ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिंतु कर्म फलकी आशा न करना । तथा कुकर्मका संग भी न धरना ।
सत्कर्मका आचरण सदा करना । बिन हेतुके ॥ ६६ ॥
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय ।
सिद्धयसिद्धयोःसमो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥४८॥
ईश्वरार्पित कर्म सदैव पूर्ण ही-
तू योगयुक्त होकर । फलाशाको छोड़कर ।
अर्जुन ! मन देकर । कर कर्म ॥ ६७ ॥
किंतु हुआ कर्म सफल । दैव था यदि अनुकूल ।
न होना संतुष्ट बहुत । मनमें भी ॥ ६८ ॥
या हुआ कोई कारण । कार्य रहा जो अपूर्ण ।
जिससे तू अंतःकरण । न कर क्षुब्ध ॥ ६९ ॥
काम हुआ हाथका पूर्ण । यदि रहा वह अपूर्ण ।
इससे विचार सगुण । ऐसे मानना ॥ २७० ॥
कर्मका जो है मूल कारण । उसको ही किया समर्पण ।
वहीं हुआ वह परिपूर्ण । सहज भावसे ॥ ७१ ॥
सफल असफलमें सतत । रहता है जिसका सम चित्त ।
योग स्थिति है वह प्रशंसित । ज्ञानियोंसे ॥ ७२ ॥
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ ४९ ॥
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥ ५०॥
फल लाभे न लाभे तू असंग सम-भावसे ।
योग-युक्त कर कर्म योग-सार समत्व है ॥ ४८ ॥
समत्व-बुद्धि है श्रेष्ठ उससे कर्म हीन है ।
बुद्धिका आसरा ले तू चाहते फल दीन हैं ॥४९॥
यहां समत्व बुद्धिसे टलता पाप पुण्य है ।
समत्व-युक्त हो सारा योग है कर्म-कौशल ॥ ५० ॥
ज्ञानेश्वरी ६२