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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 139

जैसे अमृतका निर्झर । बहाता जिसका उदर ।
भूख प्यासका क्या असर । उसपे होगा ॥ ३९ ॥
हृदय जब प्रसन्न होता है । तब दुःख वहां कैसे रहता है ।
सहज रूपसे मति रहती है । परमात्मामें ॥ ३४० ॥
जैसे निर्वातका दीप । न जाने सर्वथा कंप ।
स्थिर बुध्दिका स्वरूप । योगयुक्त वैसे ॥ ४१ ॥
नास्ति बुध्दिरयुक्तस्य न चा युक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शांतिरशांतस्य कुतः सुखम् ॥६६॥
मुक्तताका यह् मंथन । न करता जिसका मन ।
जकडा जाता वह् जान । विषयादिकोंमें ॥ ४२ ॥
उसमें स्थिर बुध्दि पार्थ । कुछ भी नहीं है सर्वथा ।
तथा स्थिरताकी जो आस्था । नहीं होगी ॥ ४३ ॥
निश्चलताकी भावना । चित्तमें न होती उत्पन्न ।
शांति होगी कैसी अर्जुन । उसको कभी ॥ ४४ ॥
नहीं जहां शांतिकी लगन । वहां न होता सुखका स्थान ।
पापियोंका जो ऐसा जीवन । वहां न देखता मोक्ष ॥ ४५ ॥
बीजको आगमें भूनकर । बोनेसे नहीं आता अंकुर ।
वैसा सुख नहीं पाता नर । है जो अशांत ॥ ४६ ॥
तभी अयुक्तपन मनका । वही सर्वस्व है दुःखका ।
कारण उसका इंद्रियोंका । भला दमन ॥ ४७ ॥
इंद्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥६७॥
अयुक्तको नहीं बुध्दि उससे भावना नहीं ।
न भाव-हीनको शांति नहीं सुख अशांतको ॥ ६६ ॥
इंद्रियां दौड़ती स्वैर पीछे ही चलता मन ।
मानो प्रज्ञा बंधी नौका नदीमें वायुसे चली ॥ ६७ ॥
७१ सांख्ययोग