सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग सिन्दूरा 10
जे हरि जन सेवक भाजै, तो ऐसा साहिब लाजै ।
अब मरण माँड हरि आगे, तो दादू बाण न लागे ॥ 8 ॥
251. झपताल
हरि भजतां किमि भाजिये, भाजे भल नांहीं ।
भाजे भल क्यूं पाइये, पछतावै मांहीं ॥ टेक ॥
सूरा सो सहजैं भिड़ै, सार उर झेलै ।
रण रोकै भाजै नहीं, ते बाण न मेलै ॥ 1 ॥
सती सत साचा गहै, मरणे न डराई ।
प्राण तजै जग देखतां, पियड़ो उर लाई ॥ 2 ॥
प्राण पतंगा यों तजै, वो अंग न मोड़ै ।
जौवन जारै ज्योति सूं, नैना भल जोड़ै ॥ 3 ॥
सेवक सो स्वामी भजै, तन मन तजि आसा ।
दादू दर्शन ते लहैं, सुख संगम पासा ॥ 4 ॥
252. चेतावनी । रुद्र ताल
सुन तूँ मना रे, मूरख मूढ़ विचार,
आवै लहरि बिहावणी, दमै देह अपार ॥ टेक ॥
करिबो है तिमि कीजिये रे, सुमिर सो आधार ॥ 1 ॥
चरण बिहूणो चालबो रे, संभारी ले सार ॥ 2 ॥
दादू तेहज लीजिये रे, सांचो सिरजनहार ॥ 3 ॥
253. (गुजराती) रुद्र । ताल
रे मन साथी माहरा, तूनें समझायो कै बारो रे ।
रातो रंग कसुंभ के, तैं बिसार्यो आधारो रे ॥ टेक ॥
स्वप्ना सुख के कारणे, फिर पीछे दुख होई रे ।
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