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सर्वकोश
दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary

जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished46 पृष्ठ

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अभ्रातृको हरेत्सर्वं = यदि अन्य भाई नहीं तो, दासी पुत्र
समस्त धन का अधिकारी है, (परन्तु) दुहितॄणां सुतादृते = परिणीत
कन्या और उनके पुत्र नहीं तभी यह अधिकार अन्य होगा ।
मुख्य गौण पुत्रों के अभाव में दाय क्रम
पत्नी दुहितरश्चैव पितरो भ्रातरस्तथा
तत्सुता गोत्रजा बन्धु शिष्य स ब्रह्मचारिणः।२१।
एषामभा वे पूर्वस्य धन भागुत्तरोत्तरः
स्वर्यातस्य ह्य पुत्रस्य सर्व वर्ण ष्ययं विधिः।२२
अन्वय सरल—
द्वादश विध पुत्रों के अभाव में—पत्नी—लड़की,—माता—
पिता, भाई, उनके पुत्र, उनके अभाव में गोत्रज, बान्धव, शिष्य, स
ब्रह्म चारी एषाम भावे—पूर्व पूर्व के अभाव में उत्तरोत्तर धन भागी
हैं। स्वर्यातस्य ह्य पुत्रस्य—अपुत्र यदि स्वर्ग चला गया है तो यह
विधि सर्व जनोपयोगी है ।
वानप्रस्थ यति ब्रह्म चारिणां रिक्थ भांगिनः
क्रमेणाचार्य सच्छिष्य धर्म भ्रात्रेक तीथिनः॥
वानप्रस्थ–यति ब्रह्म चारियों का क्रमेण = प्रति लोभ क्रम से
धर्म भ्राता या एक तीर्थ—शिष्य—आचार्य ग्रहण करें ।
विशेष:—
पत्नी
।
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सजातीय विजातीय
। ।
कन्या विषमांश