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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 145

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ २ ॥
सरल शब्दोंमें उपदेश दो—
तू ही जब देव ! ऐसा कहता । अज्ञानी मैं कह क्या करता ।
मिट ही गयी अब मनो-वार्ता । विवेककी ॥ ६ ॥
ऐसा यदि तेरा उपदेश । रहा क्या दूसरा स्मृति-भ्रंश ।
हुआ अब संपूर्ण विनाश । आत्मबोधका ॥ ७ ॥
वैद्य पहल पथ्य कहता । फिरसे चुपके विष देता ।
फिर क्या है रोगीका बनता । कहो मुझे ॥ ८ ॥
भटकना जैसे अंधेको । मद्य पिलाना मर्कटको ।
वैसा उपदेश हमको । देता सुन्दर ॥ ९ ॥
पहले ही मैं हूं अजान । फिर मोहग्रस्त महान ।
विवेक मैंने यह मान । तुझसे पूछा ॥ १० ॥
देव ! है तेरी निराली बात । उपदेशसे चित्त भ्रमित ।
ऐसे करना है क्या उचित । अपनोंसे ॥ ११ ॥
हम हैं तन-मन जीवसे । करें अनुकरण सदासे ।
तथा तेरा करना जो ऐसे । मिटा सर्वस ॥ १२ ॥
ऐसा यदि तेरा उमदेश । उसमें कैसी हितकी आस ।
औ' मिटे ज्ञानार्जनकी आस । कहता अर्जुन ॥ १३ ॥
गई कुछ जाननेकी बात । मन भी हुआ अव्यस्थित ।
पहले था जो स्थिर चित्त । मेरा देव ॥ १४ ॥
वैसे है श्रीकृष्ण तेरा । चरित्र अंति गहरा ।
तू देखता चित्त मेरा । इस बहाने ॥ १५ ॥
अथवा तू हमें फंसाता । या गूढ तत्व है कहता ।
वह समझमें न आता । सोचनेसे ॥ १६ ॥
मिश्र-वचनसे बुद्धि करता मोह-युक्त तू।
जिससे श्रेय पाऊं मैं कह तू एक निश्चित ॥ २ ॥
७७ कर्मयोग