ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रिया विशेषको बहुव । नहीं लोपते विधिवत ।
निपुण हो धर्ममें रत । करते हैं नित्य ॥ ४९ ॥
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयाऽपहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ ४४ ॥
किंतु करते एक बुरी बात । स्वर्ग कामनामें हो लिप्त चित्त ।
भूलते हैं यज्ञ पुरुषको नित । भोक्ता है जो ॥ २५० ॥
बनाकर जैसे कर्पूरका ढेर । उसमें आग लगाकरके फिर ।
अथवा मिष्ठान्न भला पकाकर । मिला दिया विष ॥ ५१ ॥
पाकर अमृतकुंभ दैवसे । ठुकराते हैं उसको पैरसे ।
नासते हैं धर्म-कृत्यको वैसे । करके फलाकांक्षा ॥ ५२ ॥
पुण्य करते हैं सायास । धरके संसारकी आस ।
विवेक बिनु करें नास । करें क्या ॥ ५३ ॥
जैसे घरका सुग्रास भोजन । बेचते लेकरके कुछ धन ।
वैसे खाते हैं धर्म मति-हीन । भोगार्थि जो ॥ ५४ ॥
इसीलिये सुन तू पार्थ । दुर्बुद्धिमें होकर लिप्त ।
ये वेदवाद रत सतत । आचरते हैं ॥ ५५ ॥
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥४५॥
तीन गुणोंसे है आवृत । जानो ये वेद निर्भ्रांत ।
उपनिषदादि समस्त । हैं सात्विक ॥ ५६ ॥
है यहां रज रज-तमात्मक । जहां है निरूपण कर्मादिक ।
जो हैं केवल ही स्वर्ग सूचक । धनुर्धर ॥ ५७ ॥
लुभायी जिससे बुद्धि भोग वैभवमें फंसी ।
न होती बुद्धि स्थायी समाधिमें कंभी स्थिर ॥ ४४ ॥
तीन गुण वदे वेद उनसे हो अलिप्त तू ।
तथा निश्चित निर्द्वन्द्व सत्वस्थ योग क्षेममें ॥ ४५ ॥
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