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सर्वकोश
दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary

जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished46 पृष्ठ

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उनसे विहीन
हो कर मैं तुम्हारा पुत्र हूँ ऐसे स्वयं दत्त त्व प्राप्त करे वह दत्तात्मा
कहलाता है ।
सहोढजः—गर्भ वती स्त्री को विवाह कर लाये, उससे
उत्पन्न पुत्र सहोढज कहलाता है ।
उत्सृष्ट ---अपविद्ध का लक्षण—
उत्सृष्टो गृह्यते यस्तु सोऽपविद्धो भवेत्सुतः ।
उत्सृष्टः = माता पिता के द्वारा त्यागे गये को, गृह्यते = जो
ग्रहण करता है, सोऽपविद्धो भवेत्सुतः = वह अपविद्ध कहलाता है
दाय ग्रहण में क्रम—
पिण्डदों ऽशहर श्चैषां पूर्वा भावे परः, परः ।१९।
एषां पूर्वाभा वे परः परः पिण्डदः अंश हरश्च ।
एषां = पूर्वोक्त द्वादश पुत्रों में पूर्व पूर्व के अभाव में पर
पर पिण्ड दान एवं अंश ग्रहण का अधिकारी है ।

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    • : २—एक पुत्र के देने का निषेध है । अर्थात् जिसके कई (Note: