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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

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पृष्ठ 29

१६ आरती
इहाँ मोर गाँव उहाँ मोर पाही १, बीचे अमरपुर धाम ॥४॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, तहाँ गाँव ना ठाँव ॥५॥
॥ शब्द १५ ॥
साँझ भई पियां बिन अकुलानी ॥ टेक ॥
देस देस ढूँढि फिरि आई, लोक लोक मैं छानी ।
कोइ न खोजै पिय अपने को, झुंड की झुंड गुमानी ॥१॥
आतुर जाय पूछै सखियन से, कहो पिय रूप बखानी ।
निरंकार सब के मन भावै, सुनि सुनि भे गलतानी ॥२॥
पुनि अकुलाय भवन को लौटी, त्रिकुटी महल समानी ।
सोहं सब्द सत्त दरसावै, वाही के रूप लोभानी ॥३॥
धन सतगुरु जीवन के दाता, दीन्हा नाम निसानी ।
कहैँ कबीर बहुत दिन बीता, धर्मनि तुम पहिचानी ॥४॥
॥ आरती का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
कैसे आरत करौँ तिहारी । महा मलिन गति देँह हमारी ॥१॥
मैलहिँ तैँ उपज्यो संसारा । मैं कैसे गुन गावौँ तुम्हारा ॥२॥
झरना झरै दसो दिस द्वारे । कस ढिंग आवौँ साहेब तुम्हारे ॥३॥
जो प्रभु देहु अगर की देँही । तब होवौँ मैं सब्द सनेही ॥४॥
मलयागिर मेंँ बसत भुवंगा । बिख अमृत रहै एकै संगा ॥५॥
तिनुका तोड़ दिया परवाना । तब हम पायौ पद निर्बाना ॥६॥
धर्मदास कबीर बल गाजै । गुरु परताप आरती साजै ॥७॥
॥ शब्द २ ॥
आरत गुरु कबीर की कीजै । जा के सेव जुगो जुग जीजै ॥१॥
संतन दया कीन्ह अधिकारी । सतसंगत मिलि अधम उधारी ॥२॥
(१) दूसरे गाँव की खेती ।