सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 140

जो जो इंद्रिय है करते । वही जो पुरुष करते ।
वे तरके भी न तरते । विषय सिंधु ॥ ४८ ॥
जैसे नांब लगी जो तीर । वही आंधीमें फंसकर ।
आती जैसी बीच भंवर । अपने आप ॥ ४९ ॥
वैसे आत्मत्व प्राप्त पुरुषके । दुलार करनेसे इंद्रियोंके ।
पायेगा वह क्लेश संसारके । अपने आप ॥ ३५० ॥
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥६८॥
इसलिये स्थितप्रज्ञ दक्ष रहता है—
अपने आप यदि अर्जुन । किया है इंद्रियोंको आधीन ।
पाना कछु रहा नहीं जान । इससे अधिक ॥ ५१ ॥
कछुआ जैसे अपने फैलाता । अवयव जब वह चाहता ।
नहीं तो इच्छासे सिकोड़ लेता । अपनेमें आप ॥ ५२ ॥
इंद्रियां जिसकी अपनी होतीं । वह कहें जैसी हू बरततीं ।
जानो वह हुवा है रिथर मति । धनुर्धर तू ॥ ५३ ॥
अब और एक गहन । कहूंगा सुनो पहचान ।
जिसने पाया है अर्जुन । पूर्णत्वको ॥ ५४ ॥
यानिशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥६९॥
होते हैं जहां सब निद्रित । होता है वह वहां जाग्रत ।
जहां होते हैं सब जाग्रत । वह सोता है ॥ ५५ ॥
जिसने इंद्रियां सारीं सर्वथा है समेटलीं ।
स-निग्रह विषयोंसे तभी प्रज्ञा हुयी स्थिर ॥ ६८ ॥
रात जो सब भूतोंकी संयमी जागता वहां ।
जहां जगे सभी भूत मुनिकी रात है वह ॥ ६९॥
ज्ञानेश्वरी ७२