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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 144

३
कर्मयोग
अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मताबुद्धिर्जनार्दन ।
तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १ ॥
तो र्म करने क्यों कहता है ?—
सुनो तब बोला अर्जुन । देव तूने कहा वचन ।
किया है उसका मनन । कमलापति ॥ १ ॥
वहां कर्म तथा कर्ता । देखनेसे नहीं रहता ।
ऐसा मत तेरा अनंत । यदि निश्चित है ॥ २ ॥
मुझे तब कैसा श्रीधर । कहता है तू युद्ध कर ।
यहां कर्ममें महा घोर । ढकलता कैसे ॥ ३ ॥
अजी तू ही कर्म अशेष । निषेध करता निःशेष ।
किंतु मुझसे यह हिंसक । कराता कैसे ॥ ४ ॥
सोचो यह हृषीकेश । मानता तू कर्म-लेश ।
हमसे तू ऐसी हिंसा । कराता है ॥ ५ ॥
अर्जुनने कहा
कर्मसे बुद्धिको श्रेष्ठ मानता तू जनार्दन ।
तब क्यों कर्ममें घोर डालता मुझ केशव ॥ १ ॥