धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 30, कुल 98 में से
संदर्भ में पढ़ेंआरती १७
जन्म अनेक बीति गयो मोरा । अब मैँ दरसन पायो तोरा ॥३॥
अबके आरत सतगुरु चीन्हा । सुरत लगाय बंदगी कीन्हा ॥४॥
अजर अमर है तुम्हरी काया । धरमदास गुरु सरनी आया ॥५॥
॥ शब्द ३ ॥
आरति मोहिँ तुम्हारी परम गुरु, आरति मोहिँ तुम्हारी ।
प्रातःकाल सकल बिधि पूरन, धारी साज सँवारी ॥१॥
नरियर पान बदाम छुहारा, लौंग लायची सारी ।
भाव भक्ति से गुरू हिलोरा, संत मिले फल चारी ॥२॥
दयावंत धरनी पग धारे, हरषि साधु संसारी ।
मेटे बंधन त्रास जिवन के, चिन्ता सकल निवारो ॥३॥
पूरन पुरुष सिँहासन राजे, सोभा बहु बिधि धारी ।
आरति करैँ संत सब गावैँ, धरमदास बलिहारी ॥४॥
॥ शब्द ४ ॥
ऐसी आरति दियो लखाई । परखो जोति अधर फहराई ॥
धरती थंबन उदित अकासा । ता पर सूर करै परकासा ॥१॥
हीरा कोटि होय उँजियारी । बिना सुगंध पुहुप की बारी ॥२॥
चन्द्र लगन कीन्हा परकासा । चौदह जम जाके डरै तरासा ॥
गहो निरच्छर निस्चै डोरी । धर्मराय से तिनुका तोरी ॥४॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । यह निज भेद कहौँ परकासा ॥५॥
॥ शब्द ५ ॥
ऐसी आरत कहो समुझाई । जा सुमिरन तैँ काल नसाई ॥१॥
धरती थंब करो परकासा । चौदह जम जा की मानै त्रासा ॥२॥
अललपच्छ भृङ्गी तन बासा । सो निज भेद करो परकासा ॥३॥
पवन पचासी नाम कहि लीजै । पाछे ज्ञान सिँहासन दीजै ॥४॥
सुनौ कबीर कहै धर्मदासा । उदय दीप लौँ करौ प्रकासा ॥५॥
३