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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 129

इसलिये तू जान अर्जुन । ये हैं सुख दुखके कारण ।
न जाने देना अंतःकरण । इसमें कभी ॥ ५८ ॥
गुणत्रयोंका कर अनादर । मैं मेरा ऐसा कभी न कर ।
केवल आत्म-सुखका अंतर । कर आश्रय ॥ ५९ ॥
यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ ४६ ॥
तू निष्काम कर्म कर-
वेद यदि अनेक बोलते । विविध भेदोंको है सुझाते ।
अपना हित आप देखते । उसमेंसे ही ॥ २६० ॥
जैसे सूर्यका उदय होते । सारे पथ दिखायी पड़ते ।
किंतु सभी पथ क्या चलते । कहो मुझे ॥ ६१ ॥
या जलमय सकल । हुआ सभी महीतल ।
लेते हम जो केवल । आवश्यक ॥ ६२ ॥
वैसे ही ज्ञानी जन । कर वेदार्थ चिंतन ।
शाश्वत जो तत्व-ज्ञान । स्वीकारते हैं ॥ ६३ ॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ ४७ ॥
इसीलिये सुन तू अर्जुन । करके ऐसे अवलोकन ।
तुझे यह उचित है जान । जो स्वकर्म ॥ ६४ ॥
विचार किया हमने पूर्ण । यह हमारा निश्चय जान ।
अनुचित त्यजना अर्जुन । विहित कर्म ॥ ६५ ॥
सभी ओर भरा पानी कुएंमें क्या धरा रहा ।
ब्रह्मज्ञ-तत्वज्ञानीको वेदोंमें सार जो रहा ॥ ४६ ॥
कर्मका अधिकारी तू न कर फल-कामना ।
न कर्म-फलमें हेतु न हो राग अकर्ममें ॥ ४७ ॥
६१ सांख्ययोग