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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 146

श्रीकृष्ण बात मेरी सुनना । गूढार्थ मुझसे न बोलना ।
सरल विवेक जो कहना । देश-भाषामें ॥ १७ ॥
मेरी मति है जड़ अत्यंत । तो भी समझं ऐसी ही बात ।
हरि तुझे बोलना सतत । निश्चयात्मक ॥ १८ ॥
रोगको है यदि जीतना । उस पर औषध देना ।
किंतु वह सुस्वादु होना । अति मधुर ॥ १९ ॥
देव तेरे जैसे सद्गुरु । इच्छाकी तृप्ति क्यों न करूं ।
यहां संकोच किसका धरूं । तू ही माय मेरी ॥ २० ॥
अजी ! कामधेनु दुहनेमें । आयी अपने ही सदनमें ।
तब भी कामना करनेमें । कृपणता क्यों ? ॥ २१ ॥
चिंतामणि करमें आया । वांछित जो मन भाया ।
भोगनेमें संकोच किया । ऐसा क्यों ॥ २२ ॥
अमृत-सागरके पास । आके न मिटाता है प्यास ।
आना तब उसके पास । व्यर्थ ही है ॥ २४ ॥
जन्मोंकी उपासनासे । श्रीहरि दैव योगसे ।
तू हुआ है अपनेसे । आधीन आज ॥ २५ ॥
तभी न मांगें क्यों सर्वस । सुकाल है यह परेश ।
आयी जन्मांतरकी आस । पूर्ण होनेको ॥ २६ ॥
सकल जीवन सफल । मिला पुण्य यशका फल ।
सिद्ध मनोरथ सकल । हुए मेरे ॥ २७ ॥
सकल मंगल धाम । अजी देवदेवोत्तम ।
हुआ आज पूर्ण काम । तू स्वाधीन है ॥ २८ ॥
माताके पास बालक जैसे । लगता है स्तनमें स्वेच्छासे ।
न देखे काल अकाल वैसे । भक्त वत्सल ॥ २९ ॥
वैसे देव तुझसे । पूछते हैं स्वेच्छासे ।
न जाने समय ऐसे । कृपानिधि ॥ ३० ॥
देव ! सर्वत्र जो हित । आचरणमें उचित ।
कह एक जो निश्चित । कहता पार्थ ॥ ३१ ॥
ज्ञानेश्वरी ७८