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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 409, कुल 504 में से

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पृष्ठ 409

श्री दादूवाणी-राग देवगांधार 11
255. पतिव्रत उपदेश । त्रिताल
बौरी ! तूँ बार बार बौरानी।
सखी ! सुहाग न पावै ऐसे, कैसे भरमि भुलानी ॥ टेक॥
चरणों चेरी चित नहिं राख्यो, पतिव्रत नांहि न जान्यो ।
सुन्दरि सेज संग नहिं जानै, पीव सौं मन नहिं मान्यो ॥ 1 ॥
तन मन सबै शरीर न सौंप्यो, शीश नाइ नहिं ठाढ़ी।
इकरस प्रीति रही नहिं कबहुँ, प्रेम उमंग न बाढ़ी ॥ 2 ॥
प्रीतम अपनो परम सनेही, नैन निरख न अघानी।
निशि-वास आनिउर अंतर, परम पूज्य नहिं जानी ॥ 3 ॥
पतिव्रत आगे जिन जिन पाल्यो, सुन्दरी तिन सब छाजै।
दादू पीव बिन और न जानै, ताहि सुहाग विराजै ॥ 4 ॥
256. उपदेश चेतावनी । रंग ताल
मन मूरखा ! तैं योंही जन्म गँवायो,
सांई केरी सेवा न कीन्हीं, इहि कलि काहे को आयो ॥ टेक॥
जिन बातन तेरो छूटिक नाँहीं, सोइ मन तेरे भायो।
कामी ह्वै विषया संग लागो, रोम रोम लपटायो ॥ 1 ॥
कुछ इक चेति विचारि देखो, कहा पाप जीय लायो।
दादू दास भजन करलीजे, स्वप्नै जगडहकायो ॥ 2 ॥
इति राग गूजरी (देवगांधार) सम्पूर्णः ॥ 11 ॥ पद 3 ॥

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