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सर्वकोश
दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary

जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished46 पृष्ठ

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( २२ )
CC-0. Agamnigam Digital Presevation Foundation, Chandigarh
३ - प्रीति दत्त - वधू को प्रसन्नता पूर्वक सास श्वशुर दें
४ - सौदायिक - पति या पिता के घर भाई या माता पिता
से लब्ध धन सौदायिक कहलाता है ।
बन्धु दत्तं तथा शुल्कमन्वाधेयक मेवच
अतीतायामप्रजसि बान्धवास्तदवाप्नुयुः ।२९।
अन्वय सरलहै —
बन्धुदत्तं = कन्या के मातृ बन्धु पितृ बन्धुओं द्वारा दत्त
शुल्क = वर पक्ष से ग्रहण किया शुल्क, अन्वाधेयक = परिणय के पश्चा-
त् दिया गया धन स्त्री धन कहलाता है ।
अप्रजसि = ‘दुहिता-दौहित्री-दौहित्र, पुत्र पौत्र रहित, स्त्री
के अतीतायाम् = मरजाने पर, बान्धवाः = भर्त्ता आदि, तत् = धन अवा-
प्नुयुः = प्राप्त करें ।
विवाह भेद से अधिकारी भेद—
अप्रजस्त्री धनं भर्तु ब्राह्मादि षुचतुर्ष्वपि
दुहितॄणां प्रसूता चेच्छेषेषु पितृगामितत् ।३०।
अन्वयः —
अप्रज स्त्री धनं ब्राह्मणा दिषु चतुर्ष्वपि भर्तु [ भवति ] तत्
शेषेषु पितृ गामि प्रसूता चेत् दुहितृ णाम्
अर्थः- - अप्रजस्त्री धनं-पूर्वोक्त सन्तति रहित, ब्राह्मादि पु
चतुर्षु = ब्राह्म - दैव आर्ष-प्राजापत्य चारों विवाहों में से भार्यात्व प्राप्त
कर परलोक यदि गई है तो भर्तुः = धनका अधिकार पति का हैं
[ उसके अभाव में प्रत्यासन्न सपिण्डों का ] शेषेषु-असुर--गन्धर्व राक्षस
पिशाच विवाह द्वारा प्राप्त स्त्री धन [ यदि अप्रजा है तो ] पितृ गामि