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सर्वकोश
दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary

जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished46 पृष्ठ

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अन्वय सरल है—
क्लीब = नपुंसक, पतितः = ब्रह्म हत्यादि पाप कर्ता, तज्जः =
पतित से उत्पन्न, पङ्गु = पादविकल, उन्मत्तक = वात-पित्त कफ संनि-
पात--ग्रहावेश लक्षणों से व्याप्त, जडः = विकलान्तः करण [ जो हिता
हित का विचार न कर सके, अन्धः = नेत्रेन्द्रिय विकल, अचिकित्स्य
रोगः = यक्ष्मादि रोग ग्रस्त आद्य = से आश्रमान्तरगत पितृ द्वेषी-वधिर
मूक का ग्रहण है । उक्तछ क्लीबादि धन के अधिकारी नहीं भर्त्तव्याः-
भोजन, आच्छादन एवं दान से पोष्य होते हैं ।
विशेष: —
१—यदि इनका पोषण न किया जाय तो पतितत्व दोष
लगता है ।
२—मनु ने भी इनका अंश ग्रहण नहीं माना—
अनंशौ क्लीब पतितौ जात्यन्ध बधिरौतथा
उन्मत्त जडमूकाश्च ये च केचिन्नििरिन्द्रियाः ॥
क्लीबादि के पुत्रों का अधिकार—
ओरसः क्षेत्रजास्त्वेषां निर्दोषा भाग हारिणः
सुता श्चैषां प्रभर्तृव्या यावद्वै भर्तृसात्कृताः ।, २६।
अन्वयः—
एषां औरसाः क्षेत्रजाः निर्दोषा भाग हारिणः, एषां सुता
यावद्वै भर्तृ सात्कृता प्रभर्तव्या ।
एषाँ = इन क्लीबादि के, औरसाः—औरस, क्षेत्रज, पुत्र
क्लैब्यादि से निर्दोष होने पर भाग हारी हैं, इन क्लीबादि की कन्याओं
का भरण उनके विवाह संस्कार पर्यन्त होना चाहिये ।
विशेष;—
क्लीब के स्वयं के पुत्र तो नहीं होता पर क्षेत्र में तोस म्भव है