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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 134

यः सर्वत्रानभिस्नेह स्तत्त त्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥५७॥
सर्वत्र सदैव एकसा । संपूर्ण चंद्र देता जैसा ।
सबको समान प्रकाश । न देख अधमोत्तम ॥ ९७ ॥
ऐसी अनवच्छिन्न समता । भूतमात्रमें हो सदयता ।
तथा अपरिवर्तित चित्त । सदा सर्वत्र ॥ ९८ ॥
भला पाकर नहीं रीझता । वैसे बुराईमें न खीजता ।
दोनोंमें एक-सा है रहता । अप्रभावित ॥ ९९ ॥
ऐसा जो हर्ष शोक रहित । सदा आत्म-बोधसे भरित ।
जान तू है वह प्रज्ञा युक्त । धनुर्धर ॥ ३०० ॥
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥५८॥
अथवा कूर्मके समान । मोदमें फैलाता है तन ।
या इच्छावश आकुंचन । करता है जो ॥ १ ॥
इंद्रिया जिसके आधीन । उनका करती कथन ।
वही है स्थितप्रज्ञ जान । तू धनंजय ॥ २ ॥
विषया विनिवर्तते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परंदृष्ट्वा निवर्तते ॥५९॥

सर्वत्र जो अनासक्त पाता जब भला बुरा ।
न करे हर्ष या द्वेष है स्थित-प्रज्ञ जान तू ॥ ५७ ॥
लेता समेट संपूर्ण इंद्रियोंको विषयसे ।
जैसे कूर्म सभी अंग तभी प्रज्ञा हुयी स्थिर ॥ ५८ ॥
निराहार बलसे जो तजे विषय देहके ।
रस न छोड़ता चित्त जल्ता आत्म ज्ञानसे ॥ ५९ ॥
ज्ञानेश्वरी ६६