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सर्वकोश
दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary

जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished46 पृष्ठ

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CC-0. Agamnigam Digital Presevation Foundation, Chandigarh
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सहाध्यायी
।
श्रोत्रिय ब्राह्मण
।
सबका दाय राजा ले पर ब्राह्मणों का नहीं ।
यदि संसृष्टी अपुत्र ही स्वर्गंत है—संसृष्टी भिन्नोदर है,
सोदर असंसृष्टी है तो धन की व्यवस्था—
अन्योदर्यस्तु संसृष्टी नान्योदर्योर्धनं हरेत्
असंसृष्ट्यपि वाऽऽदद्यात् संसृष्टो नान्यमातृ जः ।२४।
अन्योदर्यः संसृष्टी = सौतेला भाई यदि संसृष्टी है तो धन
भाग् होगा । ( असंसृष्टी ) अन्योदर्यः । असंसृष्टी सौ तेले का अधिकार
न होगा ।
इस अन्वय व्यतिरेक से अन्योदर्य का संसृष्टित्व धन ग्रहण
में कारण है असंसृष्टी—भी यदि सोदर है तो, आदद्यात् = संसृष्टी का
धन लेने का अधिकारी है,
संसृष्टः=अन्यमातृजः न=संसृष्टी भी अन्य मातृज एवं
संसृष्टी से धन को ग्रहण न करे ।
विशेष:—
असंसृष्ट सोदर तथा संसृष्ट भि न्नोदर इनका विभाग करके
ग्रहण करना चाहिये ।
धन ग्रहण कारण, एक-एक दोनों में है ।
अपवाद—
क्लीबोऽथ पतितस्तज्जः पङ्गु० रुन्मत्तो जड़ः
अन्धो ऽचिकित्स्य रोगाद्याभर्तव्याः स्युर्निरंशकाः।२५।