सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 98 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 24

बिरह और प्रेम ११
॥ शब्द ५ ॥
सुरत निरत दोउ मतो¹ करत हैं, चलो सतगुरु पै जइये हो॥टेक॥
सतगुरु चीन्हि चरन चित लैये, दृष्टि से दृष्टि मिलइये हो ।
सतगुरु साह साध सौदागर, भक्ति पटो² लिखवइये हो ॥१॥
मन मानिक की खुलीँ किवरियाँ, चढ़गइ झमकि अटरिया हो।
नहिँ वहँ डोरि नहीं वहँ रसरी, अमर लोक कस पइये हो ॥२॥
है वहँ डोर सुरति कर सोभी³, गुरु के सब्द् चढ़ि जइये हो ।
घर है रमानो⁴ मेरो बगर⁵ रमानो, फूल रही फुल बगिया हो ॥३॥
अछै कमल पर बहै सुरसरी⁶, तहँ बैठे हंस नहइये हो ।
धरमदास की अरज गुसाँईँ, आवागवन मिटइये हो ॥४॥
॥ बिरह और प्रेम का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
सतगुरु आवो हमरे देस, निहारौँ बाट खड़ी ॥ टेक ॥
वाहि देस की बतियाँ रे, जावैँ संत सुजान ।
उन संतन के चरन पखारौँ, तन मन करौँ कुरबान ॥ १ ॥
वाही देस की बतियाँ हम से, सतगुरु आन कहो ।
आठ पहर के निरखत हमरे, नैन की नीँद गई ॥ २ ॥
भूल गई तन मन धन सारा, व्याकुल भया सरीर ।
बिरह पुकारै बिरहनी, ढरकत नैनन नीर ॥ ३ ॥
धरमदास के दाता सतगुरु, पल मेँ कियो निहाल ।
आवागवन की डोरी कटि गई, मिटे भरम जंजाल ॥ ४ ॥

(१) सलाह । (२) पट्टा । (३) सीधी । (४) रमनीक । (५) हाता । (६) गंगा ।