सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-माया का अंग 12
ज्यों घुण लागै काठ को, लोहा लागै काट।
काम किया घट जाजरा, दादू बारह बाट ॥ 56 ॥
करतूति कर्म
राहु गिलै ज्यों चंद को, ग्रहण गिलै ज्यों सूर।
कर्म गिलै यों जीव को, नख-सिख लागै पूर ॥ 57 ॥
दादू चन्द्र गिलै जब राहु को, ग्रहण गिलै जब सूर।
जीव गिलै जब कर्म को, राम रह्या भरपूर ॥ 58 ॥
कर्म कुहाड़ा अंग वन, काटत बारंबार।
अपने हाथों आप को, काटत है संसार ॥ 59 ॥
मित्रता शत्रुता
आपै मारै आप कौं, यहु जीव बिचारा।
साहिब राखणहार है, सो हितू हमारा ॥ 60 ॥
आपै मारै आपकौं, आप आपकौं, खाइ।
आपै अपणा काल है, दादू कहै समझाइ ॥ 61 ॥
करतूती कर्म
मरबे की सब ऊपजै, जीबे की कुछ नांहि।
जीबे की जाणैं नहीं, मरबे की मन माँहि ॥ 62 ॥
बंध्या बहुत विकार सौं, सर्व पाप का मूल।
ढाहै सब आकार को, दादू येह स्थूल ॥ 63 ॥
दादू यह तो दोज़ख देखिये, काम क्रोध अहंकार।
रात दिवस जरबौ करै, आपा अग्नि विकार ॥ 64 ॥
विषय हलाहल खाइ कर, सब जग मर मर जाइ।
दादू मोहरा नाम ले, हृदय राखि ल्यौ लाइ ॥ 65 ॥
जेती विषया विलसिये, तेती हत्या होइ।
प्रत्यक्ष मानुष मारिये, सकल शिरोमणि सोइ ॥ 66 ॥
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