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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

जीवन-चरित्र
दोहा- तुम ले जावो जिंद जी, हम करिवै फरहार ।
लंघन न करिहौं पीर जी, मानौं बचन तुम्हार ॥
चौपाई-दै प्रसाद उठि आसन आयेऊ। धरमदास फरहार मँगायेऊ ॥
सालिगराम को अर्पन कीन्हा। पुनि भोजन आपु ही कीन्हा ॥
लिये आचमन अमृत मीठे। आसन करि सुचित्त होइ बैठे ॥
पहर एक हरि चरचा भयेऊ। पुनि निद्रा करने को गयेऊ ॥
रैन सिरानी भयो बिहाना। नफर सहित उठि बाहिर आना ॥
धरमदास बंधो चलि आये। बाल गोपाल मनहि सुख पाये ॥
जिंद बचन जब हिरदे आये। अंतर गत बहुते सुख पाये ॥
आवै फिरि तब दरसन पाऊँ। पूछूँ आदि अंत चित लाऊँ ॥
दोहा-सत्त सत्त सब उन कही, जानि परै मोहिं सार ।
जिंद नाहिं कोइ पुरुष है, अस बोलै ब्रह्म हमार ॥
चौपाई-धरमदास मन कीन्ह बिचारा। देवँ महोच्छ करों भंडारा ॥
सीधा सामग्री बहुत मँगाई। भेष भगत तहँ बहुत बुलाई ॥
आये बैरागी औ ब्रह्मचारी। नागबीर आये दूधाधारी ॥
फलाहारी अन्नधारी आये। जोगी जिंद बहु भेष बनाये ॥
बहुत आये तपसी सन्यासी। जटा भभूत सुन्न बिस्वाली ॥
बाजै ताल मृदंग निसाना। संख नाद धुनि होइ निधाना ॥
आव भगत सबहिन को कीन्हा। इच्छा भोजन सब को दीन्हा ॥
सब को ज्ञान परख्यो धर्म्मदासा। लख्यो ज्ञान सब को बिनु सारा ॥
कोइ तीरथ कोइ मूर्त्ति बँधावै। कोइ कलि केवल नाम दृढ़ावै ॥
कोइ कृष्ण गोपालहिं गावै। कोइ दुर्गा सिव सक्ति धियावै ॥
जोगी अलख अलख उच्चरई। जिंद सुमिरै अल्लाह खोदाई ॥
सन्यासी राम देत ठहराई। परमहंस अबिनासी गाई ॥
दोहा-एक वात कोइ ना कहै, नाना मति परचंड ।
धर्म्मदास परखे मते, जानि परे पाखंड ॥
चौपाई-समुझि परौ ऐसो मन माहीं। जिंद का मता काहु सम नाहीं ॥
बरस दिना गिरही में रहेऊ। बहुत सुरत कासी की कियेऊ ॥
धर्म्मदास कासी चलि आये। हृदय हुती सो दरसन पाये ॥
मुक्तिरूप सुख अमृत बानी। नाम कबीर जगत गुरु ज्ञानी ॥
विमल विमल साखी पद गावै। जुरी भीर सबहिन समुझावै ॥
धर्म्मदास तहँ निरखै ठाढ़ा। चद चकोर जिमि आँखि पसारा ॥
पडित ज्ञानी सबै हराये। थाह कबीर की कोइ नहिं पाये ॥
धर्म्मदास चीन्हे मन माना। येहि जिंद तजि होय न आना ॥

जीवन-चरित्र
दोहा—पिरथम मोहि मथुरा मिले, बहुत बाद हम कीन्ह।
साँच साँच सब उन कही, मन हमार हर लीन्ह ॥
चौपाई—धर्म्मदास हरष मन कीन्हा। बहुरि पुरुष मोहिं दरसन दीन्हा ॥
अपने मन मे कीन्ह बिचारा। इनकर ज्ञान महा टकसारा ॥
दोइ दीन के करता कहाई। इनकर भेद कोउ नहिं पाई ॥
इतना कहि मन कीन्ह बिचारा। तब कबीर उन ओर निहारा ॥
आओ भक्त महाजन पगु धारो। चिहुँकि चिहुँकि तुम काह निहारो ॥
कहिये छिमा कुसल हौ नीके। सुरत तुम्हार बहुत हम झींके ॥
धर्म्मदास हम तुम को चीन्हा। बहुत दिनन में दरसन दीन्हा ॥
बहुत ज्ञान कहसी हम तुम्हीं। बहुरि के अब तुव चीन्हो हमहीं ॥
तुम तो भक्त हम जिंद फकीरा। सुधि करि देखो सत मत धीरा ॥
दोहा—भली भई दरसन मिले, बहुरि मिले तुम आय।
जो कोई मोसे मिलै, ते जुग बिछुरि न जाय ॥
चौपाई—सुनि धर्म्मदास हिये सुख भरे। सन्मुख धाइ पाँव जा परे॥
दया सिन्धु चितये भरि नैना। उठि धर्म्मदास अंक भरि लीन्हा॥
धर्म्मदास कबीर भे भेटा। सत्त सब्द के खुले कपाटा॥
परगट ज्ञान ध्यान की खानी। सत्त सब्द निज अमृत वानी ॥
जो कोइ सुनै चेत चित लाई। संसय टरै पाप छय जाई ॥
तुलसी साहेब के ग्रंथ घटरामायन में लिखा है कि कबीर साहेब काशी में
धर्म्मदास जी के घर गये जब वह मूर्त्ति पूजा कर रहे ,थे और बहुत से पंडित
और पुजारी जमा थे। कबीर साहेब ने पूछा कि धात की गढ़ी मूरत और
पत्थर की बटिया के पूजने का क्या फल है इस पर पुजारी बहुत बिगडे
और उनको नास्तिक और भला बुरा कह कर निकाल देना चाहा परन्तु
धर्म्मदास जी ने रोका और उनसे देर तक चर्चा करते रहे जिससे उनकी
कुछ शान्ति हुई। फिर कबीर साहेब ने मौज से यह चमत्कार दिखलाया कि
एक हिचकी लेकर अपने गले से शालग्राम की बटिया निकाल कर धर दी
और फिर उसको बुलाया तो वह हाथ पर आ बैठी। यह कौतुक देखकर
धर्म्मदासजी के चित्त में पूरी रीति से कबीर साहेब की महिमा बैठ गई और
अपनी स्त्री और पुत्रों को भी उनके चरणों पर गिराया। उनकी स्त्री और जेठे
पुत्र चूड़ामणि ने तो पूरे भाव से कबीर साहेब की शरण ली और उनको गुरू

जीवन चरित्र ७
धारण किया परन्तु छोटे बेटे नारायणदास ने नाक भैंव सिकोड़ ली और
कबीर साहेब को पाखंडी और जादूगर ठहराया।
इन दीनों कथाओं से संतों के इस वचन का प्रमाण मिलता है कि जब
स्वतः सत जगत में पधारते हैं तो अपनी निज अंश अर्थात् गुरुमुख को भी देर
सबेर लाते हैं और उसी के द्वारे सारी रचना को पवित्र करते हैं। यद्यपि
गुरुमुख को परमार्थ का चाव लड़कपन ही से रहता है परन्तु पहले माया का
पर्दा उस पर पड़ा रहता है-जब समय आता है तब सतगुरु उसे अपने
दर्शन और वचन से एक छिन में चेता देते हैं और माया के परदे को हटा देते
हैं। जैसे कबीर साहेब पहिले सत अवतार हुए ऐसे ही धनी धर्म्मदासजी
पहिले गुरुमुख प्रगट हुए जो कबीर साहेब की दया दृष्टि से संत गति को
प्राप्त हुए ।
धर्म्मदासजी ने कबीर साहेब की शरण लेने पर अपना सारा धन
दौलत लुटा दिया और काशी में गुरु चरणों मे रहने लगे। उनके पीछे उनके बड़े
बेटे चूड़ामणिजी ने भी वही ऊँचा पद पाया परन्तु नारायणदास संतों की साखी के
अनुसार काल के अवतार समझे जाते हैं।
कबीर साहेब के सम्वत् १५७५ मे परमधाम को सिधारने के पीछे
धर्म्मदास जी को उनकी गद्दी और सब ग्रंथ मिले और वह बहुत बरस तक
जगत जीवों को चेताते और संत मत दृढ़ात रहे। उनके गुप्त होने पर चूड़ा-
मणिजी को गद्दी हुई और सब ग्रंथ मिले सिवाय कबीर साहेब के बीजक के
जिसे भागू धर्म्मदासजी के गुरुभाई ने चोरा कर भगवान गोसाँईं के हाथ
मुक़ाम धनोली जिला तिरहुत को भेज दिया और फिर वहाँ अपनी गद्दी अलग
क़ायम की।
धर्म्मदास जी के शब्द हम पाँच बरस से इकट्ठा कर रहे हैं और उनकी
बाबत खास काशी के कबीरचौरा की गद्दी और दूसरे महंतों और कबीर पंथी
साधुओं से दरियाफ़्त किया तो मालूम हुआ कि उनके शब्द कहीं अलग पोथी
में लिखे नहीं हैं वरन कबीर साहेब की बानी मे मिल गये हैं। कहते हैं कि न
केवल वह पद जिन में अकेले धर्म्मदास जी का छाप है उनके रचे हुए हैं वरन

८ जीवन-चरित्र
वह भी जिन में कबीर साहेब और उनका दोनों का नाम है, क्योंकि अपने गुरू
कबीर साहेब का नाम भी धर्म्मदासजी ने अपने कितने पदों में सेवक भाव
से रख दिया है। इस सम्मति का प्रमाण अक्सर दोनों छापवाले पदों से
मिलता है जिन में साफ़ साफ़ धर्म्मदासजी की बिनती कबीर साहेब के
चरणों में है। इस हिसाब से आठ दस शब्द दोहरे छाप के जो हमने कबीर
साहेब की शब्दावली के पहिले और दूसरे भागों में छापे हैं और पूरी “ज्ञान
गुदड़ी” धर्म्मदास जी की समझी जायगी। जो हो अब उनको यहाँ दुबारा
छापने की ज़रूरत नहीं है पर वैसे और शब्द जो हमको प्रमाणिक कबीरपंथियों
ने धर्म्मदास जी की बानी कह कर दिये उन्हें हमने इस बानी मैँ शामिल
कर दिया है॥

धरमदास जी की शब्दावली ॰
॥ सतगुरु महिमा का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
गुरु मिले अगम के बासी ॥ टेक ॥
उनके चरन कमल चित दीजे, सतगुरु मिले अबिनासी ॥ १
उनकी सीत प्रसादी लीजे, छूटि जाय चौरासी ॥ २
अमृत बुंद झरै घट भीतर, साध संत जन लासी¹ ॥ ३
धरमदास बिनवै कर जोरी, सार शब्द मन बासी² ॥ ४
॥ शब्द २ ॥
गुरु मोहिँ खूब निहाल कियो ॥ टेक ॥
बूड़त जात रहे भवसागर, पकरि के बाँहि लियो ॥ १
चौदह लोक बसैँ जम चौदह, उनहुँ से छोरि लियो ॥ २
तिनुका तोरि दियो परवाना, माथे हाथ दियो ॥ ३
नाम सुना दियो कंठी माला, माथे तिलक दियो ॥ ४
धरमदास बिनवै कर जोरी, पूरा लोक दियो ॥ ५
॥ शब्द ३ ॥
सतगुरु धोबी जो मिलै, दिल दाग छोड़ावै ॥ टेक ॥
ब्रह्म अगिन परगट करै

२ सतगुरु महिमा का अंग
गुरु गम बानी ऊचरै, पुरुष दरसावै।
कह० कबीर धर्मदास से, अच्छर परसावै ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
सतगुरु चारिउ बरन से ऊँचे ॥ टेक ॥
ना मानो तौ साखि बताऔँ, सेवरी के फल रूचे ॥ १ ॥
राजा युधिष्ठिर जज्ञ रचो है, घंट न बाजे संत के रूसे ॥२॥
सुपच भगत जब ग्रास उठाये, बाजे घंट गगन चढ़ि ऊँचे ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, सतगुरु सब्द लगैँ मोहिँ नीके ॥४॥
॥ शब्द ५ ॥
अब गुरु मिले सनेही आई ॥ टेक ॥
चलो सखी जहँ जाइये, जहँ बसै पुरुष पुराना।
चरन चुरामनि १ चँवर डोलावै, तन की तपन बुझाई ॥ १ ॥
सुरति समानी सार सब्द में, निरत रही लव लाई।
प्रेम पियारी रटै पिया को, यह जिव पुलकित जाई ॥२॥
भवसागर औगाह अगम है, सूझै वार न पारा।
हंस उबारन सतगुरु आये, बही काढ़ि लै जाई ॥ ३ ॥
जन्म जन्म के हंस उबारन, अजहु उबारनहारा।
जा के साँची लगन लगी है, सो बोहि लोकै जाई ॥ ४ ॥
कह कबीर धर्मदास से, निरति रहो लौ लाई।
नाम पान जो पाँजी पावै, सो सतलोक बसाई ॥ ५ ॥
॥ शब्द ६ ॥
आज घड़ी आनन्द की, सतगुरु आये मोरे धाम हो ॥टेक॥
आये गुरुदेव सजन पठयो, भयो हरष अपार हो।
सकल सुन्दर साजि आरत, होत मंगलचार हो ॥ १ ॥
(१) धरमदास जी के पुत्र और गुरुमुख का नाम।

सतगुर महिमा ३
दियो दरसन मन लुभायो, सुन्यो बचन अमोल हो ।
अक्षय छाया सघन घन की, करत हंस कलोल हो ॥ २ ॥
दया कीन्हो निर्गुन दीन्हो, अपनी करि सैन हो ।
भक्ति मुक्ति सनेही सजनै, लियो परथम चीन्ह हो ॥ ३ ॥
भये कलमल दूर तन के, गई तपन नसाय हो ।
अटल पन्थ कबीर दीन्हा, धर्मदास लखाय हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७ ॥
मोरे पिया मिले सत ज्ञानी ॥ टेक ॥
ऐसन पिय हम कबहुँ न देखा, देखत सुरत लुभानी ॥ १ ॥
आपन रूप जब चीन्हा बिरहिन, तब पिय के मन मानी ॥ २ ॥
जब हंसा चले मानसरोवर, मुक्ति भरै जहँ पानी ॥ ३ ॥
कर्म जलाय के काजल कीन्हा, पढ़े प्रेम की बानी ॥ ४ ॥
धर्मदास कबीर पिय पाये, मिट गई आवाजानी ॥ ५ ॥
॥ शब्द ८ ॥
गुरु पद अहै सबन से' भारी ॥ टेक ॥
चारौ बेद तुलै नहिं गुरु पद, ब्रह्मा बिष्नु और ब्रह्मचारी ॥ १ ॥
नारद मुनि भये गुरुपद भजि कै, जपत सेस संकर की नारी ॥ २ ॥
सुर नर मुनि भये गुरुपद भजि कै, जपत राम अरु जनक दुलारी ॥ ३
धर्मदास मैं गुरुपद भजिहौँ, साहेब कबीर समरथ बलिहारी ॥ ४
॥ शब्द ९ ॥
हंस उबारन सतगुरु, जग में आइया ।
प्रगट भये कासी में, दास कहाइया ॥ १ ॥
बाम्हन औ सन्यासी, तो हाँसी कीन्हिया ।
कासी से मगहर आये, कोई नहिं चीन्हिया ॥ २ ।

ड़ीसा जाइ कै।"
Wait, "दरियाव," - there is a comma after दरियाव!
Yes: "दरियाव,".

Line 4:
"बिजुलीखाँव पठान, सो कबुर खोदाइया ।"
There is a comma after "पठान,"!

Line 5:
"बिजुलीसिंह बघेल, साजि दल१ आइया ॥ ४ ॥"
There is a comma after "बघेल,"!

Line 6:
"रानी पतिया पठाय, जीव जनि - मारिया ।"
Comma after "पठाय,"!

Line 7:
"मुरदा न होय कबीर, बहुरि पछिताइया ॥ ५ ॥"
Comma after "कबीर,"!

Line 8:
"खोदि के देखी कबुर, गुरु देँह न पाइया ।"
Comma after "कबुर,"!

Line 9:
"पान फूल लै हाथ, सेन१ फिरि आइया ॥ ६ ॥"
Comma after "हाथ,"!

Line 11:
"लछमि सहित जगन्नाथ, मिले तहँ धाइ कै ॥ ७ ॥"
Comma after "जगन्नाथ,"!

Line 12:
"पंडा पाखँड जानि कै, कौतुक कीन्हिया ।"
Comma after "कै,"!

Line 13:
"एक से अनँत कला होइ, दरसन दीन्हिया ॥ ८ ॥"
Comma after "होइ,"

नाम महिमा ५
पांडव जज्ञ सुफल ना होई, कोटिन जुरे अचारी ।
सुपच भक्त ने ग्रास उठायो, घंट बज्यो तब भारी ॥३॥
तच्छक आन डस्यौ रानी को, बिषम लहर तन भारी ।
रानी पर जब किरपा कीन्हाँ, उनहूँ को हंस उबारी ॥४॥
हरि को मंदिर बनन न पावै, समुँद लहर उठि भारी ।
आसा रूप कै समुँद हटायौ, तीरथ करै संसारी ॥५॥
जो जा सुमिरै सो ता प्रगटै, जग में नर अरु नारी ।
धरमदास पर किरपा कीन्हीं, हंसराज लखे भारी ॥६॥
जो जो सरन गही सतगुरु की, उबरे नर अरु नारी ।
साहेब कबीर मुक्ति के दाता, हम को लियो उबारी ॥७॥
॥ नाम महिमा का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
नाम रस ऐसा है भाई ॥ टेक ॥
आगे आगे दाहि चलै, पाछे हरियर होइ ।
बलिहारी वा बृच्छ की, जड़ काटे फल होइ ॥१॥
अति कडुवा खट्टा घना रे, वा को रस है भाई ।
साधत साधत साध गये हैं, अमली होय सो खाई ॥२॥
सूँघत के बौरा भये हो, पीयत के मरि जाई ।
नाम रस्स सो जन पिये, धड़ पर सीस न होई ॥३॥
संत जवारिस१ सो जन पीवै, जा को ज्ञान प्रगासा ।
धरमदास पी छकित भये हैं, और पिये कोइ दासा ॥४॥
(१) पेट के दर्द की दवा ।

६ नाम महिमा
॥ शब्द २ ॥
नाम रटन रट लागि रहै, कोइ साधु सयाना ॥ टेक ॥
साध के चाकर दुइ जना, बंका सुर¹ ज्ञाना² ।
सास अरप आगे धरो, तब बाँधो बाना ॥१॥
साहेब द्वारे भीड़ भे, बिरला ठहराना ।
कंचन कोट सुमेर बना, गज दीन्हा दाना ॥२॥
चाल चले गजराज की, अलमस्त समाना ।
सील तिलक बंस बेलि है, जम देखि डेराना ॥३॥
धरती मूल बिचारि के, तब धुनि उड़काना ।
कोटि गऊ को दान दे, नहिँ नाम समाना ॥४॥
कह कबीर धर्मदास से, पावै पद निर्बाना ।
आदि अंत की बारता, सतगुरु परवाना ॥५॥
॥ शब्द ३ ॥
चाकर हौँ निज नाम का, सुनो संत सिपाही ॥ टेक ॥
चरन कँवल सतगुरु दिया, हम सीस चढ़ाई ।
सत्त दरस ऐसे भया, गुरु कमर बँधाई ॥१॥
मारे मुरचा सब्द ले, भ्रम के गढ़ टूटे ।
अच्छर पुरुष एक वृक्ष है, तहँ लागे जाई ॥२॥
काँपन लागे दूतवा, चढ़े संत सिपाही ।
मारे गोला नाम के, सब फउज पराई ॥३॥
नौबत बाजै लोक मेँ, जीते जमराई ।
कह कबीर धर्मदास से, फिरी नाम दोहाई ॥४॥
(१) बाँका सूरमा । (२) ज्ञानी ।

चेतावनी ७
॥ शब्द ४ ॥
हम सत्त नाम के बैपारी ॥ टेक ॥
कोइ कोइ लादै काँसा पीतल, कोइ कोइ लौँग सुपारी ।
हम तो लाद्यौ नाम धनी को, पूरन खेप हमारी ॥ १ ॥
पूँजी न टूटै नफा चौगुना, बनिज किया हम भारी ।
हाट जगाती रोक न सकि है, निर्भय गैल हमारी ॥ २ ॥
मोती बुंद घट ही मेँ उपजै, सुकिरत भरत कोठारी ।
नाम पदारथ लाद् चला है, धर्मदास बैपारी ॥ ३ ॥
॥ चेतावनी का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
सब्द की बेरिया जात टरी ॥ टेक ॥
उहाँ सो आये का कहि आये, का करने लगे आन ।
इहाँ आइ परपंच भुलाने, बैठे अधम ठिकान ॥ १ ॥
भाई बंधु सुत कुटुम कबीला, ये कह जग मेँ नाम ।
तुम जाने उनहीँ सँग रहना, ठाढ़ काल मुसक्यान ॥ २ ॥
आये नाव काठ से 'बोझी, दिन दिन अति गुरुवाई ।
आगे जाम¹ लेइ कर लूटी, देइ छाती पर लाती ॥ ३ ॥
गहे सब्द ज्ञान कर दीपक, बैठे सत के पासा ।
साहेब कबीर हंसन के राजा, धरमदास निजु दासा ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
थोरे दिन की जिंदगी, मन चेत गँवार ॥ टेक ॥
कागद कै तन पुतरा, डोरी साहेब हाथ ।
नाना नाच नचावही, नाचै संसार ॥ १ ॥
(१) जम ।

प्रथम भाग: शब्द संग्रह (सतगुरु-महिमा, नाम एवं चेतावनी)

काच माटी कै घइलिया, भरि लै पनिहार।
पानी परत गल जावही, ठाढ़ी पछिताय ॥ २ ॥
जस धूआँ कै धरोहरा, जस बालू कै रेत।
हवा लगे सब मिटि गये, जस करतब प्रेत ॥ ३ ॥
ओछे जल कै नदिया हो, बहै अगम अपार।
उहाँ नाव नहिँ बेरा हो, कस उतरब पार ॥ ४ ॥
धरमदास गुरु समरथ हो, जा को अदल अपार।
साहेब कबीर सतगुरु मिले, आवा गवन निवार ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३ ॥
कहो केते दिन जियबौ हो, का करत गुमान ॥ टेक ॥
कच्चे बासन का पिँजरा हो, जा मेँ पवन समान।
पंछी का कौन भरोसा हो, छिन मेँ उड़ि जान ॥ १ ॥
कच्ची माटी कै घड़ुवा हो, रस बूंदैन सान।
पानी बीच बतासा हो, छिन मेँ गलि जान ॥ २ ॥
कागद की नइया बनी, डोरी साहेब हाथ।
जौने नाच नचैहैँ हो, नाचब वोही नाच ॥ ३ ॥
धरमदास एक बनिया हो, करै झूठी बजार।
साहेब कबीर बनजारा हो, करैँ सत बपार ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
घड़ा एक नीर का फूटा। पत्र एक डार से टूटा ॥ १ ॥
ऐसहि नर जात जिंदगानी। अजहु नहिँ चेत अभिमानी ॥ २ ॥
भुलो जनि देख तन गोरा। जगत मेँ जीवना थोरा ॥ ३ ॥
निकरि जब प्रान जावैगा। कोई नहिँ काम आवैगा ॥ ४ ॥
सजन परिवार सुत दारा। सभे एक रोज होइ न्यारा ॥ ५ ॥
तजो मद लोभ चतुराई। रहो निरसंक जग माहीं ॥ ६ ॥

उपदेश ९
सदा ना जान ये देही। लगावो नाम से नेही ॥ ७ ॥
कहै धर्मदास कर जोरी। चलो जहँ देस है तोरी ॥ ८ ॥
॥ उपदेश का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
सुचित होइ सब्द बिचारो हो ॥ टेक ॥
सब्द बिचार नाम धर दीपक, लै उर बारो हो।
जुगन जुगन कै अरुझनि, छन मेँ निरुवारो हो ॥ १ ॥
पंथे चलो गरीब होय, मद मोह निवारो हो।
साहेब नैन निकट बसै, सत दरस निहारो हो ॥ २ ॥
आपे जगत जिताइ के, मन सब से हारो हो।
जवन बिधी मनुवा मरे, सोइ भाँति सम्हारो हो ॥ ३ ॥
बास करो सत लोक मेँ, दुख नगर उजाड़ो हो।
धरमदास निज नाम पर, तन मन धन वारो हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
मन रहो आसन मारि, मँदिल से न डोलो हो ॥ टेक ॥
राते माते रहो, बहुत जनि बोलो हो।
निरखत परखत रहो, पलक जनि खोलो हो ॥ १ ॥
रजनी के दिहल किवार, सत कुंजी खोलो हो।
ते उँजियारि मेँ बैठि, निर्भय होइ खेलो हो ॥ २ ॥
चौका बना चौगान, जगमग अभिराज¹ हो।
रबि ससि की छबि निरखि, हंसा होइ गाज हो ॥ ३ ॥
ब्रह्मा बिष्नु महेस, निर्गुन अस्थूला हो।
हिलिमिलि करु सतसंग, फिरत कहाँ भूला हो ॥ ४ ॥
(१) सर्वोपरि, सब का राजा।
२

१० उपदेश
गुरु के चरन धरु सीस, और सब त्यागो हो ।
जहाँ जहाँ तुम रहो, भक्ति बर माँगो हो ॥ ५ ॥
चमकत निर्मल रूप, झलकै जस हीरा हो ।
होइ मगन धर्मदास, बैठे तेहि तीरा हो ॥ ६ ॥
॥ शब्द ३ ॥
वा करता को सेइये, जिन सृष्टि उपाई ॥ टेक ॥
कोटिन ब्रह्मा बेद पढ़ि, पढ़ि जनम गँवाई ।
कोटिन बिष्णू होइ गये, कोइ पार न पाई ॥ १ ॥
तीर्थ गये कोइ ना तरै, चलि चलि मरि जाई ।
जल बिच आस लगाइ कै, मंगर¹ तन पाई ॥ २ ॥
भूठे पंडित बेद पढ़ि, पढ़ि जग भरमाई ।
उन के पुरखा मरि गये, उन काहे न जिआई ॥ ३ ॥
आदि अंत की बारता, सतगुरु से पावो ।
कह कबीर धर्मदास से, हंसा समुझावो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
का भरमत भटकत फिरो, करो खोज बनाई ।
मूल सब्द चीन्हे बिना, जिव जम लै जाई ॥ १ ॥
पान परवाना पाइ कै, निज लगन धरावो ।
जम की कला मिटाइ कै, लेव अंग चढ़ाई ॥ २ ॥
मूल सब्द हम कहि दिया, जुग जुग समुझाई ।
जो निस्चै करि मानिहै, तेहिँ लेँव बचाई ॥ ३ ॥
कह कबीर धर्मदास से, हम लीन्ह चिताई ।
अजर अमर घर लै चलूँ, जहँ काल न जाई ॥ ४ ॥
(१) मगर ।

बिरह और प्रेम ११
॥ शब्द ५ ॥
सुरत निरत दोउ मतो¹ करत हैं, चलो सतगुरु पै जइये हो॥टेक॥
सतगुरु चीन्हि चरन चित लैये, दृष्टि से दृष्टि मिलइये हो ।
सतगुरु साह साध सौदागर, भक्ति पटो² लिखवइये हो ॥१॥
मन मानिक की खुलीँ किवरियाँ, चढ़गइ झमकि अटरिया हो।
नहिँ वहँ डोरि नहीं वहँ रसरी, अमर लोक कस पइये हो ॥२॥
है वहँ डोर सुरति कर सोभी³, गुरु के सब्द् चढ़ि जइये हो ।
घर है रमानो⁴ मेरो बगर⁵ रमानो, फूल रही फुल बगिया हो ॥३॥
अछै कमल पर बहै सुरसरी⁶, तहँ बैठे हंस नहइये हो ।
धरमदास की अरज गुसाँईँ, आवागवन मिटइये हो ॥४॥
॥ बिरह और प्रेम का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
सतगुरु आवो हमरे देस, निहारौँ बाट खड़ी ॥ टेक ॥
वाहि देस की बतियाँ रे, जावैँ संत सुजान ।
उन संतन के चरन पखारौँ, तन मन करौँ कुरबान ॥ १ ॥
वाही देस की बतियाँ हम से, सतगुरु आन कहो ।
आठ पहर के निरखत हमरे, नैन की नीँद गई ॥ २ ॥
भूल गई तन मन धन सारा, व्याकुल भया सरीर ।
बिरह पुकारै बिरहनी, ढरकत नैनन नीर ॥ ३ ॥
धरमदास के दाता सतगुरु, पल मेँ कियो निहाल ।
आवागवन की डोरी कटि गई, मिटे भरम जंजाल ॥ ४ ॥

(१) सलाह । (२) पट्टा । (३) सीधी । (४) रमनीक । (५) हाता । (६) गंगा ।

१२ बिरह और प्रेम
॥ शब्द २ ॥
मितउ मड़ैया सूनी करि गेलो ॥ टेक ॥
अपन बलम परदेस निकरि गेलो,
हमरा के कछुवो न गुन दै गेलो ॥ १ ॥
जोगिन होइ के मैं बन बन ढूँढ़ौँ,
हमरा के बिरह-बैराग दै गेलो ॥ २ ॥
सँग की सखी सब पार उतरि गेलीँ,
हम धन ठाढ़ी अकेली रहि गेलो ॥ ३ ॥
धरमदास यह अर्ज करतु है,
सार सब्द सुमिरन दै गेलो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३ ॥
नैन दरस बिन मरत पियासा ॥ टेक ॥
तुम्हीँ छाँड़ि भजूँ नहिँ औरै, नाहिँ दूसरी आसा ॥ १ ॥
आठो पहर रहूँ कर जोरी, करि लेहु आपन दासा ॥ २ ॥
निसु बासर रहूँ लव लीना, बिनु देखे नहिँ बिस्वासा ॥ ३ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, देहु निज लोक निवासा ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
साहेब चितवो हमरी ओर ॥ टेक ॥
हम चितवैँ तुम चितवो नाहीँ, तुम्हरो हृदय कठोर ॥ १ ॥
औरन को तो और भरोसा, हमैँ भरोसो तोर ॥ २ ॥
सुखमनि सेज बिछाओँ गगन मेँ, नित उठि करौँ निहोर ॥ ३ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, साहेब कबीर बन्दीछोर ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
मैँ हेरि रहूँ नैना सो नेह लगाई ॥ टेक ॥
राह चलत मोहिँ मिलि गये सतगुरु, सो सुख बरनि न जाई ।
देइ के दरस मोहिँ बौराये, लै गये चित्त चुराई ॥ २ ॥

विरह और प्रेम १३
छबि सत दरस कहाँ लगि बरनौँ, चाँद सुरज छपि जाई ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, पुनि पुनि दरस दिखाई ॥४॥
॥ शब्द ६ ॥
कहौँ बुझाय दरद पिय तो से ॥ टेक ॥
दरद मिटै तरवार तीर से।
किधौँ मिटै जब मिलहुँ पीव से ॥ १ ॥
तन तलफै हिय कछु न सोहाय ।
तोहि बिन पिय मो से रहल न जाय ॥ २ ॥
धरमदास की अरज गुसाँईं ।
साहेब कबीर रहौँ तुम छाँहीँ ॥ ३ ॥
॥ शब्द ७ ॥
आज मेरे सतगुरु आये मिहमान ।
तन मन जिवड़ा करौँ कुरबान ॥ १ ॥
फूली फिरौँ न अंग समान ।
सतगुरु आवन सुनि लये कान ॥ २ ॥
चंदन चौकी अँगना बिछान ।
ता पर बैठे सतगुरु आन ॥ ३ ॥
फूलन हार गले पहिरान ।
चंद चकोर ज्योँ इकटक ध्यान ॥ ४ ॥
चरन धोय चरनोदक पान ।
सगले पाप मोचन किये आन ॥ ५ ॥
प्रेम सहित बिंजन पकवान ।
कंचन थाल सजाये आन ॥ ६ ॥
हाथ जोरि पुनि बिनती ठान ।
जेँवौ सतगुरु पुरुष पुरान ॥ ७ ॥

१४ बिरह और प्रेम
सीत प्रसाद सतगुरु दियो दान ।
जम किंकर को मर्दन मान ॥ ८ ॥
धर्मदास अमन गुजरान ।
साहेब कबीर निछावर प्रान ॥ ६ ॥
॥ शब्द ८ ॥
मोरा पिया बसै कौने देस हो ॥ टेक ॥
अपने पिया के ढुंढ़न हम निकसीँ, कोइ न कहत सनेस हो ॥१॥
पिया कारन हम भई हैं बावरी, धरो जोगिनिया कै भेस हो ॥२॥
ब्रह्मा बिष्नु महेस न जाने, का जानै सारद सेस हो ॥३॥
धनि जो अगम अगोचर पइलन, हम सब सहत कलेस हो ॥४॥
उहाँ कै हाल कबीर गुरु जानैँ, आवत जात हमेस हो ॥५॥
॥ शब्द ९ ॥
सजन से प्रीत मोहिँ लागी । दरस को भयो अनुरागी ॥१॥
नहीँ बैराग मोहिँ आवै । साहेब के गुन नितै गावै ॥२॥
अभरन भूषन तनै साजूँ । पिया को देखि हँस हुलसूँ ॥३॥
भया

बरह और प्रेम १५
लाल साहेब की लालिनि मूरत, लालि लालि अनुहरिया हो ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, गुरु के चरन बजिहरिया हो ॥४॥
॥ शब्द ११॥
साजन हमरे दरस सतगुरु के ॥ टेक ॥
अपने सजन को आवत देखूँ, दरसन करूँ नैन भरि भरि के ॥१॥
चरन धोइ चरनामृत लेहूँ, जूठन पाउँ पेट भरि भरि के ॥२॥
नीचा कर्म काटि गुरु दीन्हा, चरन कँवल पै सीस धरि धरि के ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, भव उतरूँ सतनाम सुमिरि के ॥४॥
॥ शब्द १२ ॥
गुरु मोहिँ सजीवन मूर दई ॥ टेक ॥
तन लागि गुरदिच्छा दीन्हीं, जन्म जन्म को मोल लई ॥१॥
दिन दिन औगुन छूटन लागे, बाढ़न लागी प्रीति नई ॥२॥
मानिक सुंभ से मानिक उपजै, हीरा हंस से भेंट भई ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, दिल की दुर्मति दूर भई ॥४॥
॥ शब्द १३ ॥
पिया बिन मोहिँ नीँद न आवै ॥ टेक ॥
खन गरजै खन बिजुली चमकै, ऊपर से मोहिँ झाँकि दिखावै ॥१॥
सासु ननद घर दारुनि आहैं, नित मोहिँ बिरह सतावै ॥२॥
जोगिन ह्वै के मैं बन बन ढूँढूँ, कोउ न सुधि बतलावै ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, कोइ नेरे कोइ दूर बतावै ॥४॥
॥ शब्द १४ ॥
पिया बिना मोहिँ नीक न लागै गाँव ॥ टेक ॥
चलत चलत मोरे चरन दुखित भे, आँखिन परिगै धूर ॥१॥
आगे चलूँ पंथ नहिँ सूझै, पाछे परै न पाँव ॥२॥
ससुरे जाउँ पिया नहिँ चीन्है, नैहर जात लजाउँ ॥३॥

१६ आरती
इहाँ मोर गाँव उहाँ मोर पाही १, बीचे अमरपुर धाम ॥४॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, तहाँ गाँव ना ठाँव ॥५॥
॥ शब्द १५ ॥
साँझ भई पियां बिन अकुलानी ॥ टेक ॥
देस देस ढूँढि फिरि आई, लोक लोक मैं छानी ।
कोइ न खोजै पिय अपने को, झुंड की झुंड गुमानी ॥१॥
आतुर जाय पूछै सखियन से, कहो पिय रूप बखानी ।
निरंकार सब के मन भावै, सुनि सुनि भे गलतानी ॥२॥
पुनि अकुलाय भवन को लौटी, त्रिकुटी महल समानी ।
सोहं सब्द सत्त दरसावै, वाही के रूप लोभानी ॥३॥
धन सतगुरु जीवन के दाता, दीन्हा नाम निसानी ।
कहैँ कबीर बहुत दिन बीता, धर्मनि तुम पहिचानी ॥४॥
॥ आरती का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
कैसे आरत करौँ तिहारी । महा मलिन गति देँह हमारी ॥१॥
मैलहिँ तैँ उपज्यो संसारा । मैं कैसे गुन गावौँ तुम्हारा ॥२॥
झरना झरै दसो दिस द्वारे । कस ढिंग आवौँ साहेब तुम्हारे ॥३॥
जो प्रभु देहु अगर की देँही । तब होवौँ मैं सब्द सनेही ॥४॥
मलयागिर मेंँ बसत भुवंगा । बिख अमृत रहै एकै संगा ॥५॥
तिनुका तोड़ दिया परवाना । तब हम पायौ पद निर्बाना ॥६॥
धर्मदास कबीर बल गाजै । गुरु परताप आरती साजै ॥७॥
॥ शब्द २ ॥
आरत गुरु कबीर की कीजै । जा के सेव जुगो जुग जीजै ॥१॥
संतन दया कीन्ह अधिकारी । सतसंगत मिलि अधम उधारी ॥२॥
(१) दूसरे गाँव की खेती ।