ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअमृतको जो फीका मानता। वह क्या कांजी पीता बैठता।
वैसा ही स्वानुभावी त्यागता। ऋध्दि सिध्दि ॥ ६४ ॥
पार्थ है यह नवल देख । तुच्छ है जहां स्वर्गका सुख ।
वहां ऋध्दि सिध्दिको क्या साख। रहती है ॥ ६५ ॥
विहाय कामान्यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहंकारःस शान्तिमधिगच्छति ॥७१॥
ममता और अहंता त्यागमें शांति—
ऐसा आत्म बोधमें तुष्ट । परमानंदमें है पुष्ट ।
वही है स्थित-प्रज्ञ श्रेष्ठ । जान तू ॥ ६६ ॥
अहंकारको जो मिटाकर । सब कामनाको त्याग कर ।
विचरता विश्वमें बनकर । विश्वमें ही ॥ ६७ ॥
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति.
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२ ॥
यही ब्राह्मी स्थिति—
है यह ब्राह्मी स्थिति निःसीम । अनुभवनेसे जो निष्काम ।
अनायास पाये पर-ब्रह्म । धनंजय ॥ ६८ ॥
चिद्रूपमें जब मिलता । देह-अंतकी व्याकुलता ।
नहीं वह अनुभवता । चितमें अपने ॥ ६९ ॥
वही है यह स्थिति । स्वमुखसे श्रीपति ।
कहते पार्थके प्रति । बोले संजय ॥ ३७० ॥
तजके कामना सारी फिर होकर निःस्पृह ।
अहंता ममता छूटी हुवा जो शांति रूप ही ॥ ७१ ॥
अर्जुन स्थिति है ब्राह्मी पाके न टलती वह ।
टिकती अंतमें भी जो ब्रह्म निर्वाण दायिनी ॥ ७२ ॥
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