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सर्वकोश
दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary

जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished46 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 46 में से

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पृष्ठ 42

CC-0. Agamnigam Digital Preservation Foundation, Chandigarh

संसृष्टिनस्तु संसृष्टी—
विभक्त धन पुनर्मिश्रीकृत संसृष्ट कहा जाता है, यह जिसका
है वह संसृष्टी है संसृष्टत्व—हर एक से नहीं होता--पिता भाई या
चाचा से हो सकता है
कहाभी है—विभक्तोयः पुनः पित्रा भ्रात्राचैकत्र संस्थितः
पितृव्येणाथवा प्रीत्या सतत्संसृष्ट उच्यते ॥
संसृष्टिनः—मृतस्यांशं = संसृष्टि के मृत के अंश को-विभाग
काल में गर्भ अज्ञात हो पश्चात् पुत्र उत्पन्न हो तो संसृष्टी दे दे, पुत्र के
अभाव में संसृष्टी ही ग्रहण करे । पत्नी आदि नहीं ।
संसृष्टिन स्तु संसृष्टी का अपवाद—
सोदरस्य तु सोदरः
दद्यादप हरेच्चांशं जातस्य चमृतस्य च ॥
संसृष्टिनः संसृष्टी इसकी अनुवृत्ति है, अतः सोदरस्य संसृष्टि-
नो मृतस्यांशं सोदरः संसृष्टी—संसृष्टानु जातस्य सुतस्य दद्यात् तदभावे
अपहरेत् ।
सोदर संसृष्टि के मृत अंश को सोदर संसृष्टी संसृष्ट के पश्चात्
उत्पन्न पुत्र को दे, उसके अभाव में अपहरण करें ।
एवं च सोदरासोदर संसर्गे सोदर संसृष्टिनो धनं सोदर एवं
संसृष्टी गृह्णाति न भिन्नोदरः संसृष्ट्यपीति पूर्वो क्तस्यापवादः । इस
प्रकार सोदर असोदर के संसर्ग में सोदर संसृष्टि के धन को सोदर ही
संसृष्टी ग्रहण करे, भिन्नो दर नहीं, चाहें वह संसृष्टी क्यों न हो ।
क्लीबादि पत्नियों का विशेषाधिकार
अपुत्रा योषित श्चैषां भर्तव्याः साधुवृत्तयः
निर्वास्या व्यभिचारिण्यः प्रतिकूलास्तथैव च ।२७।
अन्वयः—