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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 137

क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात् स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ॥ ६३॥
करता यदि मन विषय मनन । नि संगका भी होता उससे रंजन ।
रंजनसे प्रकट होती मूर्तिमान । अभिलाषा तब ॥ २१ ॥
होता है जहां काम उत्पन्न । क्रोधका वहां जमा आसन ।
क्रोध संगमें मोहको मान । अपने आप ॥ २२ ॥
मोहसे घिरते ही व्यक्ति । नाश होती उसकी स्मृति ।
जैसे बवंडरमें ज्योति । बुझ जाती है ॥ २३ ॥
अथवा सायंकालमें निशा । ग्रसती जैसा सूर्य प्रकाश ।
वैसी ही स्मृति भ्रंशमें दशा । होती मनुष्यकी ॥ २४ ॥
अज्ञानांध तब केवल । उससे घिरे हैं सकल ।
होती वहां बुद्धि व्याकुल । हृदयमें पार्थ ॥ २५ ॥
जन्मांध जैसे घबड़ाहटमें । अकुलाता है भाग दौड़में ।
होता वैसा बुद्धिका संसारमें । धनुर्धर ॥ २६ ॥
जब ऐसा बुद्धि-भ्रंश होता । सर्वत्र उसका कुंठा होता ।
ज्ञानका वहां नाश होता । मूल रूपसे ॥ २७ ॥
चैतन्यके नाशसे जैसे । होती देहकी दशा वैसे ।
पुरुषकी बुद्धि-नाशसे । होती है जान ॥ २८ ॥
इसीलिये सुन अर्जुन । जैसे चिनगारी ईंधन ।
पड़ बढ़ती त्रिभुवन । जलाती जाती ॥ २९ ॥
वैसे विषयोंका ध्यान । जब करता है मन ।
उससे होता पतन । जान निश्चय ॥ ३३० ॥
फूटता क्रोधसे मोह मोहसे स्मृति लोप है ।
स्मृति लोप बुद्धि-नाश उसीमें आत्म-नाश है ॥ ६३ ॥
६९ सांख्ययोग