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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
दादू रूप राग गुण अनुसरे, जहाँ माया तहँ जाइ ।
विद्या अक्षर पंडिता, तहाँ रहे घर छाइ ॥ 27 ॥
साधु न कोई पग भरै, कबहुँ राज दुवार ।
दादू उलटा आप में, बैठा ब्रह्म विचार ॥ 28 ॥
आशय-विश्राम
दादू अपणे अपणे घर गये, आपा अंग विचार ।
सहकामी माया मिले, निहकामी ब्रह्म संभार ॥ 29 ॥
माया
दादू माया मगन जु हो रहे, हमसे जीव अपार ।
माया माहीं ले रही, डूबे काली धार ॥ 30 ॥
शिश्न स्वाद
दादू विषय के कारणै रूप राते रहैं,
नैन नापाक यों कीन्ह भाई ।
बदी की बात सुनत सारा दिन,
श्रवण नापाक यों कीन्ह जाई ॥ 31 ॥
स्वाद के कारणै लुब्धि लागी रहे,
जिभ्या नापाक यों कीन्ह खाई ।
भोग के कारणै भूख लागी रहे,
अंग नापाक यों कीन्ह लाई ॥ 32 ॥
दादू नगरी चैन तब, जब इक राजी होइ ।
द्वै राजी दुख द्वन्द्व में, सुखी न बैसे कोइ ॥ 33 ॥
इक राजी आनन्द है, नगरी निश्चल वास ।
राजा प्रजा सुखी बसै, दादू जोति प्रकाश ॥ 34 ॥
शिश्न स्वाद
जैसे कुंजर काम वश, आप बंधाणा आइ ।
ऐसे दादू हम भये, क्यों कर निकस्या जाइ ॥ 35 ॥

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श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
जैसे मर्कट जीभ रस, आप बंधाणा अंध।
ऐसे दादू हम भये, क्यों कर छूटै फंध ॥ 36 ॥
ज्यों सूवा सुख कारणै, बंध्या मूरख माँहि।
ऐसे दादू हम भये, क्यों ही निकसै नाहि ॥ 37 ॥
जैसे अंध अज्ञान गृह, बंध्या मूरख स्वाद।
ऐसैं दादू हम भये, जन्म गँवाया बाद ॥ 38 ॥
दादू बूड रह्या रे बापुरे, माया गृह के कूप।
मोह्या कनक अरु कामिनी, नाना विधि के रूप ॥ 39 ॥
शिश्न स्वाद
दादू स्वाद लागि संसार सब, देखत परलै जाइ।
इन्द्री स्वारथ साच तजि, सबै बंधाणै आइ ॥ 40 ॥
विष सुख माँहैं रम रहे, माया हित चित लाइ।
सोई संतजन ऊबरे, स्वाद छाड़ि गुण गाइ ॥ 41 ॥
आसक्तता मोह
दादू झूठी काया झूठ घर, झूठा यहु परिवार।
झूठी माया देखकर, फूल्यो कहा गँवार ॥ 42 ॥
दादू झूठा संसार, झूठा परिवार, झूठा घर बार,
झूठा नर नार, तहाँ मन माने।
झूठा कुल जात, झूठा पितु मात, झूठा बंधु भ्रात,
झूठा तन गात, सत्य कर जाने।
झूठा सब धंध, झूठा सब फंध, झूठा सब अंध,
झूठा जाचंध, कहा मग छाने।
दादू भाग, झूठ सब त्याग, जाग रे जाग, देख दीवाने ॥ 43 ॥
दादू झूठे तन के कारणै, कीये बहुत विकार।
गृह दारा धन संपदा, पूत कुटुम्ब परिवार ॥ 44 ॥

  • 149 -

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
ता कारण हत आतमा, झूठ कपट अहंकार।
सो माटी मिल जायगा, बिसऱ्या सिरजनहार ॥ 45 ॥
दादू जन्म गया सब देखतां, झूठी के संग लाग।
साचे प्रीतम को मिले, भाग सके तो भाग ॥ 46 ॥
दादू गतं गृहं, गतं धनं, गतं दारा सुत यौवनं।
गतं माता, गतं पिता, गतं बंधु सज्जनं।
गतं आपा, गतं परा, गतं संसार कत रंजनं।
भजसि भजसि रे मन, परब्रह्म निरंजनं ॥ 47 ॥
आसक्ति मोह
जीवों माँही जीव रहै, ऐसा माया मोह।
सांई सूधा सब गया, दादू नहीं अंदोह ॥ 48 ॥
विरक्तता
माया मगहर खेत खर, सद्गति कदे न होइ।
जे बंचे ते देवता, राम सरीखे सोइ ॥ 49 ॥
कालर खेत न नीपजै, जो बाहे सौ बार।
दादू हाना बीज का, क्या पचि मरै गँवार ॥ 50 ॥
दादू इस संसार सौं, निमष न कीजे नेह।
जामण मरण आवटणा, छिन छिन दाझै देह ॥ 51 ॥
दादू मोह संसार को, विहरै तन मन प्राण।
दादू छूटै ज्ञान कर, को साधु संत सुजाण ॥ 52 ॥
मन हस्ती माया हस्तिनी, सघन वन संसार।
तामैं निर्भय हो रह्या, दादू मुग्ध गँवार ॥ 53 ॥
दादू काम कठिन घट चोर है, घर फोड़ै दिन रात।
सोवत साह न जागई, तत्त्व वस्तु ले जात ॥ 54 ॥
काम कठिन घट चोर है, मूसे भरे भंडार।
सोवत ही ले जायगा, चेतन पहरे चार ॥ 55 ॥

  • 150 -

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
ज्यों घुण लागै काठ को, लोहा लागै काट।
काम किया घट जाजरा, दादू बारह बाट ॥ 56 ॥
करतूति कर्म
राहु गिलै ज्यों चंद को, ग्रहण गिलै ज्यों सूर।
कर्म गिलै यों जीव को, नख-सिख लागै पूर ॥ 57 ॥
दादू चन्द्र गिलै जब राहु को, ग्रहण गिलै जब सूर।
जीव गिलै जब कर्म को, राम रह्या भरपूर ॥ 58 ॥
कर्म कुहाड़ा अंग वन, काटत बारंबार।
अपने हाथों आप को, काटत है संसार ॥ 59 ॥
मित्रता शत्रुता
आपै मारै आप कौं, यहु जीव बिचारा।
साहिब राखणहार है, सो हितू हमारा ॥ 60 ॥
आपै मारै आपकौं, आप आपकौं, खाइ।
आपै अपणा काल है, दादू कहै समझाइ ॥ 61 ॥
करतूती कर्म
मरबे की सब ऊपजै, जीबे की कुछ नांहि।
जीबे की जाणैं नहीं, मरबे की मन माँहि ॥ 62 ॥
बंध्या बहुत विकार सौं, सर्व पाप का मूल।
ढाहै सब आकार को, दादू येह स्थूल ॥ 63 ॥
दादू यह तो दोज़ख देखिये, काम क्रोध अहंकार।
रात दिवस जरबौ करै, आपा अग्नि विकार ॥ 64 ॥
विषय हलाहल खाइ कर, सब जग मर मर जाइ।
दादू मोहरा नाम ले, हृदय राखि ल्यौ लाइ ॥ 65 ॥
जेती विषया विलसिये, तेती हत्या होइ।
प्रत्यक्ष मानुष मारिये, सकल शिरोमणि सोइ ॥ 66 ॥

  • 151 -

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12

विषया का रस मद भया, नर नारी का माँस ।
माया माते मद पिया, किया जन्म का नाश ॥ 67 ॥
दादू भावै शाक्त भक्त हो, विषय हलाहल खाइ ।
तहँ जन तेरा राम जी, सपने कदे न जाइ ॥ 68 ॥
दादू खाडा बूजी भगत है, लोहरवाडा माँहि ।
परगट पैंडाइत बसैं, तहँ संत काहे को जांहि ॥ 69 ॥
साँपणि एक सब जीव को, आगे पीछे खाइ ।
दादू कहि उपकार कर, कोइ जन ऊबर जाइ ॥ 70 ॥
दादू खाये साँपणी, क्यों कर जीवैं लोग ।
राम मंत्र जन गारुड़ी, जीवैं इहि संजोग ॥ 71 ॥
दादू माया कारण जग मरै, पीव के कारण कोइ ।
देखो ज्यों जग परजलै, निमष न न्यारा होइ ॥ 72 ॥
काल कनक अरु कामिनी, परिहर इन का संग ।
दादू सब जग जल मुवा,ज्यों दीपक ज्योति पतंग ॥ 73 ॥
दादू जहाँ कनक अरु कामनी, तहँ जीव पतंगे जांहि ।
आग अनंत सूझै नहीं, जल-जल मूये माँहि ॥ 74 ॥
घट माँही माया घणी, बाहर त्यागी होइ ।
फाटी कंथा पहर कर, चिन्ह करै सब कोइ ॥ 75 ॥
काया राखे बन्ध दे, मन दह दिशि खेले ।
दादू कनक अरु कामिनी, माया नहीं मेले ॥ 76 ॥
दरसन पहरै मूंड मुंडावै, दुनियां देख त्याग दिखलावै ।
मन सौं मीठी मुख सौं खारी, माया त्यागी कहैं बजारी ॥ 77 ॥
माया मंदिर मीच का, तामैं पैठा धाइ ।
अंध भया सूझै नहीं, साध कहैं समझाइ ॥ 78 ॥

  • 152 -

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
दादू केते जल मुए, इस जोगी की आग।
दादू दूरै बंचिये, जोगी के संग लाग ॥ 79 ॥
ज्यों जल मैणी माछली, तैसा यहु संसार।
माया माते जीव सब, दादू मरत न बार ॥ 80 ॥
दादू माया फोड़े नैन दोइ, राम न सूझै काल।
साधु पुकारैं मेरू चढ़, देखि अग्नि की झाल ॥ 81 ॥
बिना भुवंगम हम डसे, बिन जल डूबे जाइ।
बिन ही पावक ज्यों जले, दादू कुछ न बसाइ ॥ 82 ॥
दादू अमृत रूपी आप है, और सबै विष झाल।
राखणहारा राम है, दादू दूजा काल ॥ 83 ॥
बाजी चिहर रचाय कर, रह्या अपरछन होइ।
माया पट पड़दा दिया, तातैं लखै न कोइ ॥ 84 ॥
दादू बाहे देखतां, ढिग ही ढोरी लाइ।
पीव पीव करते सब गये, आपा दे न दिखाइ ॥ 85 ॥
मैं चाहूँ सो ना मिलै, साहिब का दीदार।
दादू बाजी बहुत हैं, नाना रंग अपार ॥ 86 ॥
हम चाहें सो ना मिलै, और बहुतेरा आइ।
दादू मन मानै नहीं, केता आवै जाइ ॥ 87 ॥
बाजी मोहे जीव सब, हमको भुरकी बाहि।
दादू कैसी कर गया, आपण रह्या छिपाइ ॥ 88 ॥
दादू सांई सत्य है, दूजा भ्रम विकार।
नाम निरंजन निर्मला, दूजा घोर अंधार ॥ 89 ॥
दादू सो धन लीजिये, जे तुम सेती होइ।
माया बांधे कई मुए, पूरा पड्या न कोइ ॥ 90 ॥

  • 153 -

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
दादू कहै, जे हम छाड़े हाथ थैं, सो तुम लिया पसार ।
जे हम लेवैं प्रीति सौं, सो तुम दिया डार ॥ 91 ॥
दादू हीरा पग सौं ठेलि कर, कंकर को कर लीन्ह ।
पारब्रह्म को छाड़ कर, जीवन सौं हित कीन्ह ॥ 92 ॥
दादू सबको बणिजै खार खल, हीरा कोई न लेय ।
हीरा लेगा जौहरी, जो माँगे सो देय ॥ 93 ॥
दड़ी दोट ज्यों मारिये, तिहुँ लोक में फे र ।
धुरि पहुँचे संतोंष है, दादू चढिबा मेर ॥ 94 ॥
अनिल पंखी आकाश को, माया मेरु उलंघ ।
दादू उलटे पंथ चढ, जाइ बिलंबे अंग ॥ 95 ॥
दादू माया आगे जीव सब, ठाढे रहे कर जोड़ ।
जिन सिरजे जल बूँद सौं, तासों बैठे तोड़ ॥ 96 ॥
सुर नर मुनिवर वश किये, ब्रह्मा विष्णु महेश ।
सकल लोक के सिर खड़ी, साधु के पग हेठ ॥ 97 ॥
दादू माया चेरी संत की, दासी उस दरबार ।
ठकुराणी सब जगत की, तीनों लोक मंझार ॥ 98 ॥
दादू माया दासी संत की, शाकत की सिरताज ।
शाकत सेती भांडणी, संतों सेती लाज ॥ 99 ॥
चार पदार्थ मुक्ति बापुरी, अठ सिधि नव निधि चेरी ।
माया दासी ताकेआगे, जहाँ भक्ति निरंजन तेरी ॥ 100 ॥
दादू कहै, माया चेरी साधुहि सेवै । साधुन कबहूँ आदर देवै ॥
ज्यों आवै, त्यों जाइ बिचारी । विलसी, वितड़ी, न माथै मारी ॥ 101 ॥
दादू माया सब गहले किये, चौरासी लख जीव ।
ताका चेरी क्या करै, जे रंग राते पीव ॥ 102 ॥

  • 154 -

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
विरक्तता
दादू माया बैरिण जीव की, जनि कोइ लावे प्रीति ।
माया देखे नरक कर, यह संतन की रीति ॥ 103 ॥
माया
माया मति चकचाल कर, चंचल कीये जीव ।
माया माते मद पिया, दादू बिसऱ्या पीव ॥ 104 ॥
आन लग्न व्यभिचार
जने जने की राम की, घर घर की नारी ।
पतिव्रता नहीं पीव की, सो माथै मारी ॥ 105 ॥
जन जन के उठ पीछे लागै, घर घर भ्रमत डोलै ।
ताथैं दादू खाइ तमाचे, माँदल दुहुँ मुख बोलै ॥ 106 ॥
विषय विरक्तता
जे नर कामिनी परहरैं,ते छूटैं गर्भवास ।
दादू ऊँधे मुख नहीं, रहैं निरंजन पास ॥ 107 ॥
रोक न राखै, झूठ न भाखै, दादू खरचै खाइ ।
नदी पूर प्रवाह ज्यों, माया आवै जाइ ॥ 108 ॥
सदका सिरजनहार का, केता आवै जाइ ।
दादू धन संचय नहीं, बैठा खुलावै खाइ ॥ 109 ॥
माया
जोगिनी ह्वै जोगी गहै, सूफिनी ह्वै कर शेख ।
भक्तिनी ह्वै भक्ता गहै, कर कर नाना भेख ॥ 110 ॥
बुद्धि विवेक बल हरणी, त्रय तन ताप उपावनी ।
अंग अगनि प्रजालिनी, जीव घरबार नचावनी ॥ 111 ॥
नाना विधि के रूप धर, सब बांधे भामिनी ।
जग बिटंब परलै किया, हरि नाम भुलावनी ॥ 112 ॥

  • 155 -

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
बाजीगर की पूतली, ज्यौं मर्कट मोह्या।
दादू माया राम की, सब जगत बिगोया ॥ 113 ॥
शिश्न स्वाद
मोरा मोरी देखकर, नाचै पंख पसार।
यों दादू घर आंगणै, हम नाचे कै बार ॥ 114 ॥
पुरुष प्रकाशक
दादू जिस घट दीपक राम का, तिस घट तिमिर न होइ।
उस उजियारे ज्योति के, सब जग देखै सोइ ॥ 115 ॥
माया
दादू जेहि घट ब्रह्म न प्रकटै, तहँ माया मंगल गाइ।
दादू जागै ज्योति जब, तब माया भ्रम विलाइ ॥ 116 ॥
पति पहचान
दादू जोति चमकै तिरवरे, दीपक देखै लोइ।
चन्द सूर का चान्दणा, पगार छलावा होइ ॥ 117 ॥
माया
दादू दीपक देह का, माया प्रगट होइ।
चौरासी लख पंखिया, तहाँ परै सब कोइ ॥ 118 ॥
पुरुष प्रकाशक
दादू यहु घट दीपक साध का, ब्रह्म ज्योति प्रकाश।
दादू पंखी संतजन, तहाँ परैं निज दास ॥ 119 ॥
विषय विरक्तता
दादू मन मृतक भया, इंद्री अपणै हाथ।
तो भी कदे न कीजिये, कनक कामिनी साथ ॥ 120 ॥
जानै बूझै जीव सब, त्रिया पुरुष का अंग।
आपा पर भूला नहीं, दादू कैसा संग ॥ 121 ॥
माया के घट साजि द्वै, त्रिया पुरुष धरि नांव।
दोन्यूं सुन्दर खेलैं दादू, राखि लेहु बलि जांव ॥ 122 ॥

  • 156 -

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
बहिन बीर सब देखिये, नारी अरु भरतार ।
परमेश्वर के पेट का, दादू सब परिवार ॥ 123 ॥
पर घर परिहर आपणी, सब एकै उणहार ।
पसु प्राणी समझै नहीं, दादू मुग्ध गँवार ॥ 124 ॥
पुरुष पलट बेटा भया, नारी माता होहि ।
दादू को समझै नहीं, बड़ा अचंभा मोहि ॥ 125 ॥
माता नारी पुरुष की, पुरुष नारी का पूत ।
दादू ज्ञान विचार कर, छाड़ गये अवधूत ॥ 126 ॥
अध्यात्म
दादू माया का जल पीवतां, व्याधि होइ विकार ।
सेझे का जल निर्मला, प्राण सुखी सुध सार ॥ 127 ॥
जीव गहिला जीव बावला, जीव दीवाना होइ ।
दादू अमृत छाड़ कर, विष पीवै सब कोइ ॥ 128 ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश लौं, सुर नर उरझाया ।
विष का अमृत नाम धर, सब किनहूँ खाया ॥ 129 ॥
माया
माया मैली गुणमयी, धर धर उज्ज्वल नांम ।
दादू मोहे सबनि को, सुर नर सब ही ठांम ॥ 130 ॥
विषय अतृप्ति
विष का अमृत नांव धर, सब कोई खावै ।
दादू खारा ना कहै, यहु अचरज आवै ॥ 131 ॥
दादू जे विष जारे खाइ कर, जनि मुख में मेलै ।
आदि अन्त परलै गये, जे विष सौं खेलै ॥ 132 ॥
जिन विष खाया ते मुये, क्या मेरा तेरा ।
आग पराई आपणी, सब करै निबेरा ॥ 133 ॥

  • 157 -

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
अपना पराया खाइ विष, देखत ही मर जाय।
दादू को जीवै नहीं, इहि भोरे जनि खाय ॥ 134 ॥
दादू कहै, जनि विष पीवै बावरे, दिन दिन बाढै रोग।
देखत ही मर जाइगा, तजि विषिया रस भोग ॥ 135 ॥
माया
ब्रह्म सरीखा होइ कर, माया सौं खेलै।
दादू दिन दिन देखतां, अपने गुण मेलै ॥ 136 ॥
माया मारै लात सौ, हरि को घालै हाथ।
संग तजै सब झूठ का, गहै सच का साथ ॥ 137 ॥
घर के मारे वन के मारे, मारे स्वर्ग पयाल।
सूक्ष्म मोटा गूंथकर, माँड्या माया जाल ॥ 138 ॥
दादू ऊभा सारं, बैठा विचारं, संभारं जागत सूता।
तीन लोक तत जाल विडारण, तहाँ जाइगा पूता ॥139॥
मूये सरीखे है रहे, जीवन की क्या आस।
दादू राम विसार कर, बांछे भोग विलास ॥ 140 ॥
कृत्रिम कर्ता
माया रूपी राम को, सब कोई ध्यावै।
अलख आदि अनादि है, सो दादू गावै ॥ 141 ॥
ब्रह्मा का वेद, विष्णु की मूर्ति, पूजे सब संसारा।
महादेव की सेवा लागे, कहाँ है सिरजनहारा ॥ 142 ॥
माया का ठाकुर किया, माया की महामाइ।
ऐसे देव अनंत कर, सब जग पूजन जाइ ॥ 143 ॥
माया बैठी राम है, कहै मैं ही मोहन राइ।
ब्रह्मा विष्णु महेश लौं, जोनी आवै जाइ ॥ 144 ॥
माया बैठी राम है, ताको लखै न कोइ।
सब जग मानै सत्य कर, बड़ा अचंभा मोहि ॥ 145 ॥

  • 158 -

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
अंजन किया निरंजना, गुण निर्गुण जानें।
धरा दिखावैं अधर कर, कैसे मन मानैं ॥ 146 ॥
निरंजन की बात कहै, आवै अंजन माँहि।
दादू मन मानै नहीं, स्वर्ग रसातल जांहि ॥ 147 ॥
कामधेनु कै पटंतरे, करै काठ की गाइ।
दादू दूध दूझै नहीं, मूरख देइ बहाइ ॥ 148 ॥
चिंतामणि कंकर किया, माँगे कुछ न देइ।
दादू कंकर डारदे, चिंतामणि कर लेइ ॥ 149 ॥
पारस किया पाषाण का, कंचन कदे न होइ।
दादू आत्माराम बिन, भूल पड़या सब कोइ ॥ 150 ॥
सूरज फटिक पाषाण का, तासौं तिमिर न जाइ।
साचा सूरज परगटै, दादू तिमिर नशाइ ॥ 151 ॥
मूर्ति घड़ी पाषाण की, किया सिरजनहार।
दादू साच सूझै नहीं, यों डूबा संसार ॥ 152 ॥
पुरुष विदेश कामिनी किया, उसही के उणिहार।
कारज को सीझै नहीं, दादू माथे मार ॥ 153 ॥
कागद का मानुष किया, छत्रपति सिरमौर।
राजपाट साधै नहीं, दादू परिहर और ॥ 154 ॥
सकल भुवन भानै घड़ै, चतुर चलावनहार।
दादू सो सूझै नहीं, जिसका वार न पार ॥ 155 ॥
कर्ता साक्षीभूत
दादू पहली आप उपाइ कर, न्यारा पद निर्वाण।
ब्रह्मा विष्णु महेश मिल, बाँध्या सकल बंधाण ॥ 156 ॥
कृत्रिम कर्ता
नाम नीति अनीति सब, पहली बाँधे बंध।
पशु न जाणै पारधी, दादू रोपे फंध ॥ 157 ॥

  • 159 -

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
दादू बाँधे वेद विधि, भरम करम उरझाइ ।
मर्यादा माँही रहै, सुमिरण किया न जाइ ॥ 158 ॥
माया नगरी दोष निरूपण
दादू माया मीठी बोलणी, नइ नइ लागै पाइ ।
दादू पैसि पेट में, काढ कलेजा खाइ ॥ 159 ॥
नारी नागिन जे डसे, ते नर मुये निदान ।
दादू को जीवै नहीं, पूछो सबै सयान ॥ 160 ॥
नारी नागिन एक सी, बाघिन बड़ी बलाइ ।
दादू जे नर रत भये, तिनका सर्वस खाइ ॥ 161 ॥
नारी नैन न देखिये, मुख सौं नाम न लेइ ।
कानों कामिनि जनि सुणै, यहु मन जाण न देइ ॥ 162 ॥
सुन्दरी खाये साँपिनी, केते इहि कलि माँहि ।
आदि अन्त इन सब डसे, दादू चेते नांहि ॥ 163 ॥
दादू पैसै पेट में, नारी नागिन होइ ।
दादू प्राणी सब डसे, काढ सकै न कोइ ॥ 164 ॥
माया सांपिनी सब डसे, कनक कामिनी होइ ।
ब्रह्मा विष्णु महेश लौं, दादू बचै न कोइ ॥ 165 ॥
माया मारै जीव सब, खंड खंड कर खाइ ।
दादू घट का नास कर, रोवै जग पतियाइ ॥ 166 ॥
बाबा बाबा कहि गिलै, भाई कहि कहि खाइ ।
पूत पूत कहि पी गई, पुरुषा जनि पतियाइ ॥ 167 ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश की, नारी माता होइ ।
दादू खाये जीव सब, जनि रु पतीजै कोइ ॥ 168 ॥
माया बहुरूपी नटणी नाचै, सुर नर मुनि को मोहै ।
ब्रह्मा विष्णु महादेव बाहे, दादू बपुरा को है ॥ 169 ॥

  • 160 -

श्री दादूवाणी-माया का अंग 12
माया फाँसी हाथ ले, बैठी गोप छिपाहि ।
जे कोई धीजे प्राणियां, ताही के गल बाहि ॥ 170 ॥
पुरुषा फाँसी हाथ कर, कामिनि के गल बाहि ।
कामिनि कटारी कर गहै, मार पुरुष को खाहि ॥ 171 ॥
नारी बैरिन पुरुष की, पुरुषा बैरी नार।
अंत काल दोन्यूं मुये, दादू देख विचार ॥ 172 ॥
नारी पुरुष को ले मुई, पुरुषा नारी साथ।
दादू दोनों पच मुये, कछू न आया हाथ ॥ 173 ॥
नारी पीवै पुरुष को, पुरुष नारी को खाइ ।
दादू गुरु के ज्ञान बिन, दोनों गये विलाइ ॥ 174 ॥
भँवरा लुब्धी बास का, कमल बँधाना आइ ।
दिन दश माँहैं देखतां, दोनों गये विलाइ ॥ 175 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुबुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
बारहवां माया कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 12 ॥ साखी 175 ॥

  • 161 -

सांच
का
अंग
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अथ सांच का अंग १३
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
अदया हिंसा
दादू दया जिन्हों के दिल नहिं, बहुरि कहावें साध ।
जे मुख उनका देखिये, तो लागै बहु अपराध ॥ 2 ॥
दादू महर मोहब्बत मन नहीं, दिल के वज्र कठोर ।
काले काफिर ते कहिये, मोमिन मालिक और ॥ 3 ॥

  • 162 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
दादू कोई काहू जीव की, करै आत्माघात ।
साच कहूँ संशय नहीं, सो प्राणी दोज़ख जात ॥ 4 ॥
दादू नाहर सिंह सियाल सब, केते मुसलमान ।
माँस खाइ मोमिन भये, बड़े मियां का ज्ञान ॥ 5 ॥
दादू माँस अहारी जे नरा, ते नर सिंह सियाल ।
बक1 मंजार2 सुनहाँ3 सही, एता प्रत्यक्ष काल ॥ 6 ॥
दादू मुई मार मानुष घणे, ते प्रत्यक्ष जम काल ।
महर दया नहीं सिंह दिल, कूकर काग सियाल ॥ 7 ॥
माँस अहारी मद पीवै, विषय विकारी सोइ ।
दादू आत्मराम बिन, दया कहाँ थी होइ ॥ 8 ॥
लंगर लोग लोभ सौं लागैं, बोलैं सदा उन्हों की भीर ।
जोर जुल्म बीच बटपारे, आदि अंत उन्हीं सौं सीर ॥ 9 ॥
तन मन मार रहे सांई सौं, तिनकौं देख करैं ताजीर ।
ये बड़ि-बूझ कहाँ थैं पाई, ऐसी कजा अवलिया पीर ॥ 10 ॥
बे महर गुमराह गाफिल, गोश्त खुरदनी ।
बेदिल बदकार आलम, हयात मुरदनी ॥ 11 ॥
छल कर बल कर घाइ कर, मारै जिंहि तिंहि फेरि ।
दादू ताहि न धीजिये, परणै सगी पतेरि ॥ 12 ॥
दादू दुनियां सौं दिल बांध करि, बैठे दीन गँवाइ ।
नेकी नाम बिसार करि, करद कमाया खाइ ॥ 13 ॥
दादू गल काटैं कलमा भरैं, अया विचारा दीन ।
पंचों वक्त नमाज गुजारैं, साबित नहीं यकीन ॥ 14 ॥
दुनियां के पीछे पड़ा, दौड़ा दौड़ा जाइ ।
दादू जिन पैदा किया, ता साहिब को छिटकाइ ॥ 15 ॥

  • 163 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
कुफ्र जे के मन में, मीयां मुसलमान ।
दादू पेया झंग में, बिसारे रहमान ॥ 16 ॥
आपस को मारै नहीं, पर को मारन जाइ ।
दादू आपा मारे बिना, कैसे मिले खुदाइ ॥ 17 ॥
दादू भीतर द्वन्दर भर रहे, तिनको मारैं नांहि ।
साहिब की अरवाह को, ताको मारन जांहि ॥ 18 ॥
दादू मूये को क्या मारिये, मीयां मूई मार ।
आपस को मारै नहीं, औरों को हुसियार ॥ 19 ॥
सांच
जिसका था तिसका हुआ, तो काहे का दोष ।
दादू बंदा बंदगी, मीयां ना कर रोष ॥ 20 ॥
सेवक सिरजनहार का, साहिब का बंदा ।
दादू सेवा बंदगी, दूजा क्या धंधा ॥ 21 ॥
सो काफिर जे बोलै काफ, दिल अपना नहीं राखै साफ।
सांई को पहचानै नांहीं, कूड़ कपट सब उन्हींमांहीं ॥ 22 ॥
साँई का फरमान न मानैं, कहाँ पीव ऐसै कर जानैं ।
मन अपणे में समझत नांहीं, निरखत चलैं अपनी छांहीं ॥ 23 ॥
जोर करै मसकीन सतावै, दिल उसके में दर्द न आवै ।
सांई सेती नांही नेह, गर्व करै अति अपनी देह ॥ 24 ॥
इन बातन क्यों पावै पीव, पर धन ऊपर राखै जीव ।
जोर जुल्म कर कुटुम्ब सौं खाइ, सो काफिर दोजख में जाइ ॥ 25 ॥
अदया-हिंसा
दादू जाको मारन जाइये, सोई फिर मारै ।
जाको तारन जाइये, सोई फिर तारै ॥ 26 ॥

  • 164 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
दादू नफ्स नाम सौं मारिये, गोशमाल दे पंद।
दूई है सो दूरि कर, तब घर में आनन्द ॥ 27 ॥
सच्चे मुसलमान के लक्षण
मुसलमान जो राखे मान, सांई का माने फरमान।
सारों को सुखदाई होइ, मुसलमान कर जानूँ सोइ ॥ 28 ॥
दादू मुसलमान महर गह रहै, सबको सुख, किसही नहिं दहै।
मुवा न खाइ, जीवत नहिं मारै, करै बंदगी, राह संवारै ॥ 29 ॥
सो मोमिन मन मे कर जान, सत्य सबूरी बैसे आन।
चलै साच सँवारे बाट, तिनको खुले बहिश्त के पाट ॥ 30 ॥
सो मोमिन मोम दिल होइ, सांई को पहचानै सोइ।
जोर न करै हराम न खाइ, सो मोमिन बहिश्त में जाइ ॥ 31 ॥
जो हम नहीं गुजारते, तुम्ह को क्या भाई।
सीर नहीं कुछ बंदगी, कहु क्यों फरमाई ॥ 32 ॥
अपने अमलों छूटिये, काहू के नाहीं।
सोई पीड़ पुकार सी, जा दूखै माहीं ॥ 33 ॥
कोई खाइ अघाइ करि, भूखे क्यों भरिये।
खूटी पूगी आन की, आपण क्यों मरिये ॥ 34 ॥
फूटी नाव समंद में, सब डूबन लागे।
अपना अपना जीव ले, सब कोई भागे ॥ 35 ॥
दादू शिर शिर लागी आपने, कहु कौण बुझावै।
अपना अपना साच दे, सांई को भावै ॥ 36 ॥
सुमिरण नाम चितावनी
साचा नाम अल्लाह का, सोई सत्य कर जाण।
निश्चल कर ले बंदगी, दादू सो परमाण ॥ 37 ॥

  • 165 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
आवट कूटा होत है, अवसर बीता जाइ ।
दादू कर ले बंदगी, राखणहार खुदाइ ॥ 38 ॥
इस कलि केते ह्वै गये, हिंदू मुसलमान ।
दादू सांची बंदगी, झूठा सब अभिमान ॥ 39 ॥
कथनी बिना करणी
पोथी अपना पिंड कर, हरि यश माँहीं लेख ।
पंडित अपना प्राण कर, दादू कथहु अलेख ॥ 40 ॥
काया कतेब बोलिए, लिख राखूं रहमान ।
मनवा मुल्लां बोलिये, श्रोता है सुबहान ॥ 41 ॥
दादू काया महल में नमाज गुजारूं, तहँ और न आवन पावै ।
मन मणके कर तसबीह फेरूं, तब साहिब के मन भावै ॥ 42 ॥
दिल दरिया में गुसल हमारा, ऊजू कर चित लाऊँ ।
साहिब आगेकरूं बंदगी, बेर बेर बलि जाऊँ ॥ 43 ॥
दादू पंचों संग संभालूं सांई, तन मन तब सुख पाऊँ।
प्रेम पियाला पिवजी देवै, कलमा ये लै लाऊँ ॥ 44 ॥
शोभा कारण सब करै, रोजा बांग नमाज ।
मुवा न एकौ आह सौं, जे तुझ साहिब सेती काज ॥ 45 ॥
हर रोज हजूरी होइ रहु, काहे करै कलाप ।
मुल्ला तहाँ पुकारिये, जहाँ अर्श इलाही आप ॥ 46 ॥
हरदम हाजिर होना बाबा, जब लग जीवै बंदा ।
दायम दिल सांई सौं साबित, पंच वक्त क्या धंधा ॥ 47 ॥
हिंदू मुसलमानों का भ्रम
दादू हिंदू मारग कहैं हमारा, तुरक कहैं रह मेरी ।
कहाँ पंथ है कहो अलह का? तुम तो ऐसी हेरी ॥ 48 ॥
दादू दुई दरोग लोग को भावै, सांई को साँच पियारा ।
कौन पंथ हम चलैं कहो धू, साधो करो विचारा ॥ 49 ॥

  • 166 -

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13
खंड खंड कर ब्रह्म को, पख पख लीया बाँट।
दादू पूरण ब्रह्म तज, बँधे भरम की गाँठ ॥ 50 ॥
मन विकार औषधि
जीवत दीसै रोगिया, कहैं मूवां पीछे जाइ।
दादू दुँह के पाठ में, ऐसी दारू लाइ ॥ 51 ॥
सो दारू किस काम की, जाथैं दर्द न जाइ।
दादू काटै रोग को, सो दारू ले लाइ ॥ 52 ॥
दादू अनुभव काटै रोग को, अनहद उपजै आइ।
सेझे का जल निर्मला, पीवै रुचि ल्यौ लाइ ॥ 53 ॥
सोई अनुभव सोई ऊपजी, सोई शब्द तत सार।
सुनतां ही साहिब मिलै, मन के जाहिं विकार ॥ 54 ॥
चानक उपदेश
औषध खाइ न पथ्य रहै, विषम व्याधि क्यों जाइ।
दादू रोगी बावरा, दोष बैद को लाइ ॥ 55 ॥
एक सेर का ठांवड़ा, क्योंही भऱ्या न जाइ।
भूख न भागी जीव की, दादू केता खाइ ॥ 56 ॥
पशुवां की नांई भर भर खाइ, व्याधि घणेरी बधती जाइ।
पशुवां नांई करै अहार, दादू बाढै रोग अपार ॥ 57 ॥
राम रसायन भर भर पीवै, दादू जोगी जुग जुग जीवै।
संयम सदा, न व्यापै व्याधी, रहै निरोगी लगै समाधी ॥ 58 ॥
शिश्न श्वास
दादू चारै चित दिया, चिन्तामणि को भूल।
जन्म अमोलक जात है, बैठे माँझी फूल ॥ 59 ॥
भरी अधौड़ी भावठी, बैठा पेट फुलाइ।
दादू शूकर स्वान ज्यों, ज्यों आवै त्यों खाइ ॥ 60 ॥

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