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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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पृष्ठ 405

श्री दादूवाणी-राग सिन्दूरा 10
अविनाशी गुरु सेविये, सहजैं प्राण अधार ॥ टेक ॥
ते पुर प्राणी तेहनो, अविचल सदा रहंत ।
आदि पुरुष ते आपणों, पूरण परम अनंत ॥ 1 ॥
अविगत आसण कीजिये, आपैं आप निधान।
निरालम्ब भजि तेहनों, आनंद आत्मराम ॥ 2 ॥
निर्गुण निश्चल थिर रहै, निराकार निज सोइ।
ते सति प्राणी सेविये, लै समाधि रत होइ ॥ 3 ॥
अमर आप रमता रमै, घट घट सिरजनहार ।
गुणातीत भज प्राणिया, दादू येह विचार ॥ 4 ॥
250. शूरतान झपताल
क्यूं भाजै सेवक तेरा, ऐसा सिर साहिब मेरा ॥ टेक ॥
जाके धरती गगन आकाशा, जाके चंद सूर कविलाशा।
जाके तेज पवन जल साजा, जाके पंच तत्त्व के बाजा ॥ 1 ॥
जाके अठारह भार वनमाला, गिरि पर्वत दीनदयाला।
जाके सायर अनन्त तरंगा, जाके चौरासी लख संगा ॥ 2 ॥
जाके ऐसे लोक अनन्ता, रचि राखै विधि बहु भंता।
जाके ऐसा खेल पसारा, सब देखै कौतुकहारा ॥ 3 ॥
जाके काल मीच डर नांहीं, सो बरत रह्या सब मांहीं।
मन भावै खेलै खेला, ऐसा है आप अकेला ॥ 4 ॥
जाके ब्रह्मा ईश्वर बंदा, सब मुनिजन लागे अंगा।
जाके साध सिद्ध सब मांहीं, परिपूरण परिमित नांहीं ॥ 5 ॥
सोई भानै घड़ै संवारै, जुग केते कबहुँ न हारै।
ऐसा हरि साहिब पूरा, सब जीवनि आतम मूरा ॥ 6 ॥
सो सबहिन की सुधि जानै, जो जैसा तैसी बानै।
सर्वंगी राम सयाना, हरि करै सो होइ निदाना ॥ 7 ॥

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