किया समर्पण ।
वहीं हुआ वह परिपूर्ण । सहज भावसे ॥ ७१ ॥
सफल असफलमें सतत । रहता है जिसका सम चित्त ।
योग स्थिति है वह प्रशंसित । ज्ञानियोंसे ॥ ७२ ॥
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ ४९ ॥
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥ ५०॥
फल लाभे न लाभे तू असंग सम-भावसे ।
योग-युक्त कर कर्म योग-सार समत्व है ॥ ४८ ॥
समत्व-बुद्धि है श्रेष्ठ उससे कर्म हीन है ।
बुद्धिका आसरा ले तू चाहते फल दीन हैं ॥४९॥
यहां समत्व बुद्धिसे टलता पाप पुण्य है ।
समत्व-युक्त हो सारा योग है कर्म-कौशल ॥ ५० ॥
ज्ञानेश्वरी ६२
ईश्वरार्पित साम्य-बुद्धि योगका सार है—
अर्जुन ! समत्व जो चित्तका । सार जान वही तू योगका ।
जिससे मन तथा बुद्धिका । होता ऐक्य ॥ ७३ ॥
बुद्धियोगका विवेचन । करनेसे लगता हीन ।
कर्म मार्ग है जो अर्जुन । वह सकाम ॥ ७४ ॥
किंतु कर्म करना है सतत । उससे योग मिलता निश्चित ।
शेष कर्ममें जो सहज चित्त । योग स्थिति है ॥ ७५ ॥
बुद्धियोग है सधर । उसमें ही हो तू स्थिर ।
मनसे ही त्याग कर । फल हेतुका ॥ ७६ ॥
लेकर आसरा बुद्धियोगका । पार हो जाते हैं भव सागरका ।
तोड़कर बंधन उभयका । पाप-पुण्य ॥ ७७ ॥
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥५१॥
वे यदि कर्म करते रहते । मनसे कर्म फल नहीं छूते ।
तभी जन्म-मृत्युसे मुक्त होते । सुनो पार्थ ॥ ७८ ॥
होते हैं जो योग च्युत । पद पाते हैं अच्युत ।
हैं जो आनंद भरित । धनुर्धर ॥ ७९ ॥
तू भी ऐसा ही होगा । यदि मोह छोड़ेगा ।
मनमें जो धरेगा । विराग को ॥ २८० ॥
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥५२॥
तब निष्कलंक गगन । उदित होगा तत्वज्ञान ।
उससे निरीच्छ होगा मन । सहज रूपसे ॥ ८१ ॥
समत्व-बुद्धिसे ज्ञानी तजके कर्मके फल ।
छुडाके जन्मकी गांठ पाते हैं पद अच्युत ॥ ५१ ॥
बुद्धि जो तर जायेगी मोहका जब कीचड़ ।
हुवा होगा शब्द ज्ञान पचायेगा तभी सब ॥ ५२ ॥
८२ सांख्ययोग
और है कुछ जानना। बीतेको अब स्मरना।
ऐसा सब तू अर्जुन। भूलेगा तब ॥ ८२ ॥
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥५३॥
बुद्धि जो इंद्रियोंके संगमें । फैलती है दशदिशाओंमें ।
होगी वही फिर आत्मरूपमें । स्थिर नित्य ॥ ८३ ॥
समाधि सुखमें केवल। बुद्धि होगी अति निश्चल ।
वहां पायेगा तू सकल । योगस्थिति ॥ ८४ ॥
अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥५४॥
स्थितप्रज्ञताकी जिज्ञासा—
कहता है पार्थ हे कृष्ण। इसी बातको जानुं पूर्ण ।
कहो अब हो सकरुण । कृपानिधि ॥ ८५ ॥
कहा अच्युतने फिर । पूछ ले तू धनुर्धर ।
मनके कोई विचार । मुक्त भावसे ॥ ८६ ॥
बोला अर्जुन कृष्णसे । कहो बातें ये मुझसे ।
जानना उसको कैसे । स्थितप्रज्ञ है ॥ ८७ ॥
जो है स्थिरमति कहलाता । समाधि सुख नित भोगता ।
कैसा कहो वह जाना जाता । शार्ङ्गधर ॥ ८८ ॥
किस स्थितिमें वह रहता । कैसे वह बर्ताव करता ।
किस रूपमें वह रहता । लक्ष्मीपति ॥ ८९ ॥
सुनके उलझी बुद्धि तेरी पाकर निश्चय ।
समाधिमें स्थिर होगी पायेगा तब योग तू ॥ ५३ ॥
अर्जुनने कहा
समाधिमें स्थिराथा जो रहता किस भांतिसे ।
बोले रहे फिरे कैसे स्थित-प्रज्ञ कहो मुझे ॥५४॥
ज्ञानेश्वरी ६४
तब परब्रह्मका अवतरण । है जो षड्गुणाधिकरण ।
सुन इसे वहां नारायण । बोले ऐसा ॥ २९० ॥
भगवान उवाच
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥५५॥
स्थितप्रज्ञके लक्षण—
सुन तू अब अर्जुन । मनकी प्रौढ़ कामना ।
होती अति उलझन । आत्म सुखमें ॥ ९१ ॥
सदैव जो हैं नित्य तृप्त । अन्तःकरणमें भरित ।
किंतु विषयमें पतित । जिसके संगसे ॥ ९२ ॥
काम वह जब मूलतः मिटता । मन उसका आत्मतोषी हो जाता ।
तभी वह स्थितप्रज्ञ कहलाता । धनंजय ॥ ९३ ॥
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥५६॥
होते हैं जब दुख प्राप्त । तब न होता उद्विग्नचित्त ।
सुखमें भी वह हर्षित । होता नहीं ॥ ९४ ॥
होता अर्जुन उसका चित्त । सदा काम क्रोधसे रहित ।
तथा होता है भयसे मुक्त । परिपूर्ण वह ॥ ९५ ॥
ऐसा वह निरवधि । उसे जान स्थिर बुद्धि ।
सब त्यागके उपाधि । द्वंद्वातीत ॥ ९६ ॥
श्री भगवानने कहा
मनकी कामना सारी छोडके अपनी वह ।
आत्मामें रहता तुष्ट कहाता स्थित-प्रज्ञ सो ॥ ५५ ॥
उद्विग्न दुःखमें ना हो सुखकी लालसा नहीं ।
गया राग भय क्रोध है स्थित-प्रज्ञ संयमी ॥ ५६ ॥
६५ सांख्ययोग
यः सर्वत्रानभिस्नेह स्तत्त त्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥५७॥
सर्वत्र सदैव एकसा । संपूर्ण चंद्र देता जैसा ।
सबको समान प्रकाश । न देख अधमोत्तम ॥ ९७ ॥
ऐसी अनवच्छिन्न समता । भूतमात्रमें हो सदयता ।
तथा अपरिवर्तित चित्त । सदा सर्वत्र ॥ ९८ ॥
भला पाकर नहीं रीझता । वैसे बुराईमें न खीजता ।
दोनोंमें एक-सा है रहता । अप्रभावित ॥ ९९ ॥
ऐसा जो हर्ष शोक रहित । सदा आत्म-बोधसे भरित ।
जान तू है वह प्रज्ञा युक्त । धनुर्धर ॥ ३०० ॥
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥५८॥
अथवा कूर्मके समान । मोदमें फैलाता है तन ।
या इच्छावश आकुंचन । करता है जो ॥ १ ॥
इंद्रिया जिसके आधीन । उनका करती कथन ।
वही है स्थितप्रज्ञ जान । तू धनंजय ॥ २ ॥
विषया विनिवर्तते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परंदृष्ट्वा निवर्तते ॥५९॥
सर्वत्र जो अनासक्त पाता जब भला बुरा ।
न करे हर्ष या द्वेष है स्थित-प्रज्ञ जान तू ॥ ५७ ॥
लेता समेट संपूर्ण इंद्रियोंको विषयसे ।
जैसे कूर्म सभी अंग तभी प्रज्ञा हुयी स्थिर ॥ ५८ ॥
निराहार बलसे जो तजे विषय देहके ।
रस न छोड़ता चित्त जल्ता आत्म ज्ञानसे ॥ ५९ ॥
ज्ञानेश्वरी ६६
परंदृष्ट्वा निवर्तते—
अर्जुन ! तुझसे एक । कहूंगा ऐसा कौतुक ।
विषयोंके हैं साधक । करते नियम ॥ ३ ॥
संयम करते श्रोत्रादिक । किंतु छोड़ते रसना एक ।
घेरते धर रूप अनेक । तब विषय ॥ ४ ॥
ऊपर तोड़कर अंकुर । जड़में सदा जल देकर ।
फैलेगा वृक्ष जैसा अपार । नाश ऐसा ॥ ५ ॥
पीकर जल वह अधिक । फैलाता जैसा अंग अनेक ।
रसनासे विषय अनेक । फलते मनमें ॥ ६ ॥
टूटते अन्य इंद्रियोंके । विषय नहीं रसनाके ।
हैं जो आधार जीवनके । इसीलिये ॥ ७ ॥
अर्जुन इसका नियमन । होता है तब सहज जान ।
परब्रह्मानुभव महान् । होता जब ॥ ८ ॥
शरीरभाव भी मिटता । करण विषय भूलता ।
ब्रह्मभाव प्रतीत होता । अपनेमें ही ॥ ९ ॥
यततो ह्यपि कौंतेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इंद्रियाणि प्रमाथीनि हरंति प्रसभं मनः ॥६०॥
इंद्रियोंकी प्रबंलता—
वैसे तो सुन तू अर्जुन । न होती इंद्रियां स्वाधीन ।
साधक करते जतन । निरंतर ॥ ३१० ॥
अभ्यासका कर घर । यम नियमका द्वार ।
मनको पकड कर । रखते मुट्ठिमें ॥ ११ ॥
करते हैं इंद्रियां व्याकुल । साधकोंको भी जो हैं कुशल ।
मांत्रिकको जैसे है चुडैल । भृष्ट करती ॥ १२ ॥
ज्ञानियोंके मनको भी यत्नमें रहते हुये ।
हटाती वेगसे मत्त इंद्रियां बलवान जो ॥ ६० ॥
६७ सांख्ययोग
विषय भी होते हैं ऐसे । जो ऋद्धि-सिद्धिके रूपसे ।
जकडते हैं आ स्पर्शसे । इंद्रियोंको ॥ १३ ॥
उनके संगमें जाता है मन । अभ्यासमें होकर बल हीन ।
बल है ऐसा इंद्रियोंका जान । तू धनंजय ॥ १४ ॥
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीतमत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥६१॥
रहो हृदयमें सदा अनुरक्त मेरा—
इसीलिये तू सुन पार्थ । छोडके विषयोंमें आस्था ।
इनका दमन सर्वथा । । कर निरंतर ॥ १५॥
इसीको तू जान अर्जुन । योग निष्ठाका है कारण ।
विषयोंसे अंतःकरण । न होता लिप्त ॥ १६ ॥
अजी ! जो आत्म बोध युक्त । होकर रहता सतत ।
हृदयमें हो अनुरक्त । रहता मेरा ॥ १७॥
विषयीको आत्मसुख नहीं—
किया बाह्य विषयोंका त्याग । अंदरसे रहा अनुराग ।
तब साद्यंत संसार भोग । करता वह ॥ १८ ॥
जैसा विषका लेश । लेनेसे होता विशेष ।
करता वह विनाश । जीवनका ॥ १९॥
वैसे विषयोंका अंश । मनमें रहके नाश ।
करता जान अशेष । विवेकको ॥ ३२० ॥
ध्यायतो विषयान् पुंसः संगस्तेषूपजायते ।
संगात् संजायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥६२॥
उनको युक्तिसे रोक रहना मत्परायण ।
जिसने इंद्रियां जीती है स्थित-प्रज्ञ जान तू ॥६१ ॥
करे जो विषय ध्यान उनकी लगती लत ।
लतसे फूटता काम कामसे क्रोध उद्भव ॥ ६२ ॥
ज्ञानेश्वरी ६८
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात् स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ॥ ६३॥
करता यदि मन विषय मनन । नि संगका भी होता उससे रंजन ।
रंजनसे प्रकट होती मूर्तिमान । अभिलाषा तब ॥ २१ ॥
होता है जहां काम उत्पन्न । क्रोधका वहां जमा आसन ।
क्रोध संगमें मोहको मान । अपने आप ॥ २२ ॥
मोहसे घिरते ही व्यक्ति । नाश होती उसकी स्मृति ।
जैसे बवंडरमें ज्योति । बुझ जाती है ॥ २३ ॥
अथवा सायंकालमें निशा । ग्रसती जैसा सूर्य प्रकाश ।
वैसी ही स्मृति भ्रंशमें दशा । होती मनुष्यकी ॥ २४ ॥
अज्ञानांध तब केवल । उससे घिरे हैं सकल ।
होती वहां बुद्धि व्याकुल । हृदयमें पार्थ ॥ २५ ॥
जन्मांध जैसे घबड़ाहटमें । अकुलाता है भाग दौड़में ।
होता वैसा बुद्धिका संसारमें । धनुर्धर ॥ २६ ॥
जब ऐसा बुद्धि-भ्रंश होता । सर्वत्र उसका कुंठा होता ।
ज्ञानका वहां नाश होता । मूल रूपसे ॥ २७ ॥
चैतन्यके नाशसे जैसे । होती देहकी दशा वैसे ।
पुरुषकी बुद्धि-नाशसे । होती है जान ॥ २८ ॥
इसीलिये सुन अर्जुन । जैसे चिनगारी ईंधन ।
पड़ बढ़ती त्रिभुवन । जलाती जाती ॥ २९ ॥
वैसे विषयोंका ध्यान । जब करता है मन ।
उससे होता पतन । जान निश्चय ॥ ३३० ॥
फूटता क्रोधसे मोह मोहसे स्मृति लोप है ।
स्मृति लोप बुद्धि-नाश उसीमें आत्म-नाश है ॥ ६३ ॥
६९ सांख्ययोग
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥६४॥
आत्मत्व प्राप्त पुरुष भी इंद्रियोंके लाड करके क्लेश ही पायेगा--
तभी विषयोंको मनसे । त्यागना है जड़ मूलसे ।
रागद्वेष सहजतासे । नष्ट होंगे सब ॥ ३१ ॥
सुन अर्जुन बात और एक । होकर नष्ट रागद्वेषादिक ।
इंद्रियोंका रमना है बाधक । न होता विषयोंमें ॥ ३२ ॥
सूर्य जैसा आकाशगत । छूता किरणोंसे जगत ।
किंतु संग-दोषसे लिप्त । होता नहीं ॥ ३३ ॥
इंद्रियोंमें वैसे उदासीन । आत्मरसमें होके तल्लीन ।
औ' कामक्रोधादिसे विहीन । होकर रहता ॥ ३४ ॥
विषयोंमें भी है जो सतत । आत्म तत्वमें रहता रत ।
उसको होंगे विषय पार्थ । बाधक कैसे ॥ ३५ ॥
पानीमें यदि पानी डूबता । तथा आगसे अग्नि जलता ।
तभी विषयोंमें है डूबता । जो है पूर्ण ॥ ३६ ॥
अपनेमें आप केवल । होकर रहा जो निर्मल ।
उसकी प्रज्ञा है निश्चल । तथा निर्भ्रान्त ॥ ३७ ॥
प्रसादे सर्व दुःखानाम् हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्न चेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥६५॥
पाता प्रसन्नता अखंडित । जिसका चित्त है सदोदित ।
वहां प्रवेश नहीं समस्त । भवदुःखोंका ॥ ३८ ॥
मिटा तो राग औ' द्वेष होती हैं इंद्रियां वश ।
प्रभुत्वसे इंद्रियोंके प्रसाद मिलता फिर ॥ ६४ ॥
प्रसादसे सभी दुःख होते हैं नाश सत्वर ।
प्रसादसे बुद्धिकी तो स्थिरता शीघ्र निश्चित ॥ ६५ ॥
ज्ञानेश्वरी ७०
जैसे अमृतका निर्झर । बहाता जिसका उदर ।
भूख प्यासका क्या असर । उसपे होगा ॥ ३९ ॥
हृदय जब प्रसन्न होता है । तब दुःख वहां कैसे रहता है ।
सहज रूपसे मति रहती है । परमात्मामें ॥ ३४० ॥
जैसे निर्वातका दीप । न जाने सर्वथा कंप ।
स्थिर बुध्दिका स्वरूप । योगयुक्त वैसे ॥ ४१ ॥
नास्ति बुध्दिरयुक्तस्य न चा युक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शांतिरशांतस्य कुतः सुखम् ॥६६॥
मुक्तताका यह् मंथन । न करता जिसका मन ।
जकडा जाता वह् जान । विषयादिकोंमें ॥ ४२ ॥
उसमें स्थिर बुध्दि पार्थ । कुछ भी नहीं है सर्वथा ।
तथा स्थिरताकी जो आस्था । नहीं होगी ॥ ४३ ॥
निश्चलताकी भावना । चित्तमें न होती उत्पन्न ।
शांति होगी कैसी अर्जुन । उसको कभी ॥ ४४ ॥
नहीं जहां शांतिकी लगन । वहां न होता सुखका स्थान ।
पापियोंका जो ऐसा जीवन । वहां न देखता मोक्ष ॥ ४५ ॥
बीजको आगमें भूनकर । बोनेसे नहीं आता अंकुर ।
वैसा सुख नहीं पाता नर । है जो अशांत ॥ ४६ ॥
तभी अयुक्तपन मनका । वही सर्वस्व है दुःखका ।
कारण उसका इंद्रियोंका । भला दमन ॥ ४७ ॥
इंद्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥६७॥
अयुक्तको नहीं बुध्दि उससे भावना नहीं ।
न भाव-हीनको शांति नहीं सुख अशांतको ॥ ६६ ॥
इंद्रियां दौड़ती स्वैर पीछे ही चलता मन ।
मानो प्रज्ञा बंधी नौका नदीमें वायुसे चली ॥ ६७ ॥
७१ सांख्ययोग
जो जो इंद्रिय है करते । वही जो पुरुष करते ।
वे तरके भी न तरते । विषय सिंधु ॥ ४८ ॥
जैसे नांब लगी जो तीर । वही आंधीमें फंसकर ।
आती जैसी बीच भंवर । अपने आप ॥ ४९ ॥
वैसे आत्मत्व प्राप्त पुरुषके । दुलार करनेसे इंद्रियोंके ।
पायेगा वह क्लेश संसारके । अपने आप ॥ ३५० ॥
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥६८॥
इसलिये स्थितप्रज्ञ दक्ष रहता है—
अपने आप यदि अर्जुन । किया है इंद्रियोंको आधीन ।
पाना कछु रहा नहीं जान । इससे अधिक ॥ ५१ ॥
कछुआ जैसे अपने फैलाता । अवयव जब वह चाहता ।
नहीं तो इच्छासे सिकोड़ लेता । अपनेमें आप ॥ ५२ ॥
इंद्रियां जिसकी अपनी होतीं । वह कहें जैसी हू बरततीं ।
जानो वह हुवा है रिथर मति । धनुर्धर तू ॥ ५३ ॥
अब और एक गहन । कहूंगा सुनो पहचान ।
जिसने पाया है अर्जुन । पूर्णत्वको ॥ ५४ ॥
यानिशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥६९॥
होते हैं जहां सब निद्रित । होता है वह वहां जाग्रत ।
जहां होते हैं सब जाग्रत । वह सोता है ॥ ५५ ॥
जिसने इंद्रियां सारीं सर्वथा है समेटलीं ।
स-निग्रह विषयोंसे तभी प्रज्ञा हुयी स्थिर ॥ ६८ ॥
रात जो सब भूतोंकी संयमी जागता वहां ।
जहां जगे सभी भूत मुनिकी रात है वह ॥ ६९॥
ज्ञानेश्वरी ७२
अध्याय ३: कर्मयोग
होता है वही निरुपाधि । उसे जान तू स्थिर-बुद्धि ।
वही होता है निरवधि । मुणीश्वर ॥ ५६ ॥
आपूर्यमाणं अचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशंति यद्वत् ।
तद्वत् कामा यं प्रविशंति सर्वे
स शांतिमाप्नोति न कामकामी ॥७०॥
सभी सुख-समुद्र उसमें लीन--
अर्जुन और एक प्रकार । उसको जाननेका विचार ।
शांत रहता जैसा सागर । अखंडित ॥ ५७ ॥
सरिता ओघ यदि समस्त । करते हैं जल समर्पित ।
तो भी रहता जैसे सीमित । अपनी सीमामें ॥ ५८ ॥
अथवा ग्रीष्मकालमें सरिता । सुखालेती है प्रवाह सर्वथा ।
किंतु उसमें न्यून नहीं आता । समुद्र वैसाही ॥ ५९ ॥
वैसे ही पानेसे ऋध्दि सिद्धि । नहीं क्षोभती उसकी बुद्धि ।
न मिलनेसे उसकी बुध्दि । न होती उदास ॥ ३६० ॥
अथवा सूरजके समीप । प्रकाश लगाते क्या दीप ।
होता क्या, न लगानेसे दीप । अंधार वहां ॥ ६१ ॥
ऋध्दि सिद्धिका उसपर । न होता कुछ भी असर ।
हियमें होती निरंतर । शांति उसके ॥ ६२ ॥
मानता जो अपना वैभव महान । उसके सम्मुख तुच्छ इंद्र भुवन ।
वह करें क्या पर्ण-कुटिमें रंजन । भिल्लोंकी ॥ ६३ ॥
न भंग पाता भर भी सदैव
समुद्र है नीर सभी पचाता ।
वैसे पचाते सब काम भोग
वे शांति पाते नहीं भोग-लुब्ध ॥७०॥
७३ सांख्ययोग
(10)
अमृतको जो फीका मानता। वह क्या कांजी पीता बैठता।
वैसा ही स्वानुभावी त्यागता। ऋध्दि सिध्दि ॥ ६४ ॥
पार्थ है यह नवल देख । तुच्छ है जहां स्वर्गका सुख ।
वहां ऋध्दि सिध्दिको क्या साख। रहती है ॥ ६५ ॥
विहाय कामान्यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहंकारःस शान्तिमधिगच्छति ॥७१॥
ममता और अहंता त्यागमें शांति—
ऐसा आत्म बोधमें तुष्ट । परमानंदमें है पुष्ट ।
वही है स्थित-प्रज्ञ श्रेष्ठ । जान तू ॥ ६६ ॥
अहंकारको जो मिटाकर । सब कामनाको त्याग कर ।
विचरता विश्वमें बनकर । विश्वमें ही ॥ ६७ ॥
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति.
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२ ॥
यही ब्राह्मी स्थिति—
है यह ब्राह्मी स्थिति निःसीम । अनुभवनेसे जो निष्काम ।
अनायास पाये पर-ब्रह्म । धनंजय ॥ ६८ ॥
चिद्रूपमें जब मिलता । देह-अंतकी व्याकुलता ।
नहीं वह अनुभवता । चितमें अपने ॥ ६९ ॥
वही है यह स्थिति । स्वमुखसे श्रीपति ।
कहते पार्थके प्रति । बोले संजय ॥ ३७० ॥
तजके कामना सारी फिर होकर निःस्पृह ।
अहंता ममता छूटी हुवा जो शांति रूप ही ॥ ७१ ॥
अर्जुन स्थिति है ब्राह्मी पाके न टलती वह ।
टिकती अंतमें भी जो ब्रह्म निर्वाण दायिनी ॥ ७२ ॥
ज्ञानेश्वरी ७४
सुनकर यह कृष्ण वचन । अर्जुन कहता मन ही मन ।
इस विचारसे है सिद्ध जान । अपना कार्य ॥ ७१ ॥
तीसरे अध्यायकी भूमिका—
कर्म- मार्ग इससे संपूर्ण । होता सहज निराकरण ।
तब रहा युद्धका कारण । कहां औ' कैसे ॥ ७२ ॥
इस विचारसे अर्जुन । होकर संतुष्ट महान ।
पूछेगा भला-सा प्रश्न । संदेहसे ॥ ७३ ॥
वह प्रसंग अति सुंदर । सकल धर्मका है आगर ।
या विवेकामृतका सागर । सीमातीत ॥ ७४ ॥
है जो स्वयं सर्वज्ञ नाथ । कहेगा अब श्रीअनंत ।
वही है ज्ञानदेव बात । निवृत्तिदास ॥ ७५ ॥
गीता श्लोक ७२
ज्ञानेश्वरी ओवी ३७५.
ॐ
(10*)
३
कर्मयोग
अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मताबुद्धिर्जनार्दन ।
तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १ ॥
तो र्म करने क्यों कहता है ?—
सुनो तब बोला अर्जुन । देव तूने कहा वचन ।
किया है उसका मनन । कमलापति ॥ १ ॥
वहां कर्म तथा कर्ता । देखनेसे नहीं रहता ।
ऐसा मत तेरा अनंत । यदि निश्चित है ॥ २ ॥
मुझे तब कैसा श्रीधर । कहता है तू युद्ध कर ।
यहां कर्ममें महा घोर । ढकलता कैसे ॥ ३ ॥
अजी तू ही कर्म अशेष । निषेध करता निःशेष ।
किंतु मुझसे यह हिंसक । कराता कैसे ॥ ४ ॥
सोचो यह हृषीकेश । मानता तू कर्म-लेश ।
हमसे तू ऐसी हिंसा । कराता है ॥ ५ ॥
अर्जुनने कहा
कर्मसे बुद्धिको श्रेष्ठ मानता तू जनार्दन ।
तब क्यों कर्ममें घोर डालता मुझ केशव ॥ १ ॥
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ २ ॥
सरल शब्दोंमें उपदेश दो—
तू ही जब देव ! ऐसा कहता । अज्ञानी मैं कह क्या करता ।
मिट ही गयी अब मनो-वार्ता । विवेककी ॥ ६ ॥
ऐसा यदि तेरा उपदेश । रहा क्या दूसरा स्मृति-भ्रंश ।
हुआ अब संपूर्ण विनाश । आत्मबोधका ॥ ७ ॥
वैद्य पहल पथ्य कहता । फिरसे चुपके विष देता ।
फिर क्या है रोगीका बनता । कहो मुझे ॥ ८ ॥
भटकना जैसे अंधेको । मद्य पिलाना मर्कटको ।
वैसा उपदेश हमको । देता सुन्दर ॥ ९ ॥
पहले ही मैं हूं अजान । फिर मोहग्रस्त महान ।
विवेक मैंने यह मान । तुझसे पूछा ॥ १० ॥
देव ! है तेरी निराली बात । उपदेशसे चित्त भ्रमित ।
ऐसे करना है क्या उचित । अपनोंसे ॥ ११ ॥
हम हैं तन-मन जीवसे । करें अनुकरण सदासे ।
तथा तेरा करना जो ऐसे । मिटा सर्वस ॥ १२ ॥
ऐसा यदि तेरा उमदेश । उसमें कैसी हितकी आस ।
औ' मिटे ज्ञानार्जनकी आस । कहता अर्जुन ॥ १३ ॥
गई कुछ जाननेकी बात । मन भी हुआ अव्यस्थित ।
पहले था जो स्थिर चित्त । मेरा देव ॥ १४ ॥
वैसे है श्रीकृष्ण तेरा । चरित्र अंति गहरा ।
तू देखता चित्त मेरा । इस बहाने ॥ १५ ॥
अथवा तू हमें फंसाता । या गूढ तत्व है कहता ।
वह समझमें न आता । सोचनेसे ॥ १६ ॥
मिश्र-वचनसे बुद्धि करता मोह-युक्त तू।
जिससे श्रेय पाऊं मैं कह तू एक निश्चित ॥ २ ॥
७७ कर्मयोग
श्रीकृष्ण बात मेरी सुनना । गूढार्थ मुझसे न बोलना ।
सरल विवेक जो कहना । देश-भाषामें ॥ १७ ॥
मेरी मति है जड़ अत्यंत । तो भी समझं ऐसी ही बात ।
हरि तुझे बोलना सतत । निश्चयात्मक ॥ १८ ॥
रोगको है यदि जीतना । उस पर औषध देना ।
किंतु वह सुस्वादु होना । अति मधुर ॥ १९ ॥
देव तेरे जैसे सद्गुरु । इच्छाकी तृप्ति क्यों न करूं ।
यहां संकोच किसका धरूं । तू ही माय मेरी ॥ २० ॥
अजी ! कामधेनु दुहनेमें । आयी अपने ही सदनमें ।
तब भी कामना करनेमें । कृपणता क्यों ? ॥ २१ ॥
चिंतामणि करमें आया । वांछित जो मन भाया ।
भोगनेमें संकोच किया । ऐसा क्यों ॥ २२ ॥
अमृत-सागरके पास । आके न मिटाता है प्यास ।
आना तब उसके पास । व्यर्थ ही है ॥ २४ ॥
जन्मोंकी उपासनासे । श्रीहरि दैव योगसे ।
तू हुआ है अपनेसे । आधीन आज ॥ २५ ॥
तभी न मांगें क्यों सर्वस । सुकाल है यह परेश ।
आयी जन्मांतरकी आस । पूर्ण होनेको ॥ २६ ॥
सकल जीवन सफल । मिला पुण्य यशका फल ।
सिद्ध मनोरथ सकल । हुए मेरे ॥ २७ ॥
सकल मंगल धाम । अजी देवदेवोत्तम ।
हुआ आज पूर्ण काम । तू स्वाधीन है ॥ २८ ॥
माताके पास बालक जैसे । लगता है स्तनमें स्वेच्छासे ।
न देखे काल अकाल वैसे । भक्त वत्सल ॥ २९ ॥
वैसे देव तुझसे । पूछते हैं स्वेच्छासे ।
न जाने समय ऐसे । कृपानिधि ॥ ३० ॥
देव ! सर्वत्र जो हित । आचरणमें उचित ।
कह एक जो निश्चित । कहता पार्थ ॥ ३१ ॥
ज्ञानेश्वरी ७८
भगवान उवाच
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३ ॥
अधिकार भेदसे उपदेश भिन्नता—
इस बातसे अच्युत । कहता है हो विस्मित ।
अर्जुनका है ध्वनित । अभिप्रायसे ॥ ३२ ॥
अजी ! बुद्धि-योगकी बात । कहनेमें ही सांख्यमत ।
प्रकट किया स्वभावतः । अल्पमें ही ॥ ३३ ॥
उद्देश्य न वह जान कर । क्षुभित हुआ तेरा अंतर ।
कहूंगा मैं दोनों सत्वर । योग मार्ग ॥ ३४ ॥
सरल शब्दोंमें उपदेश दो—
सुन तू वीर श्रेष्ठ । जनमें दोनों निष्ठा ।
मुझसे ही प्रकट । अनादि सिद्ध ॥ ३५ ॥
एक ज्ञान-योग कहलाता । अनुष्ठान जो सांख्य करता ।
मूल तत्वसे है तन्मयता । पाता है वह ॥ ३६ ॥
दूसरा कर्मयोग जान । जो साधक जन निपुण ।
प्राप्त करते वे निर्वाण । परमगति ॥ ३७ ॥
मार्ग है दोनों भिन्न । अन्तमें हैं समान ।
पक्वापक्व भोजन । तृप्ति एक ॥ ३८ ॥
या पूर्व-पश्चिमकी सरिता । दीखनेमें है अति भिन्नता ।
सागर संगमसे एकता । होती दोनोंमें ॥ ३९ ॥
वैसे हैं ये दोनों मत । एक हेतुसे प्रेरित ।
किंतु जैसे उपासित । योग्यतासे ॥ ४० ॥
श्रीभगवानने कहा
जगमें दोहरी निष्ठा कही है पहले तुझे ।
ज्ञानसे सांख्य जो पाते योगी हैं कर्मसे यही ॥ ३ ॥
७९ कर्मयोग