ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंईश्वरार्पित साम्य-बुद्धि योगका सार है—
अर्जुन ! समत्व जो चित्तका । सार जान वही तू योगका ।
जिससे मन तथा बुद्धिका । होता ऐक्य ॥ ७३ ॥
बुद्धियोगका विवेचन । करनेसे लगता हीन ।
कर्म मार्ग है जो अर्जुन । वह सकाम ॥ ७४ ॥
किंतु कर्म करना है सतत । उससे योग मिलता निश्चित ।
शेष कर्ममें जो सहज चित्त । योग स्थिति है ॥ ७५ ॥
बुद्धियोग है सधर । उसमें ही हो तू स्थिर ।
मनसे ही त्याग कर । फल हेतुका ॥ ७६ ॥
लेकर आसरा बुद्धियोगका । पार हो जाते हैं भव सागरका ।
तोड़कर बंधन उभयका । पाप-पुण्य ॥ ७७ ॥
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥५१॥
वे यदि कर्म करते रहते । मनसे कर्म फल नहीं छूते ।
तभी जन्म-मृत्युसे मुक्त होते । सुनो पार्थ ॥ ७८ ॥
होते हैं जो योग च्युत । पद पाते हैं अच्युत ।
हैं जो आनंद भरित । धनुर्धर ॥ ७९ ॥
तू भी ऐसा ही होगा । यदि मोह छोड़ेगा ।
मनमें जो धरेगा । विराग को ॥ २८० ॥
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥५२॥
तब निष्कलंक गगन । उदित होगा तत्वज्ञान ।
उससे निरीच्छ होगा मन । सहज रूपसे ॥ ८१ ॥
समत्व-बुद्धिसे ज्ञानी तजके कर्मके फल ।
छुडाके जन्मकी गांठ पाते हैं पद अच्युत ॥ ५१ ॥
बुद्धि जो तर जायेगी मोहका जब कीचड़ ।
हुवा होगा शब्द ज्ञान पचायेगा तभी सब ॥ ५२ ॥
८२ सांख्ययोग