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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 98 में से

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पृष्ठ 22

उपदेश ९
सदा ना जान ये देही। लगावो नाम से नेही ॥ ७ ॥
कहै धर्मदास कर जोरी। चलो जहँ देस है तोरी ॥ ८ ॥
॥ उपदेश का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
सुचित होइ सब्द बिचारो हो ॥ टेक ॥
सब्द बिचार नाम धर दीपक, लै उर बारो हो।
जुगन जुगन कै अरुझनि, छन मेँ निरुवारो हो ॥ १ ॥
पंथे चलो गरीब होय, मद मोह निवारो हो।
साहेब नैन निकट बसै, सत दरस निहारो हो ॥ २ ॥
आपे जगत जिताइ के, मन सब से हारो हो।
जवन बिधी मनुवा मरे, सोइ भाँति सम्हारो हो ॥ ३ ॥
बास करो सत लोक मेँ, दुख नगर उजाड़ो हो।
धरमदास निज नाम पर, तन मन धन वारो हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
मन रहो आसन मारि, मँदिल से न डोलो हो ॥ टेक ॥
राते माते रहो, बहुत जनि बोलो हो।
निरखत परखत रहो, पलक जनि खोलो हो ॥ १ ॥
रजनी के दिहल किवार, सत कुंजी खोलो हो।
ते उँजियारि मेँ बैठि, निर्भय होइ खेलो हो ॥ २ ॥
चौका बना चौगान, जगमग अभिराज¹ हो।
रबि ससि की छबि निरखि, हंसा होइ गाज हो ॥ ३ ॥
ब्रह्मा बिष्नु महेस, निर्गुन अस्थूला हो।
हिलिमिलि करु सतसंग, फिरत कहाँ भूला हो ॥ ४ ॥
(१) सर्वोपरि, सब का राजा।
२