सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
बिन ही काया मिलै परस्पर, ज्यों जल जलहि समाई ॥ 2 ॥
बिन ही ठाहर आसण पूरे, बिन कर बैन बजावै ।
बिन ही पावों नाचै निशिदिन, बिन जिभ्या गुण गावै ॥ 3 ॥
सब गुण रहिता सकल बियापी, बिन इंद्री रस भोगी ।
दादू ऐसा गुरु हमारा, आप निरंजन जोगी ॥ 4 ॥
२11. रूपक ताल
इहै परम गरु योगं, अमी महारस भोगं ॥ टेक॥
मन पवना स्थिर साधं, अविगत नाथ अराधं, तहँ शब्द अनाहद नादं ॥ १ ॥
पंच सखी परमोधं, अगम ज्ञान गुरु बोधं, तहँ नाथ निरंजन शोधं ॥ २ ॥
सद्गुरु मांहि बतावा, निराधार घर छावा, तहँ ज्योति स्वरूपी पावा ॥ ३ ॥
सहजैं सदा प्रकाशं, पूरण ब्रह्म विलासं, तहँ सेवक दादू दासं ॥ ४ ॥
२12. (गुजराती) अनभई । त्रिताल
मूने येह अचंभो थाये । कीड़ीये हस्ती विडान्यो, तेन्नें बैठी खाये ॥ टेक ॥
जाण हु तो ते बैठो हारे, अजाण तेन्नें ता वाहे ।
पांगुलोउ जाबा लाग्यो, तेन्नें कर को साहे ॥ १ ॥
नान्हो हुतो ते मोटो थायो, गगन मण्डल नहिं माये ।
मोटे रो विस्तार भणीजे, ते तो केन्नें जाये ॥ २ ॥
ते जाणे जे निरखी जोवे, खोजी नें वलीमांहे ।
दादू तेन्नों मर्म न जाणें, जे जिह्वा विहूणों गाये ॥ ३ ॥
इति राग रामकली सम्पूर्ण ॥ 8 ॥ पद 46 ॥
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राग आसावरी
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अथ राग आसावरी ९
(गायन समय प्रातः 6 से 9)
२13. उत्तम स्मरण । ब्रह्म ताल
तूँ ही मेरे रसना, तूँ ही मेरे बैना,
तूँ ही मेरे श्रवना, तूँ ही मेरे नैना ॥ टेक ॥
तूँ ही मेरे आतम कँवल मंझारी,
तूँ ही मेरी मनसा, तुम पर वारी ॥ 1 ॥
तूँ ही मेरे मन ही, तूँ ही मेरे श्वासा,
तूँ ही मेरे सुरतैं प्राण निवासा ॥ 2 ॥
तूँ ही मेरे नखशिख सकल शरीरा,
तूँ ही मेरे जियरे ज्यों जल नीरा ॥ 3 ॥
तुम बिन मेरे अवर को नांही,
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श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9
तूँ ही मेरी जीवनि दादू मांही ॥ 4 ॥
214. अनन्य शरण । झूमरा
तुम्हारे नाम लाग हरि ! जीवन मेरा ।
मेरे साधन सकल नाम निज तेरा ॥ टेक ॥
दान पुन्य तप तीरथ मेरे, केवल नाम तुम्हारा ।
यह सब मेरे सेवा पूजा, ऐसा बरत हमारा ॥ 1 ॥
यह सब मेरे वेद पुराणा, सुचि संयम है सोई ।
ज्ञान ध्यान येही सब मेरे, और न दूजा कोई ॥ 2 ॥
काम क्रोध काया वश करना, ये सब मेरे नामा ।
मुक्ता गुप्ता परगट कहिये, मेरे केवल रामा ॥ 3 ॥
तारण तिरण नांव निज तेरा, तुमही एक आधारा ।
दादू अंग एक रस लागा, नांव गहै भव पारा ॥ 4 ॥
215. चतुस्ताल
हरि केवल एक अधारा, सोई तारण तिरण हमारा ॥ टेक ॥
ना मैं पंडित पढ़ि गुणि जानूं , ना कुछ ज्ञान विचारा ।
ना मैं अगमी ज्योतिग जानूं, ना मुझ रूप सिंगारा ॥ 1 ॥
ना तप मेरे इन्द्रिय निग्रह, ना कुछ तीरथ फिरणां ।
देवल पूजा मेरे नाहीं, ध्यान कछू नहिं धरणां ॥ 2 ॥
योग युक्ति कछु नाहीं मेरे, ना मैं साधन जानूं ।
औषधि मूली मेरे नाहीं, ना मैं देश बखानूं ॥ 3 ॥
मैं तो और कछू नाहिं जानूं, कहो और क्या कीजे ।
दादू एक गलित गोविन्द सौं, इहि विधि प्राण पतीजे ॥ 4 ॥
216. परिचय चतुस्ताल
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श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9
पीव घर आवनो ए, अहो ! मोहि भावनो ते ॥ टेक ॥
मोहन नीको री हरी, देखूंगी अँखियाँ भरी ।
राखूं हौं उर धरी प्रीति करी खरी, मोहन मेरो री माई ।
रहूँ हौं चरणौं धाई, आनन्द बधाई, हरि के गुण गाई ॥ 1 ॥
दादू रे चरण गहिये, जाइने तिहाँतो रहिये ।
तन मन सुख लहिये, विनती गहिये ॥ 2 ॥
217. त्रिताल
हाँ माई ! मेरो राम बैरागी, तजि जनि जाइ ॥ टेक ॥
राम विनोद करत उर अंतर, मिलिहौं बैरागिनि धाइ ॥ 1 ॥
जोगिन ह्रै कर फिरूँगी विदेसा, राम नाम ल्यौ लाइ ॥ 2 ॥
दादू को स्वामी है रे उदासी, रहिहौं नैन दोइ लाइ ॥ 3 ॥
218. उपदेश चेतावनी । राज मृगांक ताल
रे मन ! गोविन्द गाइ रे गाइ, जन्म अविरथा जाइ रे जाइ ॥ टेक ॥
ऐसा जनम न बारम्बारा, तातैं जप ले राम पियारा ॥ 1 ॥
यहु तन ऐसा बहुरि न पावै, तातैं गोविन्द काहे न गावै ॥ 2 ॥
बहुरि न पावै मानुष देही, तातैं कर ले राम सनेही ॥ 3 ॥
अब के दादू किया निहाला, गाइ निरंजन दीनदयाला ॥ 4 ॥
219. काल चेतावनी । राज मृगांक ताल
मन रे ! सोवत रैन बिहानी, तैं अजहूँ जात न जानी ॥ टेक ॥
बीती रैन बहुरि नहीं आवे, जीव जाग जनि सोवे ।
चारों दिशा चोर घर लागे, जाग देख क्या होवे ॥ 1 ॥
भोर भयो पछतावन लागे, मांहीं महल कुछ नांहीं ।
जब जाइ काल काया कर लागे,तब सोधे घर मांहीं ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9
जाग जतन कर राखो सोई, तब तन तत्त न जाई ।
चेतन पहरे चेतत नांहीं, कहि दादू समझाई ॥ ३ ॥
२२०. राज विद्याधर ताल
देखत ही दिन आइ गये, पलट केश सब श्वेत भये ॥ टेक ॥
आई जुरा मीच अरु मरणा, आया काल अबै क्या करणा ।
श्रवणों सुरति गई नैन न सूझै, सुधि बुधि नाठी कह्या न बूझै ॥ १ ॥
मुख तैं शब्द विकल भई वाणी, जन्म गया सब रैन बिहाणी ।
प्राण पुरुष पछतावण लागा, दादू अवसर काहे न जागा ॥ २ ॥
२२१. उपदेश । राज विद्याधर ताल
हरि बिन हां, हो कहूँ सचु नांहीं, देखत जाई विषय फल खाहीं ॥ टेक ॥
रस रसना के मीन मन भीरा, जल तैं जाइ यों दहै शरीरा ॥ १ ॥
गज के ज्ञान मगन मद माता, अंकुँए डोरि गहै फँद गाता ॥ २ ॥
मर्कट मूठी मांहिं मन लागा, दुख की राशि भ्रमै भ्रम भागा ॥ ३ ॥
दादू देखु हरि सुखदाता, ताको छाड़ि कहाँ मन राता ॥ ४ ॥
२२२. उदीक्षण ताल
सांई बिना संतोष न पावै, भावै घर तजि वन वन धावै ॥ टेक ॥
भावै पढ़ि गुनि वेद उचारै, आगम निगम सबै विचारै ॥ १ ॥
भावै नव खंड सब फिर आवै, अजहूँ आगै काहे न जावै ॥ २ ॥
भावै सब तजि रहै अकेला, भाई बन्धु न काहू मेला ॥ ३ ॥
दादू देखै सांई सोई, साच बिना संतोष न होई ॥ ४ ॥
२२३. मनोपदेश चेतावनी । उदीक्षण ताल
मन माया रातो भूले ।
मेरी मेरी कर कर बौरे, कहा मुग्ध नर फूले ॥ टेक ॥
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श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9
माया कारण मूल गँवावै, समझ देख मन मेरा।
अंत काल जब आइ पहूँता, कोई नहीं तब तेरा ॥ 1 ॥
मेरी मेरी कर नर जाणै, मन मेरी कर रहिया।
तब यहु मेरी काम न आवै, प्राण पुरुष जब गहिया ॥ 2 ॥
राव रंक सब राजा राणा, सबहिन को बोरावै।
छत्रपति भूपति तिन के संग, चलती बेर न आवै ॥ 3 ॥
चेत विचार जान जिय अपने, माया संग न जाई।
दादू हरि भज समझ सयाना, रहो राम ल्यौ लाई ॥ 4 ॥
224. काल चेतावनी । ललित ताल
रहसी एक उपावनहारा, और चलसी सब संसारा ॥ टेक ॥
चलसी गगन धरणि सब चलसी, चलसी पवन अरु पानी।
चलसी चंद सूर पुनि चलसी, चलसी सबै उपानी ॥ 1 ॥
चलसी दिवस रैण भी चलसी, चलसी जुग जम वारा।
चलसी काल व्याल पुनि चलसी, चलसी सबै पसारा ॥ 2 ॥
चलसी स्वर्ग नरक भी चलसी, चलसी भूचणहारा।
चलसी सुख दुःख भी चलसी, चलसी कर्म विचारा ॥ 3 ॥
चलसी चंचल निहचल रहसी, चलसी जे कुछ कीन्हा।
दादू देख रहै अविनाशी, और सबै घट खीना ॥ 4 ॥
225. त्रिताल
इहि कलि हम मरणे को आये, मरण मीत उन संग पठाये ॥ टेक ॥
जब तैं यहु हम मरण विचारा, तब तैं आगम पंथ सँवारा ॥ 1 ॥
मरण देख हम गर्व न कीन्हा, मरण पठाये सो हम लीन्हा ॥ 2 ॥
मरणा मीठा लागे मोहि, इहि मरणे मीठा सुख होहि ॥ 3 ॥
मरणे पहली मरे जो कोई, दादू सो अजरावर होई ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9
226. त्रिताल
रे मन मरणे कहा डराई, आगे पीछे मरणा रे भाई ॥ टेक ॥
जे कुछ आवै थिर न रहाई, देखत सबै चल्या जग जाई ॥ 1 ॥
पीर पैगम्बर किया पयाना, सेख मुसायक सबै समाना ॥ 2 ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश महाबलि, मोटे मुनि जन गये सबै चलि ॥ 3 ॥
निहचल सदा सोई मन लाइ, दादू हर्ष राम गुण गाइ ॥ 4 ॥
227. वस्तु निर्देश निर्णय । मल्लिका मोद ताल
ऐसा तत्त्व अनुपम भाई, मरै न जीवै, काल न खाई ॥ टेक ॥
पावक जरै न मार्यो मरई, काट्यो कटै न टार्यो टरई ॥ 1 ॥
आखिर खिरै न लागै काई, सीत घाम जल डूब न जाई ॥ 2 ॥
माटी मिलै न गगन विलाई, अघट एक रस रह्या समाई ॥ 3 ॥
ऐसा तत्त्व अनुपम कहिये, सो गहि दादू काहे न रहिये ॥ 4 ॥
228. मनोपदेश । मल्लिका मोद ताल
मन रे सेव निरंजन राई, ताको सेवो रे चित लाई ॥ टेक ॥
आदि अन्तै सोई उपावै, परलै लेहि छिपाई ।
बिन थँभा जिन गगन रहाया, सो रह्या सबन में समाई ॥ 1 ॥
पाताल मांही जे आराधै, वासुकि रे गुण गाई ।
सहस्त्र मुख जिह्वा द्वै ताके, सो भी पार न पाई ॥ 2 ॥
सुर नर जाको पार न पावैं, कोटि मुनि जन ध्याई ।
दादू रे तन ताको है रे, जाको सकल लोक आराही ॥ 3 ॥
229. जीव-उपदेश । भंग ताल
निरंजन जोगी जान ले चेला, सकल वियापी रहै अकेला ॥ टेक ॥
खपर न झोली डंड अधारी, मढ़ी न माया लेहु विचारी ॥ 1 ॥
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श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9
सींगी मुद्रा विभूति न कंथा, जटा जाप आसन नहिं पंथा ॥ 2 ॥
तीरथ व्रत न वनखंड वासा, मांग न खाइ नहीं जग आसा ॥ 3 ॥
अमर गुरु अविनाशी जोगी, दादू चेला महारस भोगी ॥ 4 ॥
230. उपदेश । भंग ताल
जोगिया बैरागी बाबा, रहै अकेला उनमनि लागा ॥ टेक ॥
आतम जोगी धीरज कंथा, निश्चल आसण आगम पंथा ॥ 1 ॥
सहजैं मुद्रा अलख अधारी, अनहद सींगी रहणि हमारी ॥ 2 ॥
काया वन-खंड पांचों चेला, ज्ञान गुफा में रहै अकेला ॥ 3 ॥
दादू दर्शन कारण जागे, निरंजन नगरी भिक्षा मांगे ॥ 4 ॥
231. समता ज्ञान । ललित ताल
बाबा, कहु दूजा क्यों कहिये, तातैं इहि संशय दुख सहिये ॥ टेक ॥
यहु मति ऐसी पशुवां जैसी, काहे चेतत नांहीं ।
अपना अंग आप नहिं जानै, देखै दर्पण मांही ॥ 1 ॥
इहि मति मीच मरण के तांई, कूप सिंह तहँ आया ।
डूब मुवा मन मरम न जाना, देखि आपनी छाया ॥ 2 ॥
मद के माते समझत नांहीं, मैगल की मति आई ।
आपै आप आप दुख दीया, देखी आपनी झांई ॥ 3 ॥
मन समझे तो दूजा नांहीं, बिन समझे दुख पावै ।
दादू ज्ञान गुरु का नांहीं, समझ कहाँ तैं आवै ॥ 4 ॥
232. ललित ताल
बाबा, नांहीं दूजा कोई ।
एक अनेक नाम तुम्हारे, मोपै और न होई ॥ टेक ॥
अलख इलाही एक तूँ, तूँ ही राम रहीम ।
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श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9
तूँ ही मालिक मोहना, केशव नाम करीम ॥ 1 ॥
सांई सिरजनहार तूँ, तूँ पावन तूँ पाक।
तूँ कायम करतार तूँ, तूँ हरि हाजिर आप ॥ 2 ॥
रमता राजिक एक तूँ, तूँ सारंग सुबहान ।
कादिर करता एक तूँ, तूँ साहिब सुलतान ॥ 3 ॥
अविगत अल्लह एक तूँ, गनी गुसांई एक।
अजब अनुपम आप है, दादू नाम अनेक ॥ 4 ॥
233. समर्थाई । रंग ताल
जीवत मारे मुये जिलाये, बोलत गूंगे गूंग बुलाये ॥ टेक ॥
जागत निशि भर सोई सुलाये, सोवत रैनि सोई जगाये ॥ 1 ॥
सूझत नैनहुँ लोइन लीये, अंध विचारे ता मुख दीये ॥ 2 ॥
चलते भारी ते बिठलाये, अपंग विचारे सोई चलाये ॥ 3 ॥
ऐसा अद्भुत हम कुछ पाया, दादू सतगुरु कहि समझाया ॥ 4 ॥
234. प्रश्न । रंग ताल
क्यों कर यह जग रच्यो, गुसांई ?
तेरे कौन विनोद बन्यो मन मांहीं ? टेक ॥
कै तुम आपा प्रकट करना, कै यहु रचले जीव उधरना ॥ 1 ॥
कै यहु तुम को सेवक जानैं, कै यहु रचले मन के मानैं ॥ 2 ॥
कै यहु तुम को सेवक भावै, कै यहु रचले खेल दिखावै ॥ 3 ॥
कै यहु तुम को खेल पियारा, कै यहु भावै कीन्ह पसारा ॥ 4 ॥
यहु सब दादू अकथ कहानी, कहि समझावो सारंग-पाणी ॥ 5 ॥
उत्तर की साखी
दादू परमारथ को सब किया, आप स्वारथ नांहिं । (15-50)
परमेश्वर परमारथी, कै साधू कलि मांहिं ॥ 1 ॥
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खालिक खेलै खेल कर, बूझै विरला कोइ। (21-37)
लेकर सुखिया ना भया, देकर सुखिया होइ ॥ 2 ॥
235. समर्थाई । झपताल
हरे ! हरे !! सकल भुवन भरे, जुग जुग सब करे।
जुग जुग सब धरे, अकल सकल जरे, हरे हरे ॥टेक॥
सकल भुवन छाजै, सकल भुवन राजै, सकल कहै।
धरती अम्बर गहै, चंद सूर सुधि लहै, पवन प्रकट बहै ॥ 1 ॥
घट घट आप देवै, घट घट आप लेवै, मंडित माया।
जहाँ तहाँ आप राया, जहाँ तहाँ आप छाया, अगम निगम पाया ॥ 2 ॥
रस मांही रस राता, रस मांहीं रस माता, अमृत पीया।
नूर मांही नूर लीया, तेज मांही तेज कीया, दादू दर्श दीया ॥ 3 ॥
236. परिचय उपदेश । चौताल
पीव पीव, आदि अंत पीव ।
परसि परसि अंग संग, पीव तहाँ जीव ॥टेक॥
मन पवन भवन गवन, प्राण कँवल मांहि।
निधि निवास विधि विलास, रात दिवस नांहि ॥ 1 ॥
सास वास आस पास, आत्म अंग लगाइ।
ऐन बैन निरख नैन, गाइ गाइ रिझाइ ॥ 2 ॥
आदि तेज अंत तेज, सहजैं सहज आइ।
आदि नूर अंत नूर, दादू बलि बलि जाइ ॥ 3 ॥
237. (फारसी) चौताल
नूर नूर अव्वल आखिर नूर ।
दायम कायम कायम दायम, हाजिर है भरपूर ॥टेक॥
श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9
आसमान नूर, जमीं नूर, पाक परवरदिगार।
आब नूर, बाद नूर, खूब खूबां यार ॥ 1 ॥
जाहिर बातिन, हाजिर नाजिर, दाना तूँ दीवान।
अजब अजाइब, नूर दीदम, दादू है हैरान ॥ 2 ॥
२३८. रस । त्रिताल
मैं अमली मतवाला माता, प्रेम मगन मेरा मन राता ॥ टेक ॥
अमी महारस भर भर पीवै, मन मतवाला जोगी जीवै ॥ 1 ॥
रहै निरन्तर गगन मंझारी, प्रेम पियाला सहज खुमारी ॥ 2 ॥
आसण अवधू अमृतधारा, जुग जुग जीवै पीवणहारा ॥ 3 ॥
दादू अमली इहि रस माते, राम रसायन पीवत छाके ॥ 4 ॥
२३९. निज उपदेश । त्रिताल
सुख दुख संशय दूर किया, तब हम केवल राम लिया ॥ टेक ॥
सुख दुख दोऊ भ्रम बिचारा, इन सौं बंध्या है जग सारा ॥ 1 ॥
मेरी मेरा सुख के तांई, जाइ जन्म नर चेतै नांहीं ॥ 2 ॥
सुख के तांई झूठा बोलै, बांधे बंधन कबहूँ न खोलै ॥ 3 ॥
दादू सुख दुख संग न जाई, प्रेम प्रीति पीव सौं ल्यौ लाई ॥ 4 ॥
२४०. हैरान । वर्णभिन्न ताल
कासौं कहूँ हो अगम हरि बाताँ,
गगन धरणी दिवस नहिं राता ॥ टेक ॥
संग न साथी, गुरु नहिं चेला, आसन पास यों रहै अकेला ॥ 1 ॥
वेद न भेद, न करत विचारा, अवरण वरण सबन तैं न्यारा ॥ 2 ॥
प्राण न पिंड, रूप नहिं रेखा, सोइ तत्त सार नैन बिन देखा ॥ 3 ॥
जोग न भोग, मोह नहिं माया, दादू देख काल नहिं काया ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9
241. गुरु ज्ञान । वर्ण भिन्न ताल
मेरा गुरु ऐसा ज्ञान बतावै ।
काल न लागै, संशय भागै, ज्यों है त्यों समझावै ॥ टेक ॥
अमर गुरु के आसन रहिये, परम ज्योति तहँ लहिये ।
परम तेज सो दृढ़ कर गहिये, गहिये लहिये रहिये ॥ 1 ॥
मन पवना गहि आतम खेला, सहज शून्य घर मेला ।
अगम अगोचर आप अकेला, अकेला मेला खेला ॥ 2 ॥
धरती अम्बर चंद न सूरा, सकल निरंतर पूरा ।
शब्द अनाहद बाजहिं तूरा, तूरा पूरा सूरा ॥ 3 ॥
अविचल अमर अभय पद दाता, तहाँ निरंजन राता ।
ज्ञान गुरु ले दादू माता, माता राता दाता ॥ 4 ॥
242. राज विद्याधर ताल
मेरा गुरु आप अकेला खेलै ।
आपै देवै आपै लेवै, आपै द्वै कर मेलै ॥ टेक ॥
आपै आप उपावै माया, पंच तत्त्व कर काया ।
जीव जन्म ले जग में आया, आया काया माया ॥ 1 ॥
धरती अंबर महल उपाया, सब जग धंधै लाया ।
आपै अलख निरंजन राया, राया लाया पाया ॥ 2 ॥
चन्द सूर दोइ दीपक कीन्हा, रात दिवस कर लीन्हा ।
राजिक रिजक सबन को दीन्हा, दीन्हा लीन्हा कीन्हा ॥ 3 ॥
परम गुरु सो प्राण हमारा, सब सुख देवै सारा ।
दादू खेलै अनन्त अपारा, अपारा सारा हमारा ॥ 4 ॥
243. हैरान । राज विद्याधर ताल
थकित भयो मन कह्यो न जाई, सहज समाधि रह्यो ल्यौ लाई ॥ टेक ॥
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श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9
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जे कुछ कहिये सोच विचारा, ज्ञान अगोचर अगम अपारा ॥ 1 ॥
साइर बूँद कैसे कर तोलै, आप अबोल कहा कहि बोलै ॥ 2 ॥
अनल पंखि परै पर दूर, ऐसे राम रह्या भरपूर ॥ 3 ॥
अब मन मेरा ऐसे रे भाई, दादू कहबा कहण न जाई ॥ 4 ॥
244. मल्लिका मोद ताल
अविगत की गति कोइ न लहै, सब अपना उनमान कहै ॥ टेक ॥
केते ब्रह्मा वेद विचारैं, केते पंडित पाठ पढ़ें।
केते अनुभव आतम खोजैं, केते सुर नर नाम रटैं ॥ 1 ॥
केते ईश्वर आसन बैठे, केते जोगी ध्यान धरैं ।
केते मुनिवर मन को मारैं, केते ज्ञानी ज्ञान करैं ॥ 2 ॥
केते पीर केते पैगम्बर, केते पढ़ें कुराना ।
केते काजी केते मुल्लां, केते शेख शयाना ॥ 3 ॥
केते पारिख अन्त न पावैं, वार पार कछु नांहीं ।
दादू कीमत कोई न जानैं, केते आवैं जांहीं ॥ 4 ॥
245. मल्लिका मोद ताल
ए हौं बूझि रही पीव जैसा है, तैसा कोइ न कहै रे ।
अगम अगाध अपार अगोचर, सुधि बुधि कोइ न लहै रे ॥ टेक ॥
वार पार कोइ अन्त न पावै, आदि अन्त मधि नांही रे ।
खरे सयाने भये दिवाने, कैसा कहाँ रहै रे ॥ 1 ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर बूझै, केता कोई बतावै रे ।
शेख मुशायक पीर पैगम्बर, है कोइ अगह गहै रे ॥ 2 ॥
अम्बर धरती सूर ससि बूझै, बाव वर्ण सब सोधै रे ।
दादू चक्रित है हैराना, को है कर्म दहै रे ॥ 3 ॥
इति राग आसावरी सम्पूर्ण ॥ 9 ॥ पद 32 ॥
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राग सिन्दूरा
अथ राग सिन्दूरा 10
(गायन समय रात्रि 12 से 3)
246. परिचय । झपताल
हंस सरोवर तहाँ रमै, सुभर हरि जल नीर।
प्राणी आप पखालिये, निर्मल सदा होइ शरीर ॥ टेक॥
मुक्ताहल मन मानिया, चुगैं हंस सुजान।
मध्य निरंतर झूलिये, मधुर विमल रस पान ॥ 1 ॥
भँवर कमल रस वासना, रातो राम पीवंत।
अरस परस आनन्द करैं, तहँ मन सदा होइ जीवंत ॥ 2 ॥
मीन मगन मांहीं रहैं, मुदित सरोवर मांहिं।
सुख सागर क्रीड़ा करैं, पूरण परिमित नांहिं ॥ 3 ॥
निर्भय तहाँ भय को नहीं, विलसैं बारम्बार।
दादू दर्शन कीजिये, सन्मुख सिरजनहार ॥ 4 ॥
- 403 -
श्री दादूवाणी-राग सिन्दूरा 10
247. झपताल
सुख सागर में झूलबो, कश्मल झड़ै हो अपार ।
निर्मल प्राणी होइबो, मिलिबो सिरजनहार ॥ टेक ॥
तिहिं संजम पावन सदा, पंक न लागै प्राण ।
कँवल बिगासे तिहि तणौं, उपजे ब्रह्म गियान ॥ 1 ॥
आगम निगम तहँ गम करै, तत्त्वैं तत्त्व मिलान ।
आसन गुरु के आइबो, मुक्तैं महल समान ॥ 2 ॥
प्राणी परि पूजा करै, पूरै प्रेम विलास ।
सहजैं सुन्दर सेविये, लागी लै कविलास ॥ 3 ॥
रैण दिवस दीसै नहीं, सहजैं पुंज प्रकास ।
दादू दर्शन देखिये, इहि रस रातो हो दास ॥ 4 ॥
248. शूल ताल
अविनाशी संग आत्मा, रमे हो रैण दिन राम ।
एक निरंतर ते भजे, हरि हरि प्राणी नाम ॥ टेक ॥
सदा अखंडित उर बसै, सो मन जाणी ले ।
सकल निरंतर पूरि सब, आतम रातो ते ॥ 1 ॥
निराधार निज बैसणों, जिहिं तत आसन पूर ।
गुरु सिख आनन्द ऊपजै, सन्मुख सदा हजूर ॥ 2 ॥
निश्चल ते चालै नहीं, प्राणी ते परिमाण ।
साथी साथैं ते रहें, जाणैं जाण सुजाण ॥ 3 ॥
ते निर्गुण आगुण धरी, मांहैं कौतुकहार ।
देह अछत अलगो रहै, दादू सेव अपार ॥ 4 ॥
249. शूल ताल
पारब्रह्म भज प्राणिया, अविगत एक अपार ।
- 404 -
श्री दादूवाणी-राग सिन्दूरा 10
अविनाशी गुरु सेविये, सहजैं प्राण अधार ॥ टेक ॥
ते पुर प्राणी तेहनो, अविचल सदा रहंत ।
आदि पुरुष ते आपणों, पूरण परम अनंत ॥ 1 ॥
अविगत आसण कीजिये, आपैं आप निधान।
निरालम्ब भजि तेहनों, आनंद आत्मराम ॥ 2 ॥
निर्गुण निश्चल थिर रहै, निराकार निज सोइ।
ते सति प्राणी सेविये, लै समाधि रत होइ ॥ 3 ॥
अमर आप रमता रमै, घट घट सिरजनहार ।
गुणातीत भज प्राणिया, दादू येह विचार ॥ 4 ॥
250. शूरतान झपताल
क्यूं भाजै सेवक तेरा, ऐसा सिर साहिब मेरा ॥ टेक ॥
जाके धरती गगन आकाशा, जाके चंद सूर कविलाशा।
जाके तेज पवन जल साजा, जाके पंच तत्त्व के बाजा ॥ 1 ॥
जाके अठारह भार वनमाला, गिरि पर्वत दीनदयाला।
जाके सायर अनन्त तरंगा, जाके चौरासी लख संगा ॥ 2 ॥
जाके ऐसे लोक अनन्ता, रचि राखै विधि बहु भंता।
जाके ऐसा खेल पसारा, सब देखै कौतुकहारा ॥ 3 ॥
जाके काल मीच डर नांहीं, सो बरत रह्या सब मांहीं।
मन भावै खेलै खेला, ऐसा है आप अकेला ॥ 4 ॥
जाके ब्रह्मा ईश्वर बंदा, सब मुनिजन लागे अंगा।
जाके साध सिद्ध सब मांहीं, परिपूरण परिमित नांहीं ॥ 5 ॥
सोई भानै घड़ै संवारै, जुग केते कबहुँ न हारै।
ऐसा हरि साहिब पूरा, सब जीवनि आतम मूरा ॥ 6 ॥
सो सबहिन की सुधि जानै, जो जैसा तैसी बानै।
सर्वंगी राम सयाना, हरि करै सो होइ निदाना ॥ 7 ॥
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श्री दादूवाणी-राग सिन्दूरा 10
जे हरि जन सेवक भाजै, तो ऐसा साहिब लाजै ।
अब मरण माँड हरि आगे, तो दादू बाण न लागे ॥ 8 ॥
251. झपताल
हरि भजतां किमि भाजिये, भाजे भल नांहीं ।
भाजे भल क्यूं पाइये, पछतावै मांहीं ॥ टेक ॥
सूरा सो सहजैं भिड़ै, सार उर झेलै ।
रण रोकै भाजै नहीं, ते बाण न मेलै ॥ 1 ॥
सती सत साचा गहै, मरणे न डराई ।
प्राण तजै जग देखतां, पियड़ो उर लाई ॥ 2 ॥
प्राण पतंगा यों तजै, वो अंग न मोड़ै ।
जौवन जारै ज्योति सूं, नैना भल जोड़ै ॥ 3 ॥
सेवक सो स्वामी भजै, तन मन तजि आसा ।
दादू दर्शन ते लहैं, सुख संगम पासा ॥ 4 ॥
252. चेतावनी । रुद्र ताल
सुन तूँ मना रे, मूरख मूढ़ विचार,
आवै लहरि बिहावणी, दमै देह अपार ॥ टेक ॥
करिबो है तिमि कीजिये रे, सुमिर सो आधार ॥ 1 ॥
चरण बिहूणो चालबो रे, संभारी ले सार ॥ 2 ॥
दादू तेहज लीजिये रे, सांचो सिरजनहार ॥ 3 ॥
253. (गुजराती) रुद्र । ताल
रे मन साथी माहरा, तूनें समझायो कै बारो रे ।
रातो रंग कसुंभ के, तैं बिसार्यो आधारो रे ॥ टेक ॥
स्वप्ना सुख के कारणे, फिर पीछे दुख होई रे ।
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श्री दादूवाणी-राग सिन्दूरा 10
दीपक दृष्टि पतंग ज्यों, यों भ्रमि जले जनि कोई रे ॥ 1 ॥
जिह्वा स्वारथ आपने, ज्यूं मीन मरे तज नीरो रे।
मांहैं जाल न जाणियो, तातैं उपनों दुःख शरीरो रे ॥ 2 ॥
स्वादैं ही संकट पर्यो देखत ही नर अंधो रे।
मूरख मूठी छाड़ि दे, होइ रह्यो निर्बंधो रे ॥ 3 ॥
मान सिखावणि माहरी, तू हरि भज मूल न हारी रे।
सुख सागर सोई सेविये, जन दादू राम सँभारी रे ॥ 4 ॥
इति राग सिन्दूरा सम्पूर्ण ॥ 10 ॥ पद 8 ॥
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अथ राग देवगांधार ११
(गायन समय प्रातः 6 से 9)
254. विनती अनन्य शरण । त्रिताल
शरण तुम्हारी आइ परे ।
जहाँ तहाँ हम सब फिर आये, राखि राखि हम दुखित खरे ॥ टेक॥
कस कस काया तप व्रत कर कर, भ्रमत भ्रमत हम भूल परे ।
कहुँ शीतल कहुँ तप्त दहे तन, कहुँ हम करवत सीस धरे ॥ 1 ॥
कहुँ वन तीरथ फिर फिर थाके, कहुँ गिरि पर्वत जाइ चढ़े ।
कहुँ शिखर चढ़ परे धरणि पर, कहुँ हत आपा प्राण हरे ॥ 2 ॥
अंध भये हम, निकट न सूझै, ताथैं तुम्ह तज जाइ जरे ।
हा हा ! हरि अब दीन लीन कर, दादू बहु अपराध भरे ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग देवगांधार 11
255. पतिव्रत उपदेश । त्रिताल
बौरी ! तूँ बार बार बौरानी।
सखी ! सुहाग न पावै ऐसे, कैसे भरमि भुलानी ॥ टेक॥
चरणों चेरी चित नहिं राख्यो, पतिव्रत नांहि न जान्यो ।
सुन्दरि सेज संग नहिं जानै, पीव सौं मन नहिं मान्यो ॥ 1 ॥
तन मन सबै शरीर न सौंप्यो, शीश नाइ नहिं ठाढ़ी।
इकरस प्रीति रही नहिं कबहुँ, प्रेम उमंग न बाढ़ी ॥ 2 ॥
प्रीतम अपनो परम सनेही, नैन निरख न अघानी।
निशि-वास आनिउर अंतर, परम पूज्य नहिं जानी ॥ 3 ॥
पतिव्रत आगे जिन जिन पाल्यो, सुन्दरी तिन सब छाजै।
दादू पीव बिन और न जानै, ताहि सुहाग विराजै ॥ 4 ॥
256. उपदेश चेतावनी । रंग ताल
मन मूरखा ! तैं योंही जन्म गँवायो,
सांई केरी सेवा न कीन्हीं, इहि कलि काहे को आयो ॥ टेक॥
जिन बातन तेरो छूटिक नाँहीं, सोइ मन तेरे भायो।
कामी ह्वै विषया संग लागो, रोम रोम लपटायो ॥ 1 ॥
कुछ इक चेति विचारि देखो, कहा पाप जीय लायो।
दादू दास भजन करलीजे, स्वप्नै जगडहकायो ॥ 2 ॥
इति राग गूजरी (देवगांधार) सम्पूर्णः ॥ 11 ॥ पद 3 ॥
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