धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 23, कुल 98 में से
संदर्भ में पढ़ें१० उपदेश
गुरु के चरन धरु सीस, और सब त्यागो हो ।
जहाँ जहाँ तुम रहो, भक्ति बर माँगो हो ॥ ५ ॥
चमकत निर्मल रूप, झलकै जस हीरा हो ।
होइ मगन धर्मदास, बैठे तेहि तीरा हो ॥ ६ ॥
॥ शब्द ३ ॥
वा करता को सेइये, जिन सृष्टि उपाई ॥ टेक ॥
कोटिन ब्रह्मा बेद पढ़ि, पढ़ि जनम गँवाई ।
कोटिन बिष्णू होइ गये, कोइ पार न पाई ॥ १ ॥
तीर्थ गये कोइ ना तरै, चलि चलि मरि जाई ।
जल बिच आस लगाइ कै, मंगर¹ तन पाई ॥ २ ॥
भूठे पंडित बेद पढ़ि, पढ़ि जग भरमाई ।
उन के पुरखा मरि गये, उन काहे न जिआई ॥ ३ ॥
आदि अंत की बारता, सतगुरु से पावो ।
कह कबीर धर्मदास से, हंसा समुझावो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
का भरमत भटकत फिरो, करो खोज बनाई ।
मूल सब्द चीन्हे बिना, जिव जम लै जाई ॥ १ ॥
पान परवाना पाइ कै, निज लगन धरावो ।
जम की कला मिटाइ कै, लेव अंग चढ़ाई ॥ २ ॥
मूल सब्द हम कहि दिया, जुग जुग समुझाई ।
जो निस्चै करि मानिहै, तेहिँ लेँव बचाई ॥ ३ ॥
कह कबीर धर्मदास से, हम लीन्ह चिताई ।
अजर अमर घर लै चलूँ, जहँ काल न जाई ॥ ४ ॥
(१) मगर ।