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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 133

तब परब्रह्मका अवतरण । है जो षड्गुणाधिकरण ।
सुन इसे वहां नारायण । बोले ऐसा ॥ २९० ॥
भगवान उवाच
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥५५॥
स्थितप्रज्ञके लक्षण—
सुन तू अब अर्जुन । मनकी प्रौढ़ कामना ।
होती अति उलझन । आत्म सुखमें ॥ ९१ ॥
सदैव जो हैं नित्य तृप्त । अन्तःकरणमें भरित ।
किंतु विषयमें पतित । जिसके संगसे ॥ ९२ ॥
काम वह जब मूलतः मिटता । मन उसका आत्मतोषी हो जाता ।
तभी वह स्थितप्रज्ञ कहलाता । धनंजय ॥ ९३ ॥
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥५६॥
होते हैं जब दुख प्राप्त । तब न होता उद्विग्नचित्त ।
सुखमें भी वह हर्षित । होता नहीं ॥ ९४ ॥
होता अर्जुन उसका चित्त । सदा काम क्रोधसे रहित ।
तथा होता है भयसे मुक्त । परिपूर्ण वह ॥ ९५ ॥
ऐसा वह निरवधि । उसे जान स्थिर बुद्धि ।
सब त्यागके उपाधि । द्वंद्वातीत ॥ ९६ ॥
श्री भगवानने कहा
मनकी कामना सारी छोडके अपनी वह ।
आत्मामें रहता तुष्ट कहाता स्थित-प्रज्ञ सो ॥ ५५ ॥
उद्विग्न दुःखमें ना हो सुखकी लालसा नहीं ।
गया राग भय क्रोध है स्थित-प्रज्ञ संयमी ॥ ५६ ॥
६५ सांख्ययोग