दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary
जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा
द्वितीय खण्ड: उत्तराधिकार क्रम एवं दायभाग उपसंहार
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अन्वय-सरल है—
पितृभ्यां = माता पिता ने, पूर्व विभक्त पुत्रों में किसो को
यद्दत्तं = जो कुछ अलंकारादि दिया, हो तत्तस्यैवधनं भवेत्-वह उसी का
धन होगा ।
पिता के मरण पश्चात् विभाग में माता काभी अंश है—
पितुरूर्ध्वं विभजतां = पिता के ऊर्ध्वलोक जाने के पश्चात्
माताप्यंश समं हरेत् = माता भी समान अंश ग्रहण करे ।
१—यदि स्त्री धन प्राप्त न हो तभी समान अंश है अथवा
“दत्ते त्वर्द्धांशहारिणी” अर्ध अंश की अधिकारिणी है ।
पिता के मरजाने पर असंस्कृत भाई हैं तो उनके संस्कार
की व्यवस्था—
असंस्कृतास्तु संस्कार्या भ्रातृभिः पूर्व संस्कृतैः
भगिन्यश्च निजादंशाद्दत्त्वैशंतु तुरीयकम् ।११।
अन्वयः—
असंस्कृतास्तु पूर्व संस्कृतैः भ्रातृभिः संस्कार्या
भगिन्यश्च निजादंशात् तुरीयकम् अंशं दत्वा
[ संस्कार्या ]
पिता के पश्चात् विभक्त होने वाले भाइयों को = पूर्व
संस्कृतैः = जिनका पहिले संस्कार हो चुका है, असंस्कृताः = असंस्कृत
भाइयों का संस्कार्या = संस्कार करना चाहिये । भगिन्यश्च = बहिनों
को भी, यदि उनका संस्कार नहीं हुआ है तो संस्कार कराना चाहिये
निजादंशात् तुरीयकम् दत्त्वा—अपने अंश से चतुर्थ भाग निकाल कर
विशेषः—
१-कन्या ब्राह्मणी है तो ब्राह्मण भाई का अंश ¼ लेगी
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२—१ ब्राह्मणी पत्नी, १ कन्या १ पुत्र है तो पिता के धन
के १/२ भाग करके १ भाग के १/४ भाग करके चतुर्थांश भाग कन्या को
देकर शेष को पुत्र ले
३—यदि १ पुत्र २ कन्या हैं तो पितृधन को १/३ करके १ भाग
को १/४ भाग करके चतुर्थांश दे ।
४—यदि ब्राह्मणी पुत्र १ क्षत्रिय कन्या १ तब ७ भाग करके
क्षत्रिया पुत्र भाग को ४/३ विभाग करके चतुर्थांश क्षत्रिया को दे शेष को
ब्राह्मणी पुत्र ले ।
५—यदि २ ब्राह्मणी पुत्र—१ क्षत्रिय कन्या तब ११ १ ३
अंशों को क्षत्रिया पुत्र भाग को ४ में बांटे चतुर्थांश क्षत्रिया कन्या के
दे शेष को ब्राह्मणी पुत्र बांट लें ।
६—जीवित पिता कुछ भाग कन्या को दे वही उसका है ।
पूर्व निर्णय समान जातीय भाइयों के सम्बन्ध में है अब
भिन्न जातीय भ्राताओं का विभाग लिखा जाता है—
चतुस्त्रिद्व्येक भागाः स्युर्वर्णशो ब्राह्मणात्मजाः
क्षत्रजास्त्रिद्व्येक भागा विड्जास्तु द्व्येक भागिनः॥१२॥
अन्वयः—
ब्राह्मणात्मजाः वर्णशः चतुः त्रि द्वि एक भागास्युः
क्षत्रजा स्त्रि द्वि एक भागा, विड्जास्तु द्वि एक भागिनः।
ब्राह्मणादि वर्ग की स्त्रियों की सन्तति का विभाजन
ब्राह्मणात्मजाः वर्णशः—वर्ण वर्ण में ब्राह्मण से उत्पन्न यथा क्रम,
४, ३, २, १ भाग प्राप्त करें ।
ब्राह्मण द्वारा ब्राह्मणी में उत्पन्न एक-एक—४-४ भाग ले
ब्राह्मण द्वारा क्षत्रिय में उत्पन्न, प्रत्येक—३,३ भाग लें
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,, ,, वैश्या में उत्पन्न प्रत्येक-२-२ भाग लें
,, ,, शूद्रा में उत्पन्न प्रत्येक-१-१ भाग लें
ब्राह्मण चारों वर्ण की पत्नी रख सकता है, क्षत्रिय, ३ वर्ण
की वैश्य २ वर्ण की शूद्र एक ही ।
१- ब्राह्मण से उत्पन्न क्षत्रियादि वर्ण की पत्नी में उत्पन्न
सुत को भूमि प्राप्ति का अधिकार नहीं है यदि पिता दे भी दे तो
उसकी मृत्यु के पश्चात् उनसे वापिस लेने का ब्राह्मणी पुत्र को
अधिकार है ।
सर्व विभाग शेष व्यवस्था—
अन्योन्यापहृतं द्रव्यं विभक्ते यत्तु दृश्यते
तत्पुनस्ते समैरंशैर्विभजेरन्निति स्थितिः ॥१३॥
अन्वय सरल है ।
अन्योन्यापहृतं द्रव्यं = सबका मिश्रित धन परस्पर हरण
किया गया भी—विभक्ते ० ==विभक्त हो जाने पर दिखाई दे जाय,
तत्पुनस्ते समैरंशैः—तो उसे फिर से समान अंशों के द्वारा, विभजेरन्
इतिस्थितिः = बांट ले यह शास्त्र मर्यादा है ।
विशेषः—
१—जिस पर वह धन दिखाई दे उसे भाग न दिया जाय
२—समुदाय में स्थित द्रव्य का अपहरण दोष जनक नहीं
३—मनु के मतानुसार ज्येष्ठ यदि अपहरण करे तो दोष
भागी है कनिष्ठ नहीं ।
(मनु०६। २१३)
४—साधारण द्रव्य जिसमें निज अधिकार भी है ग्रहण
करने में दोष नहीं ।
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द्वयामुष्यायण का भाग—
अपुत्रेण पर क्षेत्रे नियोगोत्पादितः सुतः
उभयो रप्यसौ रिक्थी पिण्ड दाता चधर्मतः ॥१४॥
अन्वय सरल—है
अपुत्रेण = देवर आदि ने, पर क्षेत्रे = पर भार्या में नियो
गोत्पादितः सुतः = गुरु नियोग से उत्पन्न किया पुत्र उभयोरपि रिक्थी
बीजि क्षेत्री इन दोंनो का धन लेंने व पिण्ड दान करने में समर्थ है
१—जो देवरादि नियुक्त किया गया हो वह अपुत्र हो
२—यदि नियोग कर्ता सपुत्र है जो सन्तति क्षेत्री की होगी
बीजी की नही ।
३—मनु के अनुसार—‘नियोग, देवर–सपिण्ड ही कर
सकता है ।
४—विधवा में नियोग विधि वर्जित है
५—बड़े भ्राता की मृत्यु के पश्चात्, यदि वाग्दान हो चुका
हैं तो छोटा भाई उस स्त्री का पतिबन सकता है ।
मुख्य--गौण पुत्रों की दाय ग्रहण व्यवस्था—
औरसो धर्मपत्नीजस्तत्समः पुत्रिका सुतः
क्षेत्रजः क्षेत्रजातास्तु सगोत्रेणोतरेण वा । १५ ।
अन्वय सरल—
औरसो धर्म पत्नीजः—सवर्ण विवाहिता में उत्पन्न पुत्र
औरस कहलाता है, तत्समः पुत्रिका सुतः—उसके समान लड़की का
लड़का भीं है, क्षेत्रजः०—इतर सपिण्ड या देवर से क्षेत्रजात तु--क्षेत्र
में उत्पन्न, पुत्र क्षेत्रज कहलाता है ।
( १३ )
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विशेष:—
१ पुत्रिका सुत--विवाह के समय वचन पूर्वक दी गई कन्या
कि इसमें उत्पन्न पुत्र मेरा होगा पुत्रिका सुत कहलाता है ।
गूढ़ज--कानीन पुत्रों की परिभाषा—
गृहे प्रच्छन्न उत्पन्नो गूढजस्तु सुतः स्मृतः ।
कानीनः कन्यका जातो मातामह सुतो मतः ॥ १६॥
गूढजस्तु सुतः गृहे प्रच्छन्न उत्पन्नः--गूढज पुत्र वह कहलाता
है जो पति के घर में ही हीनाधिक जाति के पुरुष से उत्पन्न हुआ हो ।
कानीन०--कन्य का में उत्पन्न पुत्र कानीन कहलाता है यह
नाना का पुत्र कहलाता है ।
१-मनु ने भी कहा है—
पितृ वेश्मनि कन्या तु यं पुत्रं जनयेद्रहः
तं कानीनं वदेन्नाम्ना वोढुः कन्य समुद्भवम् ॥
पौन र्भव--दत्तक की परिभाषा—
अक्षतायां क्षतायां वा जातः पौनर्भवः सुतः
दद्यान्माता पिता वा यं स पुत्रो दत्तको भवेत् ॥
अन्वय सरल—
अक्षतायां०--अक्षत या क्षत—पनर्भुस्त्री में सवर्ण से
उत्पन्न पुत्र पौनर्भव कहलाता है । दद्यान्माता पिता वायं—जिसे माता
पति की आज्ञा लेकर पति की मृत्यु के पश्चात् या दोनों जिसे दे दें वह
पुत्र दत्तक कहलाता है ।
विशेष:—
१—आपत्ति में पुत्र दिया जाय यह मनुका मत हैं
उनसे विहीन
हो कर मैं तुम्हारा पुत्र हूँ ऐसे स्वयं दत्त त्व प्राप्त करे वह दत्तात्मा
कहलाता है ।
सहोढजः—गर्भ वती स्त्री को विवाह कर लाये, उससे
उत्पन्न पुत्र सहोढज कहलाता है ।
उत्सृष्ट ---अपविद्ध का लक्षण—
उत्सृष्टो गृह्यते यस्तु सोऽपविद्धो भवेत्सुतः ।
उत्सृष्टः = माता पिता के द्वारा त्यागे गये को, गृह्यते = जो
ग्रहण करता है, सोऽपविद्धो भवेत्सुतः = वह अपविद्ध कहलाता है
दाय ग्रहण में क्रम—
पिण्डदों ऽशहर श्चैषां पूर्वा भावे परः, परः ।१९।
एषां पूर्वाभा वे परः परः पिण्डदः अंश हरश्च ।
एषां = पूर्वोक्त द्वादश पुत्रों में पूर्व पूर्व के अभाव में पर
पर पिण्ड दान एवं अंश ग्रहण का अधिकारी है ।
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- :
२—एक पुत्र के देने का निषेध है । अर्थात् जिसके कई(Note:
- :
( १५ )
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विशेषः—
१—ओरस पुत्र उत्पन्न होने पर सवर्ण अन्य पुत्रों को
चतुर्थांश दिया जाय
२—असवर्णा पुत्रों को वस्त्र तथा भोजनादि मात्र । यह
का त्यायन कामत है ।
३—औरस—क्षेत्रज—दत्त—कृत्रिम—गूढोत्पन्न—अपविद्ध—
ये छः दाया द हैं
४—कानीन—सहोढ—क्रीत—पौन र्भव—स्वयंदत्त शौद्र ६ अदा
याद बन्धु हैं ।
[ मनु ६।१५६।१६० ]
सजातीयेष्वयं प्रोक्तस्तनयेषु मयाविधिः
यह विधि सजातीय तनयों के वारे में कही गई है ।
१—पूर्वा भावे परः—परः यह सजातीय विषयक है ।
२—शूद्रा पुत्र औरस होतो भी अन्याभाव में भी भाग
पाने का अधिकारी नहीं ।
शूद्र धन भाग में विशेष—
जातोऽपिदास्याँ शूद्रेण कामतोंऽशहरोभवेत् ।१६।
मृते पितरि कुर्युस्तं भ्रातर स्त्वर्ध भागिकम्
अभ्रातृ को हरेत्सवं दुहितृणाँ सुताहते ॥२०
अन्वयः—
शूद्रेण दास्यां जातः कामतः अंशहरः भवेत् । शूद्र से दासी
में उत्पन्न पुत्र, कामतः=पिता की इच्छा से—भाग प्राप्त कर सकता
है । मृते पितरि=पिता के मरने पर भाई दासी पुत्र को अर्ध
भागी बनाये :
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१६६
अभ्रातृको हरेत्सर्वं = यदि अन्य भाई नहीं तो, दासी पुत्र
समस्त धन का अधिकारी है, (परन्तु) दुहितॄणां सुतादृते = परिणीत
कन्या और उनके पुत्र नहीं तभी यह अधिकार अन्य होगा ।
मुख्य गौण पुत्रों के अभाव में दाय क्रम
पत्नी दुहितरश्चैव पितरो भ्रातरस्तथा
तत्सुता गोत्रजा बन्धु शिष्य स ब्रह्मचारिणः।२१।
एषामभा वे पूर्वस्य धन भागुत्तरोत्तरः
स्वर्यातस्य ह्य पुत्रस्य सर्व वर्ण ष्ययं विधिः।२२
अन्वय सरल—
द्वादश विध पुत्रों के अभाव में—पत्नी—लड़की,—माता—
पिता, भाई, उनके पुत्र, उनके अभाव में गोत्रज, बान्धव, शिष्य, स
ब्रह्म चारी एषाम भावे—पूर्व पूर्व के अभाव में उत्तरोत्तर धन भागी
हैं। स्वर्यातस्य ह्य पुत्रस्य—अपुत्र यदि स्वर्ग चला गया है तो यह
विधि सर्व जनोपयोगी है ।
वानप्रस्थ यति ब्रह्म चारिणां रिक्थ भांगिनः
क्रमेणाचार्य सच्छिष्य धर्म भ्रात्रेक तीथिनः॥
वानप्रस्थ–यति ब्रह्म चारियों का क्रमेण = प्रति लोभ क्रम से
धर्म भ्राता या एक तीर्थ—शिष्य—आचार्य ग्रहण करें ।
विशेष:—
पत्नी
।
┌──────────────────────────────┐
सजातीय विजातीय
। ।
कन्या विषमांश
( ३७ )
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|
┌──────────┴──────────┐
ऊढा अनूढा
│
┌─────┴─────┐
अप्रतिष्ठिता प्रतिष्ठिता
│
दौहित्र
│
माता पितः
│
भाई
│
┌──────────┴──────────┐
सजातीय विजातीय
│
┌─────┴─────┐
सोदर भिन्नोदर
│
भतीजे
│
दादी = दादा — चाचा चाचा के पुत्र
गोत्रज- [ ७ पीडी तक के पुरुषों का अधिकार
│
बान्धव- [ १ आत्म बन्धु — भूआ मौसी मामा के पुत्र
│ २ पितृ बन्धु — पिता की मौसी भूआ मामा के पुत्र
│ ३ मातृ बन्धु — माता की मौसी भूआ मामा के पुत्र
आचार्य-शिष्य
│
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१८
सहाध्यायी
।
श्रोत्रिय ब्राह्मण
।
सबका दाय राजा ले पर ब्राह्मणों का नहीं ।
यदि संसृष्टी अपुत्र ही स्वर्गंत है—संसृष्टी भिन्नोदर है,
सोदर असंसृष्टी है तो धन की व्यवस्था—
अन्योदर्यस्तु संसृष्टी नान्योदर्योर्धनं हरेत्
असंसृष्ट्यपि वाऽऽदद्यात् संसृष्टो नान्यमातृ जः ।२४।
अन्योदर्यः संसृष्टी = सौतेला भाई यदि संसृष्टी है तो धन
भाग् होगा । ( असंसृष्टी ) अन्योदर्यः । असंसृष्टी सौ तेले का अधिकार
न होगा ।
इस अन्वय व्यतिरेक से अन्योदर्य का संसृष्टित्व धन ग्रहण
में कारण है असंसृष्टी—भी यदि सोदर है तो, आदद्यात् = संसृष्टी का
धन लेने का अधिकारी है,
संसृष्टः=अन्यमातृजः न=संसृष्टी भी अन्य मातृज एवं
संसृष्टी से धन को ग्रहण न करे ।
विशेष:—
असंसृष्ट सोदर तथा संसृष्ट भि न्नोदर इनका विभाग करके
ग्रहण करना चाहिये ।
धन ग्रहण कारण, एक-एक दोनों में है ।
अपवाद—
क्लीबोऽथ पतितस्तज्जः पङ्गु० रुन्मत्तो जड़ः
अन्धो ऽचिकित्स्य रोगाद्याभर्तव्याः स्युर्निरंशकाः।२५।
अन्वय सरल है—
क्लीब = नपुंसक, पतितः = ब्रह्म हत्यादि पाप कर्ता, तज्जः =
पतित से उत्पन्न, पङ्गु = पादविकल, उन्मत्तक = वात-पित्त कफ संनि-
पात--ग्रहावेश लक्षणों से व्याप्त, जडः = विकलान्तः करण [ जो हिता
हित का विचार न कर सके, अन्धः = नेत्रेन्द्रिय विकल, अचिकित्स्य
रोगः = यक्ष्मादि रोग ग्रस्त आद्य = से आश्रमान्तरगत पितृ द्वेषी-वधिर
मूक का ग्रहण है । उक्तछ क्लीबादि धन के अधिकारी नहीं भर्त्तव्याः-
भोजन, आच्छादन एवं दान से पोष्य होते हैं ।
विशेष: —
१—यदि इनका पोषण न किया जाय तो पतितत्व दोष
लगता है ।
२—मनु ने भी इनका अंश ग्रहण नहीं माना—
अनंशौ क्लीब पतितौ जात्यन्ध बधिरौतथा
उन्मत्त जडमूकाश्च ये च केचिन्नििरिन्द्रियाः ॥
क्लीबादि के पुत्रों का अधिकार—
ओरसः क्षेत्रजास्त्वेषां निर्दोषा भाग हारिणः
सुता श्चैषां प्रभर्तृव्या यावद्वै भर्तृसात्कृताः ।, २६।
अन्वयः—
एषां औरसाः क्षेत्रजाः निर्दोषा भाग हारिणः, एषां सुता
यावद्वै भर्तृ सात्कृता प्रभर्तव्या ।
एषाँ = इन क्लीबादि के, औरसाः—औरस, क्षेत्रज, पुत्र
क्लैब्यादि से निर्दोष होने पर भाग हारी हैं, इन क्लीबादि की कन्याओं
का भरण उनके विवाह संस्कार पर्यन्त होना चाहिये ।
विशेष;—
क्लीब के स्वयं के पुत्र तो नहीं होता पर क्षेत्र में तोस म्भव है
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संसृष्टिनस्तु संसृष्टी—
विभक्त धन पुनर्मिश्रीकृत संसृष्ट कहा जाता है, यह जिसका
है वह संसृष्टी है संसृष्टत्व—हर एक से नहीं होता--पिता भाई या
चाचा से हो सकता है
कहाभी है—विभक्तोयः पुनः पित्रा भ्रात्राचैकत्र संस्थितः
पितृव्येणाथवा प्रीत्या सतत्संसृष्ट उच्यते ॥
संसृष्टिनः—मृतस्यांशं = संसृष्टि के मृत के अंश को-विभाग
काल में गर्भ अज्ञात हो पश्चात् पुत्र उत्पन्न हो तो संसृष्टी दे दे, पुत्र के
अभाव में संसृष्टी ही ग्रहण करे । पत्नी आदि नहीं ।
संसृष्टिन स्तु संसृष्टी का अपवाद—
सोदरस्य तु सोदरः
दद्यादप हरेच्चांशं जातस्य चमृतस्य च ॥
संसृष्टिनः संसृष्टी इसकी अनुवृत्ति है, अतः सोदरस्य संसृष्टि-
नो मृतस्यांशं सोदरः संसृष्टी—संसृष्टानु जातस्य सुतस्य दद्यात् तदभावे
अपहरेत् ।
सोदर संसृष्टि के मृत अंश को सोदर संसृष्टी संसृष्ट के पश्चात्
उत्पन्न पुत्र को दे, उसके अभाव में अपहरण करें ।
एवं च सोदरासोदर संसर्गे सोदर संसृष्टिनो धनं सोदर एवं
संसृष्टी गृह्णाति न भिन्नोदरः संसृष्ट्यपीति पूर्वो क्तस्यापवादः । इस
प्रकार सोदर असोदर के संसर्ग में सोदर संसृष्टि के धन को सोदर ही
संसृष्टी ग्रहण करे, भिन्नो दर नहीं, चाहें वह संसृष्टी क्यों न हो ।
क्लीबादि पत्नियों का विशेषाधिकार
अपुत्रा योषित श्चैषां भर्तव्याः साधुवृत्तयः
निर्वास्या व्यभिचारिण्यः प्रतिकूलास्तथैव च ।२७।
अन्वयः—
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एषां अपुत्रा योषितः साधुवृत्तयः भर्तव्याः व्यभिचारिण्यः
निर्वास्या प्रतिकूलास्तथैव च
एषां = क्लीवादि ओं की अपुत्रा = पुत्र रहित, योषितः =
स्त्रियां = साधुवृत्तयः = सदाचार युक्त हों तो भर्तव्याः = पोषण पाने
योग्य हैं। व्यभिचारिण्यः तु = व्यभिचारिणी तो, निर्वास्याः = त्याग
ने योग्य हैं प्रतिकूलास्तथैव च = प्रतिकूल व्यभि चारिणी ही परित्यक्त
की जांय अन्यथा उनका पोषण होना चाहिये ।
स्त्रीधन विभाग—
पितृ मातृ पति भ्रातृ दत्त मध्यग्न्युपागतम्
आधिवेदनिकाद्यं च स्त्री धनं परिकीर्तितम् ॥ २८ ॥
अन्वयः—
पितृ मातृ पति भ्रातृ, दत्तं अध्यग्नि उपागतम्, आधिवेदनि-
काद्यं च स्त्री धनं परिकीर्तितम् ॥
अर्थः—पिता, माता, पति, भाई द्वारा दत्त, अध्यग्नि उपा-
गतम् = विवाह के समय मामा आदि द्वारा दत्त धन, आधिवेदनिकाद्यं
च = अधिवेदन निमित्त, आद्य = रिक्थ, क्रय संविभाग परिग्रह अधिगम
प्राप्त, धन स्त्री धन कहा गया है ।
विशेषः— स्त्री धन ६ प्रकार का है
अध्यग्न्यध्या वहनिकं दत्तं च प्रीति कर्मणि
भ्रातृ मातृ पितृ प्राप्तं षड्विधं स्त्री धनं स्मृतम् ॥
[ मनु० ]
१—अध्यग्नि धन—जो विवाह काल में मिला हो
२—अध्यावाहनिक—जो धन विदा के समय पिता के
घर से मिले
( २२ )
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३ - प्रीति दत्त - वधू को प्रसन्नता पूर्वक सास श्वशुर दें
४ - सौदायिक - पति या पिता के घर भाई या माता पिता
से लब्ध धन सौदायिक कहलाता है ।
बन्धु दत्तं तथा शुल्कमन्वाधेयक मेवच
अतीतायामप्रजसि बान्धवास्तदवाप्नुयुः ।२९।
अन्वय सरलहै —
बन्धुदत्तं = कन्या के मातृ बन्धु पितृ बन्धुओं द्वारा दत्त
शुल्क = वर पक्ष से ग्रहण किया शुल्क, अन्वाधेयक = परिणय के पश्चा-
त् दिया गया धन स्त्री धन कहलाता है ।
अप्रजसि = ‘दुहिता-दौहित्री-दौहित्र, पुत्र पौत्र रहित, स्त्री
के अतीतायाम् = मरजाने पर, बान्धवाः = भर्त्ता आदि, तत् = धन अवा-
प्नुयुः = प्राप्त करें ।
विवाह भेद से अधिकारी भेद—
अप्रजस्त्री धनं भर्तु ब्राह्मादि षुचतुर्ष्वपि
दुहितॄणां प्रसूता चेच्छेषेषु पितृगामितत् ।३०।
अन्वयः —
अप्रज स्त्री धनं ब्राह्मणा दिषु चतुर्ष्वपि भर्तु [ भवति ] तत्
शेषेषु पितृ गामि प्रसूता चेत् दुहितृ णाम्
अर्थः- - अप्रजस्त्री धनं-पूर्वोक्त सन्तति रहित, ब्राह्मादि पु
चतुर्षु = ब्राह्म - दैव आर्ष-प्राजापत्य चारों विवाहों में से भार्यात्व प्राप्त
कर परलोक यदि गई है तो भर्तुः = धनका अधिकार पति का हैं
[ उसके अभाव में प्रत्यासन्न सपिण्डों का ] शेषेषु-असुर--गन्धर्व राक्षस
पिशाच विवाह द्वारा प्राप्त स्त्री धन [ यदि अप्रजा है तो ] पितृ गामि
( २३ )
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पिता का है। प्रसूता चेत्--आठों विवाहों में जिस स्त्री के सन्तति है तो
दुहितॄणाम्--लड़कियों का अधिकार है। दोहित्री के अभाव में दौहित्र
का अधिकार
विशेष: —
लड़कियों में प्रथम अविवाहिता का अधिकार उसके अभाव
में विवाहिता का, उनमें भी प्रथम दरिद्रा का अधिकार है [ गौतम ]
वाग्दत्ता की व्यवस्था—
दत्त्वा कन्या हरन् दण्ड्यो व्ययं दद्याच्च सोदयम्
मृतायाँ दत्त माद्यात् परिशोध्योभय व्ययम् ।३१।
अन्वयः—
कन्यां दत्वा हरन् दण्ड्यः व्ययं सोदयं दद्यात्
मृतायां दत्तं उभयं परिशोध्य आदद्यात् ॥
कन्यां दत्वा = मैंने तुम्हे कन्या दी यह वाणी से कहकर धन
लेले और हरन् - वर में दोष लगा कर उसे न दे तो दण्ड्यः--दण्ड
देने योग्य है। व्ययं सोदयं दद्यात्--वाग्दान के निमित्त 'वर, द्वारा किया
गया व्यय वृद्धि ( ब्याज ) सहित कन्या पिता दे ।
यदि वाग्दत्ता संस्कार के पूर्व मर जाय तो--
मृतायाम्--मरने पर, दत्तम् = मुँदरी आदि जो वरने दी हैं
उभय व्ययं परिशोध्य = कन्या पिता ने जो लड़की की रक्षा के लिये
व्यय किया है या वर का व्यय हुआ है उसे शोधकर शेष धन का
अधिकार वर का है ।
विशेष:--
१--नाना आदि का दिया गया धन, भाई लेंगे पति नहीं
२--सोदर के अभाव में माता, पिता का अधिकार है [ बौधायन ]
( २४ )
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दुर्भिक्षे धर्म कार्ये च व्याधौ संप्रतिरोधके
गृहीतं स्त्री धनं भर्त्ता नस्त्रियै दातुमर्हति ।३२।
अन्वयः—
दुर्भिक्षे, धर्म कार्ये व्याधौच संप्रतिरोधके भर्त्ता गृहीतं स्त्री
धनं स्त्रियै दातुं न अर्हति ॥
दुर्भिक्षे = कुटुम्ब के पोषण के समय आवश्यकता में गृहीत
धन धर्म कार्ये = धर्मादि आवश्यक कार्य में, व्याधौ = भयंकर रोग में
संप्रतिरोध के = कारागार आदि से बचने के प्रसंग में गृहीत स्त्री धन
स्त्री को न भी दिया जाय तो हानि नहीं ।
विशेषः—
१—पति के अतिरिक्त जीवित स्त्री का धन कोई भी दाया-
द ग्रहण नहीं कर सकता ।
२---पत्यौ जीवति यः स्त्रीभिरलङ्कारो धतो भवेत्
न तंभजेरन् दायादा भज मानाः पतन्ति ते ।......................
[ मनु० ९।२०० ]
अधिविन्नास्त्रियै दद्यादाधिवेदनिकं समम्
न दत्तं स्त्री धनं यस्यै दत्ते त्वर्धं प्रकल्पयेत् ।३३।
अन्वयः---
अधिविन्न स्त्रियै आधि वेदनिकं धनं समं दद्यात् यस्य स्त्री
धनं न दत्तम् दत्ते तु अर्धं प्रकल्पयेत् ॥ अधिविन्ना = अधिविन्ना स्त्री के
लिये आधिवेदन के निमित्त धनं समं दद्यात् = जितना अधिवेदनाथं
व्ययीकृत धन है उसे दे । यस्यै = जिस स्त्री के लिये, स्त्री धनं न दत्तम्-