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सर्वकोश
दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary

जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished46 पृष्ठ

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पृष्ठ 43

CC-0. Agamnigam Digital Preservation Foundation, Chandigarh
एषां अपुत्रा योषितः साधुवृत्तयः भर्तव्याः व्यभिचारिण्यः
निर्वास्या प्रतिकूलास्तथैव च
एषां = क्लीवादि ओं की अपुत्रा = पुत्र रहित, योषितः =
स्त्रियां = साधुवृत्तयः = सदाचार युक्त हों तो भर्तव्याः = पोषण पाने
योग्य हैं। व्यभिचारिण्यः तु = व्यभिचारिणी तो, निर्वास्याः = त्याग
ने योग्य हैं प्रतिकूलास्तथैव च = प्रतिकूल व्यभि चारिणी ही परित्यक्त
की जांय अन्यथा उनका पोषण होना चाहिये ।
स्त्रीधन विभाग—
पितृ मातृ पति भ्रातृ दत्त मध्यग्न्युपागतम्
आधिवेदनिकाद्यं च स्त्री धनं परिकीर्तितम् ॥ २८ ॥
अन्वयः—
पितृ मातृ पति भ्रातृ, दत्तं अध्यग्नि उपागतम्, आधिवेदनि-
काद्यं च स्त्री धनं परिकीर्तितम् ॥
अर्थः—पिता, माता, पति, भाई द्वारा दत्त, अध्यग्नि उपा-
गतम् = विवाह के समय मामा आदि द्वारा दत्त धन, आधिवेदनिकाद्यं
च = अधिवेदन निमित्त, आद्य = रिक्थ, क्रय संविभाग परिग्रह अधिगम
प्राप्त, धन स्त्री धन कहा गया है ।
विशेषः— स्त्री धन ६ प्रकार का है
अध्यग्न्यध्या वहनिकं दत्तं च प्रीति कर्मणि
भ्रातृ मातृ पितृ प्राप्तं षड्विधं स्त्री धनं स्मृतम् ॥
[ मनु० ]
१—अध्यग्नि धन—जो विवाह काल में मिला हो
२—अध्यावाहनिक—जो धन विदा के समय पिता के
घर से मिले