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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 136

विषय भी होते हैं ऐसे । जो ऋद्धि-सिद्धिके रूपसे ।
जकडते हैं आ स्पर्शसे । इंद्रियोंको ॥ १३ ॥
उनके संगमें जाता है मन । अभ्यासमें होकर बल हीन ।
बल है ऐसा इंद्रियोंका जान । तू धनंजय ॥ १४ ॥
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीतमत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥६१॥
रहो हृदयमें सदा अनुरक्त मेरा—
इसीलिये तू सुन पार्थ । छोडके विषयोंमें आस्था ।
इनका दमन सर्वथा । । कर निरंतर ॥ १५॥
इसीको तू जान अर्जुन । योग निष्ठाका है कारण ।
विषयोंसे अंतःकरण । न होता लिप्त ॥ १६ ॥
अजी ! जो आत्म बोध युक्त । होकर रहता सतत ।
हृदयमें हो अनुरक्त । रहता मेरा ॥ १७॥
विषयीको आत्मसुख नहीं—
किया बाह्य विषयोंका त्याग । अंदरसे रहा अनुराग ।
तब साद्यंत संसार भोग । करता वह ॥ १८ ॥
जैसा विषका लेश । लेनेसे होता विशेष ।
करता वह विनाश । जीवनका ॥ १९॥
वैसे विषयोंका अंश । मनमें रहके नाश ।
करता जान अशेष । विवेकको ॥ ३२० ॥
ध्यायतो विषयान् पुंसः संगस्तेषूपजायते ।
संगात् संजायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥६२॥
उनको युक्तिसे रोक रहना मत्परायण ।
जिसने इंद्रियां जीती है स्थित-प्रज्ञ जान तू ॥६१ ॥
करे जो विषय ध्यान उनकी लगती लत ।
लतसे फूटता काम कामसे क्रोध उद्भव ॥ ६२ ॥
ज्ञानेश्वरी ६८