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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

६ नाम महिमा
॥ शब्द २ ॥
नाम रटन रट लागि रहै, कोइ साधु सयाना ॥ टेक ॥
साध के चाकर दुइ जना, बंका सुर¹ ज्ञाना² ।
सास अरप आगे धरो, तब बाँधो बाना ॥१॥
साहेब द्वारे भीड़ भे, बिरला ठहराना ।
कंचन कोट सुमेर बना, गज दीन्हा दाना ॥२॥
चाल चले गजराज की, अलमस्त समाना ।
सील तिलक बंस बेलि है, जम देखि डेराना ॥३॥
धरती मूल बिचारि के, तब धुनि उड़काना ।
कोटि गऊ को दान दे, नहिँ नाम समाना ॥४॥
कह कबीर धर्मदास से, पावै पद निर्बाना ।
आदि अंत की बारता, सतगुरु परवाना ॥५॥
॥ शब्द ३ ॥
चाकर हौँ निज नाम का, सुनो संत सिपाही ॥ टेक ॥
चरन कँवल सतगुरु दिया, हम सीस चढ़ाई ।
सत्त दरस ऐसे भया, गुरु कमर बँधाई ॥१॥
मारे मुरचा सब्द ले, भ्रम के गढ़ टूटे ।
अच्छर पुरुष एक वृक्ष है, तहँ लागे जाई ॥२॥
काँपन लागे दूतवा, चढ़े संत सिपाही ।
मारे गोला नाम के, सब फउज पराई ॥३॥
नौबत बाजै लोक मेँ, जीते जमराई ।
कह कबीर धर्मदास से, फिरी नाम दोहाई ॥४॥
(१) बाँका सूरमा । (२) ज्ञानी ।

चेतावनी ७
॥ शब्द ४ ॥
हम सत्त नाम के बैपारी ॥ टेक ॥
कोइ कोइ लादै काँसा पीतल, कोइ कोइ लौँग सुपारी ।
हम तो लाद्यौ नाम धनी को, पूरन खेप हमारी ॥ १ ॥
पूँजी न टूटै नफा चौगुना, बनिज किया हम भारी ।
हाट जगाती रोक न सकि है, निर्भय गैल हमारी ॥ २ ॥
मोती बुंद घट ही मेँ उपजै, सुकिरत भरत कोठारी ।
नाम पदारथ लाद् चला है, धर्मदास बैपारी ॥ ३ ॥
॥ चेतावनी का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
सब्द की बेरिया जात टरी ॥ टेक ॥
उहाँ सो आये का कहि आये, का करने लगे आन ।
इहाँ आइ परपंच भुलाने, बैठे अधम ठिकान ॥ १ ॥
भाई बंधु सुत कुटुम कबीला, ये कह जग मेँ नाम ।
तुम जाने उनहीँ सँग रहना, ठाढ़ काल मुसक्यान ॥ २ ॥
आये नाव काठ से 'बोझी, दिन दिन अति गुरुवाई ।
आगे जाम¹ लेइ कर लूटी, देइ छाती पर लाती ॥ ३ ॥
गहे सब्द ज्ञान कर दीपक, बैठे सत के पासा ।
साहेब कबीर हंसन के राजा, धरमदास निजु दासा ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
थोरे दिन की जिंदगी, मन चेत गँवार ॥ टेक ॥
कागद कै तन पुतरा, डोरी साहेब हाथ ।
नाना नाच नचावही, नाचै संसार ॥ १ ॥
(१) जम ।

प्रथम भाग: शब्द संग्रह (सतगुरु-महिमा, नाम एवं चेतावनी)

काच माटी कै घइलिया, भरि लै पनिहार।
पानी परत गल जावही, ठाढ़ी पछिताय ॥ २ ॥
जस धूआँ कै धरोहरा, जस बालू कै रेत।
हवा लगे सब मिटि गये, जस करतब प्रेत ॥ ३ ॥
ओछे जल कै नदिया हो, बहै अगम अपार।
उहाँ नाव नहिँ बेरा हो, कस उतरब पार ॥ ४ ॥
धरमदास गुरु समरथ हो, जा को अदल अपार।
साहेब कबीर सतगुरु मिले, आवा गवन निवार ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३ ॥
कहो केते दिन जियबौ हो, का करत गुमान ॥ टेक ॥
कच्चे बासन का पिँजरा हो, जा मेँ पवन समान।
पंछी का कौन भरोसा हो, छिन मेँ उड़ि जान ॥ १ ॥
कच्ची माटी कै घड़ुवा हो, रस बूंदैन सान।
पानी बीच बतासा हो, छिन मेँ गलि जान ॥ २ ॥
कागद की नइया बनी, डोरी साहेब हाथ।
जौने नाच नचैहैँ हो, नाचब वोही नाच ॥ ३ ॥
धरमदास एक बनिया हो, करै झूठी बजार।
साहेब कबीर बनजारा हो, करैँ सत बपार ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
घड़ा एक नीर का फूटा। पत्र एक डार से टूटा ॥ १ ॥
ऐसहि नर जात जिंदगानी। अजहु नहिँ चेत अभिमानी ॥ २ ॥
भुलो जनि देख तन गोरा। जगत मेँ जीवना थोरा ॥ ३ ॥
निकरि जब प्रान जावैगा। कोई नहिँ काम आवैगा ॥ ४ ॥
सजन परिवार सुत दारा। सभे एक रोज होइ न्यारा ॥ ५ ॥
तजो मद लोभ चतुराई। रहो निरसंक जग माहीं ॥ ६ ॥

उपदेश ९
सदा ना जान ये देही। लगावो नाम से नेही ॥ ७ ॥
कहै धर्मदास कर जोरी। चलो जहँ देस है तोरी ॥ ८ ॥
॥ उपदेश का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
सुचित होइ सब्द बिचारो हो ॥ टेक ॥
सब्द बिचार नाम धर दीपक, लै उर बारो हो।
जुगन जुगन कै अरुझनि, छन मेँ निरुवारो हो ॥ १ ॥
पंथे चलो गरीब होय, मद मोह निवारो हो।
साहेब नैन निकट बसै, सत दरस निहारो हो ॥ २ ॥
आपे जगत जिताइ के, मन सब से हारो हो।
जवन बिधी मनुवा मरे, सोइ भाँति सम्हारो हो ॥ ३ ॥
बास करो सत लोक मेँ, दुख नगर उजाड़ो हो।
धरमदास निज नाम पर, तन मन धन वारो हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
मन रहो आसन मारि, मँदिल से न डोलो हो ॥ टेक ॥
राते माते रहो, बहुत जनि बोलो हो।
निरखत परखत रहो, पलक जनि खोलो हो ॥ १ ॥
रजनी के दिहल किवार, सत कुंजी खोलो हो।
ते उँजियारि मेँ बैठि, निर्भय होइ खेलो हो ॥ २ ॥
चौका बना चौगान, जगमग अभिराज¹ हो।
रबि ससि की छबि निरखि, हंसा होइ गाज हो ॥ ३ ॥
ब्रह्मा बिष्नु महेस, निर्गुन अस्थूला हो।
हिलिमिलि करु सतसंग, फिरत कहाँ भूला हो ॥ ४ ॥
(१) सर्वोपरि, सब का राजा।
२

१० उपदेश
गुरु के चरन धरु सीस, और सब त्यागो हो ।
जहाँ जहाँ तुम रहो, भक्ति बर माँगो हो ॥ ५ ॥
चमकत निर्मल रूप, झलकै जस हीरा हो ।
होइ मगन धर्मदास, बैठे तेहि तीरा हो ॥ ६ ॥
॥ शब्द ३ ॥
वा करता को सेइये, जिन सृष्टि उपाई ॥ टेक ॥
कोटिन ब्रह्मा बेद पढ़ि, पढ़ि जनम गँवाई ।
कोटिन बिष्णू होइ गये, कोइ पार न पाई ॥ १ ॥
तीर्थ गये कोइ ना तरै, चलि चलि मरि जाई ।
जल बिच आस लगाइ कै, मंगर¹ तन पाई ॥ २ ॥
भूठे पंडित बेद पढ़ि, पढ़ि जग भरमाई ।
उन के पुरखा मरि गये, उन काहे न जिआई ॥ ३ ॥
आदि अंत की बारता, सतगुरु से पावो ।
कह कबीर धर्मदास से, हंसा समुझावो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
का भरमत भटकत फिरो, करो खोज बनाई ।
मूल सब्द चीन्हे बिना, जिव जम लै जाई ॥ १ ॥
पान परवाना पाइ कै, निज लगन धरावो ।
जम की कला मिटाइ कै, लेव अंग चढ़ाई ॥ २ ॥
मूल सब्द हम कहि दिया, जुग जुग समुझाई ।
जो निस्चै करि मानिहै, तेहिँ लेँव बचाई ॥ ३ ॥
कह कबीर धर्मदास से, हम लीन्ह चिताई ।
अजर अमर घर लै चलूँ, जहँ काल न जाई ॥ ४ ॥
(१) मगर ।

बिरह और प्रेम ११
॥ शब्द ५ ॥
सुरत निरत दोउ मतो¹ करत हैं, चलो सतगुरु पै जइये हो॥टेक॥
सतगुरु चीन्हि चरन चित लैये, दृष्टि से दृष्टि मिलइये हो ।
सतगुरु साह साध सौदागर, भक्ति पटो² लिखवइये हो ॥१॥
मन मानिक की खुलीँ किवरियाँ, चढ़गइ झमकि अटरिया हो।
नहिँ वहँ डोरि नहीं वहँ रसरी, अमर लोक कस पइये हो ॥२॥
है वहँ डोर सुरति कर सोभी³, गुरु के सब्द् चढ़ि जइये हो ।
घर है रमानो⁴ मेरो बगर⁵ रमानो, फूल रही फुल बगिया हो ॥३॥
अछै कमल पर बहै सुरसरी⁶, तहँ बैठे हंस नहइये हो ।
धरमदास की अरज गुसाँईँ, आवागवन मिटइये हो ॥४॥
॥ बिरह और प्रेम का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
सतगुरु आवो हमरे देस, निहारौँ बाट खड़ी ॥ टेक ॥
वाहि देस की बतियाँ रे, जावैँ संत सुजान ।
उन संतन के चरन पखारौँ, तन मन करौँ कुरबान ॥ १ ॥
वाही देस की बतियाँ हम से, सतगुरु आन कहो ।
आठ पहर के निरखत हमरे, नैन की नीँद गई ॥ २ ॥
भूल गई तन मन धन सारा, व्याकुल भया सरीर ।
बिरह पुकारै बिरहनी, ढरकत नैनन नीर ॥ ३ ॥
धरमदास के दाता सतगुरु, पल मेँ कियो निहाल ।
आवागवन की डोरी कटि गई, मिटे भरम जंजाल ॥ ४ ॥

(१) सलाह । (२) पट्टा । (३) सीधी । (४) रमनीक । (५) हाता । (६) गंगा ।

१२ बिरह और प्रेम
॥ शब्द २ ॥
मितउ मड़ैया सूनी करि गेलो ॥ टेक ॥
अपन बलम परदेस निकरि गेलो,
हमरा के कछुवो न गुन दै गेलो ॥ १ ॥
जोगिन होइ के मैं बन बन ढूँढ़ौँ,
हमरा के बिरह-बैराग दै गेलो ॥ २ ॥
सँग की सखी सब पार उतरि गेलीँ,
हम धन ठाढ़ी अकेली रहि गेलो ॥ ३ ॥
धरमदास यह अर्ज करतु है,
सार सब्द सुमिरन दै गेलो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३ ॥
नैन दरस बिन मरत पियासा ॥ टेक ॥
तुम्हीँ छाँड़ि भजूँ नहिँ औरै, नाहिँ दूसरी आसा ॥ १ ॥
आठो पहर रहूँ कर जोरी, करि लेहु आपन दासा ॥ २ ॥
निसु बासर रहूँ लव लीना, बिनु देखे नहिँ बिस्वासा ॥ ३ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, देहु निज लोक निवासा ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
साहेब चितवो हमरी ओर ॥ टेक ॥
हम चितवैँ तुम चितवो नाहीँ, तुम्हरो हृदय कठोर ॥ १ ॥
औरन को तो और भरोसा, हमैँ भरोसो तोर ॥ २ ॥
सुखमनि सेज बिछाओँ गगन मेँ, नित उठि करौँ निहोर ॥ ३ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, साहेब कबीर बन्दीछोर ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
मैँ हेरि रहूँ नैना सो नेह लगाई ॥ टेक ॥
राह चलत मोहिँ मिलि गये सतगुरु, सो सुख बरनि न जाई ।
देइ के दरस मोहिँ बौराये, लै गये चित्त चुराई ॥ २ ॥

विरह और प्रेम १३
छबि सत दरस कहाँ लगि बरनौँ, चाँद सुरज छपि जाई ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, पुनि पुनि दरस दिखाई ॥४॥
॥ शब्द ६ ॥
कहौँ बुझाय दरद पिय तो से ॥ टेक ॥
दरद मिटै तरवार तीर से।
किधौँ मिटै जब मिलहुँ पीव से ॥ १ ॥
तन तलफै हिय कछु न सोहाय ।
तोहि बिन पिय मो से रहल न जाय ॥ २ ॥
धरमदास की अरज गुसाँईं ।
साहेब कबीर रहौँ तुम छाँहीँ ॥ ३ ॥
॥ शब्द ७ ॥
आज मेरे सतगुरु आये मिहमान ।
तन मन जिवड़ा करौँ कुरबान ॥ १ ॥
फूली फिरौँ न अंग समान ।
सतगुरु आवन सुनि लये कान ॥ २ ॥
चंदन चौकी अँगना बिछान ।
ता पर बैठे सतगुरु आन ॥ ३ ॥
फूलन हार गले पहिरान ।
चंद चकोर ज्योँ इकटक ध्यान ॥ ४ ॥
चरन धोय चरनोदक पान ।
सगले पाप मोचन किये आन ॥ ५ ॥
प्रेम सहित बिंजन पकवान ।
कंचन थाल सजाये आन ॥ ६ ॥
हाथ जोरि पुनि बिनती ठान ।
जेँवौ सतगुरु पुरुष पुरान ॥ ७ ॥

१४ बिरह और प्रेम
सीत प्रसाद सतगुरु दियो दान ।
जम किंकर को मर्दन मान ॥ ८ ॥
धर्मदास अमन गुजरान ।
साहेब कबीर निछावर प्रान ॥ ६ ॥
॥ शब्द ८ ॥
मोरा पिया बसै कौने देस हो ॥ टेक ॥
अपने पिया के ढुंढ़न हम निकसीँ, कोइ न कहत सनेस हो ॥१॥
पिया कारन हम भई हैं बावरी, धरो जोगिनिया कै भेस हो ॥२॥
ब्रह्मा बिष्नु महेस न जाने, का जानै सारद सेस हो ॥३॥
धनि जो अगम अगोचर पइलन, हम सब सहत कलेस हो ॥४॥
उहाँ कै हाल कबीर गुरु जानैँ, आवत जात हमेस हो ॥५॥
॥ शब्द ९ ॥
सजन से प्रीत मोहिँ लागी । दरस को भयो अनुरागी ॥१॥
नहीँ बैराग मोहिँ आवै । साहेब के गुन नितै गावै ॥२॥
अभरन भूषन तनै साजूँ । पिया को देखि हँस हुलसूँ ॥३॥
भया

बरह और प्रेम १५
लाल साहेब की लालिनि मूरत, लालि लालि अनुहरिया हो ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, गुरु के चरन बजिहरिया हो ॥४॥
॥ शब्द ११॥
साजन हमरे दरस सतगुरु के ॥ टेक ॥
अपने सजन को आवत देखूँ, दरसन करूँ नैन भरि भरि के ॥१॥
चरन धोइ चरनामृत लेहूँ, जूठन पाउँ पेट भरि भरि के ॥२॥
नीचा कर्म काटि गुरु दीन्हा, चरन कँवल पै सीस धरि धरि के ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, भव उतरूँ सतनाम सुमिरि के ॥४॥
॥ शब्द १२ ॥
गुरु मोहिँ सजीवन मूर दई ॥ टेक ॥
तन लागि गुरदिच्छा दीन्हीं, जन्म जन्म को मोल लई ॥१॥
दिन दिन औगुन छूटन लागे, बाढ़न लागी प्रीति नई ॥२॥
मानिक सुंभ से मानिक उपजै, हीरा हंस से भेंट भई ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, दिल की दुर्मति दूर भई ॥४॥
॥ शब्द १३ ॥
पिया बिन मोहिँ नीँद न आवै ॥ टेक ॥
खन गरजै खन बिजुली चमकै, ऊपर से मोहिँ झाँकि दिखावै ॥१॥
सासु ननद घर दारुनि आहैं, नित मोहिँ बिरह सतावै ॥२॥
जोगिन ह्वै के मैं बन बन ढूँढूँ, कोउ न सुधि बतलावै ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, कोइ नेरे कोइ दूर बतावै ॥४॥
॥ शब्द १४ ॥
पिया बिना मोहिँ नीक न लागै गाँव ॥ टेक ॥
चलत चलत मोरे चरन दुखित भे, आँखिन परिगै धूर ॥१॥
आगे चलूँ पंथ नहिँ सूझै, पाछे परै न पाँव ॥२॥
ससुरे जाउँ पिया नहिँ चीन्है, नैहर जात लजाउँ ॥३॥

१६ आरती
इहाँ मोर गाँव उहाँ मोर पाही १, बीचे अमरपुर धाम ॥४॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, तहाँ गाँव ना ठाँव ॥५॥
॥ शब्द १५ ॥
साँझ भई पियां बिन अकुलानी ॥ टेक ॥
देस देस ढूँढि फिरि आई, लोक लोक मैं छानी ।
कोइ न खोजै पिय अपने को, झुंड की झुंड गुमानी ॥१॥
आतुर जाय पूछै सखियन से, कहो पिय रूप बखानी ।
निरंकार सब के मन भावै, सुनि सुनि भे गलतानी ॥२॥
पुनि अकुलाय भवन को लौटी, त्रिकुटी महल समानी ।
सोहं सब्द सत्त दरसावै, वाही के रूप लोभानी ॥३॥
धन सतगुरु जीवन के दाता, दीन्हा नाम निसानी ।
कहैँ कबीर बहुत दिन बीता, धर्मनि तुम पहिचानी ॥४॥
॥ आरती का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
कैसे आरत करौँ तिहारी । महा मलिन गति देँह हमारी ॥१॥
मैलहिँ तैँ उपज्यो संसारा । मैं कैसे गुन गावौँ तुम्हारा ॥२॥
झरना झरै दसो दिस द्वारे । कस ढिंग आवौँ साहेब तुम्हारे ॥३॥
जो प्रभु देहु अगर की देँही । तब होवौँ मैं सब्द सनेही ॥४॥
मलयागिर मेंँ बसत भुवंगा । बिख अमृत रहै एकै संगा ॥५॥
तिनुका तोड़ दिया परवाना । तब हम पायौ पद निर्बाना ॥६॥
धर्मदास कबीर बल गाजै । गुरु परताप आरती साजै ॥७॥
॥ शब्द २ ॥
आरत गुरु कबीर की कीजै । जा के सेव जुगो जुग जीजै ॥१॥
संतन दया कीन्ह अधिकारी । सतसंगत मिलि अधम उधारी ॥२॥
(१) दूसरे गाँव की खेती ।

आरती १७
जन्म अनेक बीति गयो मोरा । अब मैँ दरसन पायो तोरा ॥३॥
अबके आरत सतगुरु चीन्हा । सुरत लगाय बंदगी कीन्हा ॥४॥
अजर अमर है तुम्हरी काया । धरमदास गुरु सरनी आया ॥५॥
॥ शब्द ३ ॥
आरति मोहिँ तुम्हारी परम गुरु, आरति मोहिँ तुम्हारी ।
प्रातःकाल सकल बिधि पूरन, धारी साज सँवारी ॥१॥
नरियर पान बदाम छुहारा, लौंग लायची सारी ।
भाव भक्ति से गुरू हिलोरा, संत मिले फल चारी ॥२॥
दयावंत धरनी पग धारे, हरषि साधु संसारी ।
मेटे बंधन त्रास जिवन के, चिन्ता सकल निवारो ॥३॥
पूरन पुरुष सिँहासन राजे, सोभा बहु बिधि धारी ।
आरति करैँ संत सब गावैँ, धरमदास बलिहारी ॥४॥
॥ शब्द ४ ॥
ऐसी आरति दियो लखाई । परखो जोति अधर फहराई ॥
धरती थंबन उदित अकासा । ता पर सूर करै परकासा ॥१॥
हीरा कोटि होय उँजियारी । बिना सुगंध पुहुप की बारी ॥२॥
चन्द्र लगन कीन्हा परकासा । चौदह जम जाके डरै तरासा ॥
गहो निरच्छर निस्चै डोरी । धर्मराय से तिनुका तोरी ॥४॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । यह निज भेद कहौँ परकासा ॥५॥
॥ शब्द ५ ॥
ऐसी आरत कहो समुझाई । जा सुमिरन तैँ काल नसाई ॥१॥
धरती थंब करो परकासा । चौदह जम जा की मानै त्रासा ॥२॥
अललपच्छ भृङ्गी तन बासा । सो निज भेद करो परकासा ॥३॥
पवन पचासी नाम कहि लीजै । पाछे ज्ञान सिँहासन दीजै ॥४॥
सुनौ कबीर कहै धर्मदासा । उदय दीप लौँ करौ प्रकासा ॥५॥
३

१८ आरती
॥ शब्द ६ ॥
आरति बंदीछोर समरथ की । चरन कँवल चित राखु पुरुष की ॥१॥
आरति सौँ भूमी पग धारे । सतजुग मेंँ सत सब्द उचारे ॥२॥
आरति सौँ जग प्रगटे आई । त्रेता मंदर नाम कहाई ॥३॥
आरति सौँ मुख मंगल गाये । द्वापर करुनामय कहवाये ॥४॥
आरति सौँ जग बंधी आसा । कलजुग केवल नाम प्रकासा ॥५॥
चारो जुग धर प्रगट सरीरा । आरत गावै धर्मदास कबीरा ॥६॥
॥ शब्द ७ ॥
धरमदास आरती साजा । पाँच तत्त मुख बेद उचारा ॥१॥
पहिले तेज पवन अरु पानी । रहे निरंतर अंतरजामी ॥२॥
गगन जोति गरजै असमाना । देखो दृष्टि धुजा फहराना ॥३॥
कोटि ब्रह्म जहाँ पढ़त पुराना । कोटि संभु धरैं उर ध्याना ॥४॥
कोटि बिष्नु बिनवै कर जोरी । और देव सब तैँ तिस क्रोरी ॥५॥
सेस सहसमुख निसु दिन गावै । अस्तुति करत पार नहिँ पावै ॥६॥
सतगुरु मिलैं तो भेद बतावैँ । पाँच तत्त लै अगम लखावैँ ॥७॥
कहैँ कबीर हंस-पति राई । धरमदास आरति फल पाई ॥८॥
॥ शब्द ८ ॥
हंस उवारि अपन करि लीन्हा । संझा आरति सुकिरत कीन्हा ॥१॥
पहिले आरति अलख बिराजै । ओअं सोहं ध्यान लगावै ॥२॥
गगन मँदिल बिच फूल एक फूला । तरे भई डार उपर भयो मूला ॥३॥
अखंड बिराजै ता की छाया । लख चौरासी के फंद छुड़ाया ॥४॥
साख से उपजि सकल संसारा । लख चौरासी से होइ रहु न्यारा ॥५॥
धरमदास बिनवै कर जोरी । गुरु प्रताप से आरति जोरी ॥६॥
॥ शब्द ९ ॥
संझा आरति नाम तुम्हारा । अनहद धुनि गुरु ज्ञान बिचारा ॥
तत्त का तेल काया की बाती । ब्रह्म अगिन अंदर धधकारी ॥

बिनती १९
पाँचो बाती निरमल करि बारी । सुरति चँवर लै सन्मुख झारी ॥
प्रेम कै पुहुप धूप धरो ध्याना । चित चंदन घसि अंग लगाना ॥
अद्भुत जोति अधर परगासा । आरति करै कबीर धर्मदासा ॥
॥ बिनती का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
गुरु पैयाँ लागौँ नाम लखा दीजो रे ॥ टेक ॥
जनम जनम का सोया मनुवाँ, सब्दन मार जगा दीजो रे ॥१॥
घट अँधियार नैन नहिँ सूझै, ज्ञान का दीप जगा दीजो रे ॥२॥
बिष की लहर उठत घट अंतर, अमृते बूँद चुवा दीजो रे ॥३॥
गहिरी नदिया अगम बहै धरवा, खेय के पार लगा दीजो रे ॥४॥
धरमदास की अरज गुसाँईँ, अब के खेप निभा दीजो रे ॥५॥
॥ शब्द २ ॥
भक्ति दान गुरु दीजिये देवन के देवा हो ।
चरन कँवल बिसरौँ नहीँ करिहौँ पद सेवा हो ॥१॥
तिरथ बरत मैं ना करौँ ना देवल पूजा हो ।
तुमहिँ ओर निरखत रहौँ मेरे और न दूजा हो ॥२॥
आठ सिद्धि नौ सिद्धि हैं बैकुंठ निवासा हो ।
सो मैं ना कछु माँगहूँ मेरे समरथ दाता हो ॥३॥
सुख सम्पति परिवार धन सुन्दर बर नारी हो ।
सुपनेहु इच्छा ना उठै गुरु आन तुम्हारी हो ॥४॥
धरमदास की बीनती साहेब सुनि लीजै हो ।
दरसन देहु पट खोलि कै आपन करि लीजै हो ॥५॥

३० बिनती
॥ शब्द ३ ॥
साहेब साहेबी तन हेरो ॥ टेक ॥
चंच पंख बिन जटा पखेरू, मम गति समझ सबेरो ।
अब जनि तजो मोहिँ यह खंडा, तुम सत लोक बसेरो ॥ १ ॥
निस बासर मोहिँ संसय ब्यापै, काम क्रोध मद घेरो ।
या से नाम लेन नहिँ पाऊँ, धृग जीवन जग मेरो ॥ २ ॥
प्रभु पद भिन्न भयो मैं जब से, देँह धरे बहुतेरो ।
त्रिबिधि ताप दुख सहे निरंतर, कबहुँ न भयो सुखेरो ॥ ३ ॥
मम हित जानि प्रान-पति सतगुरु, जुगन जुगन तुम टेरो ।
मैं अचेत प्रीति मोह बस, तुम तजि भयो अनेरो ॥ ४ ॥
मैं हौँ जीव तुम्हार दया-निधि, आदि अंत को चेरो ।
अब मोहिँ लेहु छुड़ाइ काल से, औगुन मेटो मेरो ॥ ५ ॥
बंदी-छोर सुनो करुना-मय, करो हिये बिच डेरो ।
धर्मदास पर दया कीजै, चौरासी से फेरो ॥ ६ ॥
॥ शब्द ४ ॥
साहेब दीनबंधु हितकारी ॥ टेक ॥
कोटिन ऐगुन बालक करई, मात पिता चित एक न धारी ॥१॥
तुम गुरु मात पिता जीवन के, मैं अति दीन दुखारी ॥ २ ॥
प्रनत-पाल करुना-निधान प्रभु, हमरी ओर निहारी ॥ ३ ॥
जुगन जुगन से तुम चलि आये, जीवन के हितकारी ॥ ४ ॥
सदा भरोसे रहूँ तुम्हारे, तुम प्रतिपाल हमारी ॥ ५ ॥
मोरे तुम हीँ सत्त सुकृत हौ, अंतर और न धारी ॥ ६ ॥
जानत हौ जन के तन मन की, अब कस मोहिँ बिसारी ॥ ७ ॥
को कहि सकै तुम्हारी महिमा, केहि न दिह्यो पद भारी ॥ ८ ॥
धरमदास पर दया कीन्हीँ, सेवक अहौँ तुम्हारी ॥ ९ ॥

विनती २१
॥ शब्द ५ ॥
साहेब मेटो चूक हमारी ॥ टेक ॥
बार बार मोहिँ दंड भयो है, चूक भई अति भारी ।
अब हम आये निकट तुम्हारे, अब मो तनहिँ निहारी ॥१॥
करुनामय तुम नाम धराये, तुम समरथ अब मेरो ।
ऐसी बिपति भई मोहिँ ऊपर, कोई ना हीत१ हमारो ॥२॥
तरसत जीव रहै निस बासर, जानि जनहिँ तुम दौरो ।
अब की चूक छिमा कर साहेब, अब सन्मुख ह्वै हेरो ॥३॥
तुम सतगुरू सकल सुख-दाता, सब्द पान दे तारो ।
धरमदास बिनवै कर जोरी, करौँ बंदगी तेरो ॥४॥
॥ शब्द ६ ॥
सुरति पर सतगुर धरि दियो बाढ़ ॥ टेक ॥
घर माँ रहौँ रहन नहिँ पावौँ,
घर के लोग मोहिँ देहिँ निकार ॥१॥
बाहर जावँ डाइन इक लागै,
सुनि पावै जिय डाहै मार ॥२॥
ऐसी बाढ़ धरो मोरे साहेब,
जहँ मारौँ तहँ पल्ले पार ॥३॥
धरमदास पर दाया कीजै,
साहेब कबीर दुख मेटनहार ॥४॥
॥ शब्द ७॥
बंदी छोर बिनती सुनि लीजै ॥ टेक ॥
कपट कुटिल अपराधी द्रोही, ठहरावो मन निस्चै ।
नाम तुम्हारा अधम उधारन, ता की दिच्छा दीजै ॥१॥
(१) हितकारी।

२२ बिनती
पाप पुन्न नहिँ जाँचन कीजै, काटि फंद अब दीजै ।
माँगूँ अपन सुभाव दयानिधि, सुनि अनुमान न कीजै ॥२॥
बिषे बिनास रहूँ निसु बासर, यह तन छिन छिन छीजै ।
साठ जन्म को हौँ अपराधी, अबकी छिमा प्रभु कीजै ॥३॥
सतगुरु नाम मुनींद्र कहाये, साहेब कबीर सुनि लीजै ।
धरमदास बिनवै कर जोरी, काटि चौरासी दीजै ॥४॥
॥ शब्द ८ ॥
कब तुम मिलिहौ कंथ कबीर ।
धर्मदास पर दाया कीजै, हंस लगावो तीर ॥१॥
भक्ति अचल औ दृढ़ बैरागा, पूरन ज्ञान गँभीर ।
जती सती संतोषी तुम्हीं, सब के दाता धीर ॥२॥
तुम प्रताप परवाह न केहु को, सागर सलिता नीर ।
एक बूंद दयाल मोहिँ दीजै, जाय जीव की पीर ॥३॥
महा कठोर कठिन मन मेरो, हरो ताहि की भीर ।
कामी क्रोधी भूठा लंपट, धारयो अधम सरीर ॥४॥
सुख करन और दुख हरन तुम, ऐसे मत के थीर ।
ज्ञानमंडन भर्मखंडन, दया सिन्धु कबीर ॥५॥
॥ शब्द ९ ॥
साहेब बूड़त नाव अब मोरी ॥ टेक ॥
काम क्रोध की लहर उठतु है, मोह पवन झकझोरी ।
लोभ मोरे हिरदे घुमरतु है, सागर वार न पारी ॥१॥
कपट की भँवर परतु है बहुतै, वा मेँ बेड़ा अटको ।
काल फाँस लिये है द्वारे, आया सरन तुम्हारी ॥२॥
धरमदास पर दाया कीन्ही, काटि फंद जिव तारी ।
कहैँ कबीर सुनो हो धर्मन, सतगुरु सरन उबारी ॥३॥

विनती २३
॥ शब्द १० ॥
बिन दरसन भइ बावरी, गुरु द्यो दीदार ॥ टेक ॥
ठाढ़ि जोहौँ तोरी बाट म, साहेब चलि आवो ।
इतनी दया हम पर करो, निज छबि दरसावो ॥ १ ॥
कोठरी रतन जड़ाव की, हीरा लागे किवार ।
ताला कुंजी प्रेम की, गुरु खोलि दिखावो ॥ २ ॥
बंदा भूला बंदगी, तुम बकसनहार ।
धर्मदास अरजी सुनो, भव पार करावो ॥ ३ ॥
॥ शब्द ११ ॥
दीना-नाथ दयाल, भक्त की पछ करौ ।
सरन आये की लाज, साहेब जन की करौ ॥ १ ॥
नौ दरवाजे विकार, धार नौका बगै१ ।
मेरि सुरत नहीं ठहराय, लगन कैसे लगै ॥ २ ॥
पाँच तत्त गुन तीन का, आदर साजिया ।
जम राखै बिलमाय, तो फंद न फंदिया ॥ ३ ॥
तिर्गुन फाँस का फंदा, माया मद जाल मेँ ।
भवसागर के बीच, महा जंजाल मेँ ॥ ४ ॥
भक्ति मुक्ति देव दान, दया जन पर करौ ।
नौका पार लगाय, दास अपनो करौ ॥ ५ ॥
साहेब कबीर बंदी-छोर, अरज एक मानिये ।
धर्मनि पतित उबारि, सरन मेँ आनिये ॥ ६ ॥
॥ शब्द १२ ॥
चरन छाँड़ि प्रभु जावँ कहाँ, मोरे और न कोई ।
जग मेँ आपन कोइ नहीं, देखा सब टोई ॥ १ ॥
(१) वगदै, बेठिकाने वहै ।

२४ विनती
मात पिता हित बंधु तुम, का से दुख रोई।
सब कछु तुम्हरे हाथ है, तुम्हरै मुख जोही ॥२॥
गुन तो मोरे है नहीं, औगुन बहुतेरे।
ओट लई तुम नाम की, राखो पत सोई ॥३॥
सतगुरु तुम चीन्हे बिना, मति बुधि सब खोई।
सब जीवन के एक तुम, दूजा नहिँ कोई ॥४॥
मैं गरजी अरजी करौँ, मरजी जस होई।
अरज बिपति लिखौँ आपनी, राखौँ नहिँ गोई ॥५॥
धरमदास सत साहेबी, घट घटहिँ समोई।
साहेब कबीर सतगुरु मिले, आवागवन न होई ॥६॥
॥ शब्द १३ ॥
साँईँ मैं असल गुलाम तिहारा ॥ टेक ॥
काया नगर बन्यो अति सुन्दर, मोह को लग्यो बजारा।
कुमति कलोल करै दसहोंँ दिसि, लोभ को ठुक्यो नगारा ॥१॥
मोह समुन्दर भरे अपरबल, भँवर भँवै¹ अति भारा।
काम क्रोध का लहर उठतु है, केहि बिधि होय निवारा ॥२॥
पाँच के ऊपर पचिस महतिया, इन परपंच पसारा।
मन अदली जहँ अदल चलावै, कहा करै जीव बिचारा ॥३॥
ना मोरे नाव नाहिँ खेवटिया, डर लागै मोहिँ भारी।
चौदह लोक मैं कोइ नहिँ दीसै, तुम गुरु पार उतारी ॥४॥
धरमदास की यही बीनती, उरझे को निर्वारो।
साहेब कबीर मिले गुरु समरथ, हम से अधम उबारो ॥५॥
(१) घूमैँ।

बिनती २५
॥ शब्द १४ ॥
मैँ तो तोरे भजन भरोसे अबिनासी ॥ टेक ॥
तीरथ बरत कछु नहिँ करहूँ, बेद पढ़ौँ नहिँ कासी ॥१॥
जंत्र मंत्र टोटका नहिँ जानौँ, निसु दिन फिरत उदासी ॥२॥
यहि घट भीतर बधिक बसत है, दिये लोभ की टाटी ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरो, सतगुरु चरनन दासी ॥४॥
॥ शब्द १५ ॥
साहेब बंदी-छोर हमारे ॥ टेक ॥
ठाढ़े बैठे चलत निहारे, जागत साँझ सवारे ।
करुना-सिंधु दया के आगर, नैनन के उँजियारे ॥१॥
बोलत बचन मीठ बहु लागै, पूरन पुरुष पियारे ।
उनकी रहनि गहनि जब पैहौ, होइ रहु सब से न्यारे ॥२॥
है बहु ज्ञान ध्यान बहुतैरो, खोलो गगन किवारे ।
दया सरूप बसै सिंधू मेँ, हीरा लाल निकारे ॥३॥
साहेब कबीर सदा के सतगुरु, हंसन के रखवारे ।
धरमदास पर दाया कीन्हा, आया सरन तुम्हारे ॥४॥
॥ शब्द १६ ॥
साहेब मोरी ओर निहारो ।
परजा पुत्र अहौँ मैँ साहेब, बहुत बात मैँ टारो ॥१॥
हौँ मैँ कोटि जनम को पापी, मन बच करम असारो ।
एकौ कर्म छुटे ना कवहूँ, बहु बिधि बात बिगारो ॥२॥
हौँ अपराधी बहुत जुगन को, नइया मोर उवारो ।
बंदीछोर सकल सुख-दाता, करुनामय करत पुकारो ॥३॥
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