धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ बिरह और प्रेम
॥ शब्द २ ॥
मितउ मड़ैया सूनी करि गेलो ॥ टेक ॥
अपन बलम परदेस निकरि गेलो,
हमरा के कछुवो न गुन दै गेलो ॥ १ ॥
जोगिन होइ के मैं बन बन ढूँढ़ौँ,
हमरा के बिरह-बैराग दै गेलो ॥ २ ॥
सँग की सखी सब पार उतरि गेलीँ,
हम धन ठाढ़ी अकेली रहि गेलो ॥ ३ ॥
धरमदास यह अर्ज करतु है,
सार सब्द सुमिरन दै गेलो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३ ॥
नैन दरस बिन मरत पियासा ॥ टेक ॥
तुम्हीँ छाँड़ि भजूँ नहिँ औरै, नाहिँ दूसरी आसा ॥ १ ॥
आठो पहर रहूँ कर जोरी, करि लेहु आपन दासा ॥ २ ॥
निसु बासर रहूँ लव लीना, बिनु देखे नहिँ बिस्वासा ॥ ३ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, देहु निज लोक निवासा ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
साहेब चितवो हमरी ओर ॥ टेक ॥
हम चितवैँ तुम चितवो नाहीँ, तुम्हरो हृदय कठोर ॥ १ ॥
औरन को तो और भरोसा, हमैँ भरोसो तोर ॥ २ ॥
सुखमनि सेज बिछाओँ गगन मेँ, नित उठि करौँ निहोर ॥ ३ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, साहेब कबीर बन्दीछोर ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
मैँ हेरि रहूँ नैना सो नेह लगाई ॥ टेक ॥
राह चलत मोहिँ मिलि गये सतगुरु, सो सुख बरनि न जाई ।
देइ के दरस मोहिँ बौराये, लै गये चित्त चुराई ॥ २ ॥