सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-माया का अंग 12
दादू रूप राग गुण अनुसरे, जहाँ माया तहँ जाइ ।
विद्या अक्षर पंडिता, तहाँ रहे घर छाइ ॥ 27 ॥
साधु न कोई पग भरै, कबहुँ राज दुवार ।
दादू उलटा आप में, बैठा ब्रह्म विचार ॥ 28 ॥
आशय-विश्राम
दादू अपणे अपणे घर गये, आपा अंग विचार ।
सहकामी माया मिले, निहकामी ब्रह्म संभार ॥ 29 ॥
माया
दादू माया मगन जु हो रहे, हमसे जीव अपार ।
माया माहीं ले रही, डूबे काली धार ॥ 30 ॥
शिश्न स्वाद
दादू विषय के कारणै रूप राते रहैं,
नैन नापाक यों कीन्ह भाई ।
बदी की बात सुनत सारा दिन,
श्रवण नापाक यों कीन्ह जाई ॥ 31 ॥
स्वाद के कारणै लुब्धि लागी रहे,
जिभ्या नापाक यों कीन्ह खाई ।
भोग के कारणै भूख लागी रहे,
अंग नापाक यों कीन्ह लाई ॥ 32 ॥
दादू नगरी चैन तब, जब इक राजी होइ ।
द्वै राजी दुख द्वन्द्व में, सुखी न बैसे कोइ ॥ 33 ॥
इक राजी आनन्द है, नगरी निश्चल वास ।
राजा प्रजा सुखी बसै, दादू जोति प्रकाश ॥ 34 ॥
शिश्न स्वाद
जैसे कुंजर काम वश, आप बंधाणा आइ ।
ऐसे दादू हम भये, क्यों कर निकस्या जाइ ॥ 35 ॥
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