सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
सुन्दरी विलाप
जिसकी खूबी, खूब सब, सोई खूब सँभार।
दादू सुन्दरी खूब सौं, नखशिख साज सँवार ॥ 28 ॥
दादू पंच आभूषण पीव कर, सोलह सब ही ठांव।
सुन्दरी यहु श्रृंगार करि, ले ले पीव का नांव ॥ 29 ॥
यहु व्रत सुन्दरी ले रहै, तो सदा सुहागिनी होइ।
दादू भावै पीव कौं, ता सम और न कोइ ॥ 30 ॥
पतिव्रता निष्काम
साहिब जी का भावता, कोई करै कलि मांहि।
मनसा वाचा कर्मना, दादू घटि घटि नांहि ॥ 31 ॥
आज्ञा मांहीं बैसै ऊठै, आज्ञा आवै जाइ।
आज्ञा मांहीं लेवै देवै, आज्ञा पहरै खाइ ॥ 32 ॥
आज्ञा मांही बाहर भीतर, आज्ञा रहै समाइ।
आज्ञा मांही तन मन राखै, दादू रहै ल्यौ लाइ ॥ 33 ॥
पतिव्रता गृह आपने, करै खसम की सेव।
ज्यों राखै त्यों ही रहै, आज्ञाकारी टेव ॥ 34 ॥
सुन्दरी विलाप
दादू नीच ऊँच कुल सुन्दरी, सेवा सारी होइ।
सोई सुहागिन कीजिये, रूप न पीजे धोइ ॥ 35 ॥
दादू जब तन मन सौंप्या राम को, ता सन क्या व्यभिचार।
सहज शील संतोष सत, प्रेम भक्ति लै सार ॥ 36 ॥
पर पुरुषा सब परहरै, सुन्दरी देखै जागि।
अपणा पीव पिछाण करि, दादू रहिये लागि ॥ 37 ॥
आन पुरुष हूँ बहिनड़ी, परम पुरुष भरतार।
हूँ अबला समझं नहीं, तूं जानै करतार ॥ 38 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
जिसका तिसकौं दीजिये, सांई सन्मुख आइ।
दादू नख शिख सौंप सब, जनि यहु बंट्या जाइ ॥ 39 ॥
सारा दिल सांई सौं राखै, दादू सोई सयान।
जे दिल बंटै आपना, सो सब मूढ़ अयान ॥ 40 ॥
दादू सारों सौं दिल तोरि कर, सांई सौं जोड़ै।
सांई सेती जोड़ करि, काहे को तोड़ै ॥ 41 ॥
साहिब देवै राखणा, सेवक दिल चोरै।
दादू सब धन साह का, भूला मन थोरै ॥ 42 ॥
पतिव्रत
दादू मनसा वाचा कर्मना, अंतर आवै एक।
ताको प्रत्यक्ष राम जी, बातें और अनेक ॥ 43 ॥
दादू मनसा वाचा कर्मना, हिरदै हरि का भाव।
अलख पुरुष आगे खड़ा, ताके त्रिभुवन राव ॥ 44 ॥
दादू मनसा वाचा कर्मना, हरि जी सौं हित होइ।
साहिब सन्मुख संग है, आदि निरंजन सोइ ॥ 45 ॥
दादू मनसा वाचा कर्मणा, आतुर कारण राम।
सम्रथ सांई सब करै, परगट पूरे काम ॥ 46 ॥
नारी पुरुषा देख करि, पुरुषा नारी होइ।
दादू सेवक राम का, शीलवन्त है सोइ ॥ 47 ॥
आन लग्न व्यभिचार
पर पुरुषा रत बांझणी, जाणे जे फल होइ।
जन्म बिगोवै आपना, दादू निष्फल सोइ ॥ 48 ॥
दादू तज भरतार को, पर पुरुषा रत होइ।
ऐसी सेवा सब करैं, राम न जाने सोइ ॥ 49 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
पतिव्रत
नारी सेवक तब लगै, जब लग सांई पास।
दादू परसै आन को, ताकी कैसी आस ॥ 50 ॥
आन लगन व्यभिचार
दादू नारी पुरुष को, जाने जे वश होइ।
पीव की सेवा ना करै, कामणिगारी सोइ ॥ 51 ॥
करूणा
कीया मन का भावता, मेटी आज्ञाकार।
क्या ले मुख दिखलाइये, दादू उस भर्तार ॥ 52 ॥
आन लग्न व्यभिचार
करामात कलंक है, जाकै हिरदै एक।
अति आनन्द व्यभिचारिणी, जाके खसम अनेक ॥ 53 ॥
दादू पतिव्रता के एक है, व्यभिचारिणी के दोइ।
पतिव्रता व्यभिचारिणी, मेला क्यों कर होइ ॥ 54 ॥
पतिव्रता के एक है, दूजा नांही आन।
व्यभिचारिणी के दोइ हैं, पर घर एक समान ॥ 55 ॥
सुन्दरी सुहाग
दादू पुरुष हमारा एक है, हम नारी बहु अंग।
जे जे जैसी ताहि सौं, खेलैं तिस हि रंग ॥ 56 ॥
पतिव्रत
दादू रहता राखिये, बहता देइ बहाइ।
बहते संग न जाइये, रहते सौं ल्यौ लाइ ॥ 57 ॥
जनि बाझैं काहू कर्म सौं, दूजै आरंभ जाइ।
दादू ऐकै मूल गहि, दूजा देइ बहाइ ॥ 58 ॥
बावें देखि न दाहिने, तन मन सन्मुख राखि।
दादू निर्मल तत्त्व गह, सत्य शब्द यहु साखि ॥ 59 ॥
दादू दूजा नैन न देखिये, श्रवणहुँ सुने न जाइ।
जिह्या आन न बोलिये, अंग न और सुहाइ ॥ 60 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
चरणहुँ अनत न जाइये, सब उलटा मांहि समाइ ।
उलट अपूठा आप में, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 61 ॥
दादू दूजे अंतर होत है, जनि आने मन मांहि ।
तहाँ ले मन को राखिये, जहँ कुछ दूजा नांहि ॥ 62 ॥
भ्रम विध्वंस
भ्रम तिमिर भाजै नहीं, रे जिय आन उपाइ ।
दादू दीपक साज ले, सहजैं ही मिट जाइ ॥ 63 ॥
दादू सो वेदन नहीं बावरे, आन किये जे जाइ ।
सब दुख भंजन सांइयाँ, ताहि सौं ल्यौ लाइ ॥ 64 ॥
दादू औषध मूली कुछ नहीं, ये सब झूठी बात ।
जे औषध ही जीविये, तो काहे को मर जात ॥ 65 ॥
पतिव्रत
मूल गहै सो निश्चल बैठा, सुख में रहै समाइ ।
डाल पान भ्रमत फिरै, वेदों दिया बहाइ ॥ 66 ॥
सो धक्का सुनहाँ को देवै, घर बाहर काढै ।
दादू सेवक राम का, दरबार न छाड़े ॥ 67 ॥
साहिब का दर छाड़ि कर, सेवक कहीं न जाय ।
दादू बैठा मूल गह, डालों फिरै बलाय ॥ 68 ॥
दादू जब लग मूल न सींचिये, तब लग हरा न होइ ।
सेवा निष्फल सब गई, फिर पछताना सोइ ॥ 69 ॥
दादू सींचे मूल के, सब सींच्या विस्तार ।
दादू सींचे मूल बिन, बाद गई बेगार ॥ 70 ॥
सब आया उस एक में, डाल पान फल फूल ।
दादू पीछे क्या रह्या, जब निज पकड़या मूल ॥ 71 ॥
खेत न निपजै बीज बिन, जल सींचे क्या होइ ।
सब निष्फल दादू राम बिन, जानत है सब कोइ ॥ 72 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
दादू जब मुख मांहि मेलिये, तब सब ही तृप्ता होइ।
मुख बिन मेले आन दिश, तृप्ति न माने कोइ ॥ 73 ॥
जब देव निरंजन पूजिये, तब सब आया उस मांहि।
डाल पान फल फूल सब, दादू न्यारे नांहि ॥ 74 ॥
दादू टीका राम को, दूसर दीजे नांहि।
ज्ञान ध्यान तप भेष पक्ष, सब आये उस मांहि ॥ 75 ॥
साधू राखै राम को, संसारी माया।
संसारी पल्लव गहै, मूल साधू पाया ॥ 76 ॥
आन लगन व्यभिचार
दादू जे कुछ कीजिये, अविगत बिन आराध।
कहबा सुनबा देखबा, करबा सब अपराध ॥ 77 ॥
सब चतुराई देखिए, जे कुछ कीजै आन।
दादू आपा सौंपि सब, पीव को लेहु पिछान ॥ 78 ॥
पतिव्रत
दादू दूजा कुछ नहीं, एक सत्य कर जान।
दादू दूजा क्या करै, जिन एक लिया पहचान ॥ 79 ॥
दादू कोई वांछै मुक्ति फल, कोइ अमरापुर वास।
कोई वांछै परमगति, दादू राम मिलन की प्यास ॥ 80 ॥
तुम हरि हिरदै हेत सौं, प्रगटहु परमानन्द।
दादू देखै नैन भर, तब केता होइ आनन्द ॥ 81 ॥
प्रेम पियाला राम रस, हमको भावै येहि।
रिधि सिधि मांगैं मुक्ति फल, चाहें तिनको देहि ॥ 82 ॥
कोटि वर्ष क्या जीवना, अमर भये क्या होइ।
प्रेम भक्ति रस राम बिन, का दादू जीवन सोइ ॥ 83 ॥
कछू न कीजे कामना, सगुण निर्गुण होहि।
पलट जीव तैं ब्रह्म गति, सब मिलि मानैं मोहि ॥ 84 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
घट अजरावर ह्वै रहै, बन्धन नांही कोइ ।
मुक्ता चौरासी मिटै, दादू संशय सोइ ॥ 85 ॥
लाँबि रस
निकटि निरंजन लाग रहु, जब लग अलख अभेव ।
दादू पीवै राम रस, निहकामी निज सेव ॥ 86 ॥
परिचय पतिव्रत
सालोःय संगति रहै, सामीप्य सन्मुख सोइ ।
सारूप्य सारीखा भया, सायुज्य एकै होइ ॥ 87 ॥
राम रसिक वांछै नहीं, परम पदारथ चार ।
अठसिधि नव निधि का करै, राता सिरजनहार ॥ 88 ॥
आन लग्न व्यभिचार
स्वारथ सेवा कीजिये, ताथैं भला न होइ ।
दादू ऊसर बाहि कर, कोठा भरै न कोइ ॥ 89 ॥
सुत वित मांगैं बावरे, साहिब सी निधि मेलि ।
दादू वे निष्फल गये, जैसे नागर बेलि ॥ 90 ॥
फल कारण सेवा करै, जाचै त्रिभुवन राव ।
दादू सो सेवक नहीं, खेलै अपना दाव ॥ 91 ॥
सहकामी सेवा करैं, मागैं मुग्ध गँवार ।
दादू ऐसे बहुत हैं, फल के भूँचनहार ॥ 92 ॥
स्मरण नाम महात्म
तन मन लै लागा रहै, राता सिरजनहार ।
दादू कुछ मांगैं नहीं, ते बिरला संसार ॥ 93 ॥
दादू सांई को संभालतां, कोटि विघ्न टल जांहि ।
राई मन बैसंधरा, केते काठ जलांहि ॥ 94 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
करतूति कर्म
कर्मै कर्म काटै नहीं, कर्मै कर्म न जाइ।
कर्मै कर्म छूटै नहीं, कर्मै कर्म बँधाइ ॥ 95 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
आठवां निष्कर्मी पतिव्रता काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 8 ॥ साखी 95 ॥
[दादूराम / राम / सत्यराम]
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चितावनी
का
अंग
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अथ चितावनी का अंग ९
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ॥ १ ॥
दादू जे साहिब कौं भावै नहीं, सो हम थैं जनि होइ ।
सतगुरु लाजै आपणा, साध न मानैं कोइ ॥ २ ॥
दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो सब परिहर प्राण ।
मनसा वाचा कर्मणा, जे तूं चतुर सुजाण ॥ ३ ॥
दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो जीव न कीजी रे ।
परिहर विषय विकार सब, अमृत रस पीजी रे ॥ ४ ॥
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श्री दादूवाणी-चितावणी का अंग 9
दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो बाट न बूझी रे ।
सांई सौं सन्मुख रही, इस मन सौं झूझी रे ॥ 5 ॥
दादू अचेत न होइये, चेतन सौं चित लाइ ।
मनवा सूता नींद भर, सांई संग जगाइ ॥ 6 ॥
दादू अचेत न होइये, चेतन सौं करि चित्त ।
यह अनहद जहाँ थें ऊपजै, खोजो तहाँ ही नित्त ॥ 7 ॥
दादू जन ! कुछ चेत कर, सौदा लीजे सार ।
निखर कमाई न छूटणा, अपने जीव विचार ॥ 8 ॥
स्मरण नाम चितावणी
दादू कर सांई की चाकरी, ये हरि नाम न छोड़ ।
जाना है उस देश को, प्रीति पिया सौं जोड़ ॥ 9 ॥
आपा पर सब दूर कर, राम नाम रस लाग ।
दादू अवसर जात है, जाग सकै तो जाग ॥ 10 ॥
बार बार यह तन नहीं, नर नारायण देह ।
दादू बहुरि न पाइये, जन्म अमोलिक येह ॥ 11 ॥
एका एकी राम सौं, कै साधु का संग ।
दादू अनत न जाइये, और काल का अंग ॥ 12 ॥
दादू तन मन के गुण छाड़ि सब, जब होइ नियारा ।
तब अपने नैनहुं देखिये, प्रगट पीव प्यारा ॥ 13 ॥
दादू झांती पाये पसु पिरी, अंदरि सो आहे ।
होणी पाणे बिच्च में, महर न लाहे ॥ 14 ॥
दादू झांती पाये पसु पिरी, हाणे लाइ न बेर ।
साथ सभौंई हल्लियो, पोइ पसंदो केर ॥ 15 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
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श्री दादूवाणी-चितावणी का अंग 9
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
आठवां चितावणी का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 9 ॥ साखी 15 ॥
दादूराम
सत्यराम
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अथ मन का अंग १०
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ॥ 1 ॥
दादू यहु मन बरजि बावरे, घट में राखि घेरि ।
मन हस्ती माता बहै, अंकुश दे दे फेरि ॥ 2 ॥
हस्ती छूटा मन फिरे, क्यों ही बँध्या न जाइ ।
बहुत महावत पच गये, दादू कछु न वशाइ ॥ 3 ॥
जहाँ थैं मन उठ चलै, फेरि तहाँ ही राखि ।
तहँ दादू लै लीन कर, साध कहैं गुरु साखि ॥ 4 ॥
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२. साखी भाग (मध्यम): माया-विवेक, मन, चित्त-शुद्धि, विश्वास व नाम-माहात्म्य
श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
थोरे थोरे हठ किये, रहेगा ल्यौ लाइ।
जब लागा उनमनि सौं, तब मन कहीं न जाइ ॥ 5 ॥
आड़ा दे दे राम को, दादू राखै मन।
साखी दे सुस्थिर करै, सोई साधू जन ॥ 6 ॥
सोई शूर जे मन गहै, निमख न चलने देइ।
जब ही दादू पग भरै, तब ही पकड़ि लेइ ॥ 7 ॥
जेती लहर समंद की, ते ते मनहि मनोरथ मार।
वैसे सब संतोंष कर, गहि आत्म एक विचार ॥ 8 ॥
दादू जे मुख मांहीं बोलतां, श्रवणहुँ सुनतां आइ।
नैनहुँ माँहैं देखतां, सो अंतर उरझाइ ॥ 9 ॥
दादू चुम्बक देख कर, लोहा लागै आइ।
यों मन गुण इन्द्री एक सौं, दादू लीजै लाइ ॥ 10 ॥
मन का आसन जे जीव जानै, तौ ठौर ठौर सब सूझै।
पंचों आनि एक घर राखै, तब अगम निगम सब बूझै ॥ 11 ॥
बैठे सदा एक रस पीवै, निर्वैरी कत जूझै।
आत्माराम मिलै जब दादू, तब अंग न लागै दूजै ॥ 12 ॥
जब लग यहु मन थिर नहीं, तब लग परस न होइ।
दादू मनवा थिर भया, सहज मिलैगा सोइ ॥ 13 ॥
दादू बिन अवलम्बन क्यों रहै, मन चंचल चल जाइ।
सुस्थिर मनवा तो रहै, सुमिरण सेती लाइ ॥ 14 ॥
सतगुरु चरण शरण चलि जांहीं, नित प्रति रहिये तिनकी छांहीं।
मन स्थिर करि लीजै नाम, दादू कहै तहाँ ही राम ॥ 15 ॥
हरि सुमिरण सौं हेत कर, तब मन निश्चल होइ।
दादू बेध्या प्रेम रस, बीष न चालै सोइ ॥ 16 ॥
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श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
जब अंतर उरझ्या एक सौं, तब थाके सकल उपाइ।
दादू निश्चल थिर भया, तब चलि कहीं न जाइ ॥ 17 ॥
दादू कौवा बोहित बैस कर, मंझि समंदाँ जाइ।
उड़ि उड़ि थाका देख तब, निश्चल बैठा आइ ॥ 18 ॥
यहु मन कागद की गुडी, उड़ी चढ़ी आकास।
दादू भीगे प्रेम जल, तब आइ रहे हम पास ॥ 19 ॥
दादू खीला गार का, निश्चल थिर न रहाइ।
दादू पग नहीं साँच के, भ्रमै दहदिशि जाइ ॥ 20 ॥
तब सुख आनन्द आत्मा, जे मन थिर मेरा होइ।
दादू निश्चल राम सौं, जे कर जाने कोइ ॥ 21 ॥
मन निर्मल थिर होत है, राम नाम आनंद।
दादू दर्शन पाइये, पूरण परमानन्द ॥ 22 ॥
विषय विरक्ति
दादू यों फूटे थैं सारा भया, संधे संधि मिलाइ।
बाहुड़ विषय न भूँचिये, तो कबहुँ फूट न जाइ ॥ 23 ॥
दादू यहु मन भूला सो गली, नरक जाणै के घाट।
अब मन अविगत नाथ सों, गुरु दिखाई बाट ॥ 24 ॥
दादू मन सुध साबित आपणा, निश्चल होवे हाथ।
तो इहाँ ही आनन्द है, सदा निरंजन साथ ॥ 25 ॥
जब मन लागै राम सौं, तब अनत काहे को जाइ।
दादू पानी लौन ज्यों, ऐसैं रहै समाइ ॥ 26 ॥
ज्यों जल पैसे दूध में, ज्यों पानी में लौन।
ऐसैं आत्माराम सौं, मन हठ साधै कौन ॥ 27 ॥
मन का मस्तक मूंडिये, काम क्रोध के केश।
दादू विषय विकार सब, सतगुरु के उपदेश ॥ 28 ॥
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श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
करुणा
सो कुछ हम थैं ना भया, जा पर रीझे राम ।
दादू इस संसार में, हम आये बेकाम ॥ 29 ॥
क्या मुँह ले हँस बोलिये, दादू दीजे रोइ ।
जन्म अमोलक आपका, चले अकारथ खोइ ॥ 30 ॥
जा कारण जग जीजिये, सो पद हिरदै नाहिं।
दादू हरि की भक्ति बिना, ध्रिक् जीवन कलि मांहि ॥ 31 ॥
किया मन का भावता, मेटी आज्ञाकार ।
क्या ले मुख दिखलाइये, दादू उस भरतार ॥ 32 ॥
इन्द्री स्वारथ सब किया, मन माँगे सो दीन्ह ।
जा कारण जग सिरजिया, सो दादू कछु न कीन्ह ॥ 33 ॥
किया था इस काम कौं, सेवा कारण साज ।
दादू भूला बंदगी, सज्या न एकौ काज ॥ 34 ॥
दादू विषै विकार सौं, जब लग मन राता ।
तब लग चित्त न आवई, त्रिभुवनपति दाता ॥ 35 ॥
दादू का जाणूँ कब होइगा, हरि सुमिरण इकतार ।
का जाणूँ कब छाड़ि है, यह मन विषय विकार ॥ 36 ॥
मन प्रबोध
बादि हि जन्म गँवाइया, किया बहुत विकार ।
यहु मन सुस्थिर ना भया, जहाँ दादू निज सार ॥ 37 ॥
विषय अतृप्ति
दादू जनि विष पीवै बावरे, दिन दिन बाढै रोग ।
देखत ही मर जाइगा, तज विषया रस भोग ॥ 38 ॥
आपा पर सब दूर कर, राम नाम रस लाग ।
दादू औसर जात है, जाग सके तो जाग ॥ 39 ॥
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श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
मन हरि भावनि
दादू सब कुछ विलसतां, खातां पीतां होइ।
दादू मन का भावता, कहि समझावै कोइ ॥ 40 ॥
दादू मन का भावता, मेरी कहै बलाइ।
साच राम का भावता, दादू कहै सुणि आइ ॥ 41 ॥
दादू ये सब मन का भावता, जे कुछ कीजै आन।
मन गहि राखै एक सौं, दादू साधु सुजान ॥ 42 ॥
जे कुछ भावै राम को, सो तत कह समझाइ।
दादू मन का भावता, सबको कहि बनाइ ॥ 43 ॥
चाणक उपदेश
पैंडे पग चालै नहीं, होइ रह्या गलियार।
राम रथ निबहै नहीं, खाबे को हुशियार ॥ 44 ॥
पर प्रबोध
दादू का परमोधै आन को, आपण बहिया जात।
औरों को अमृत कहै, आपण ही विष खात ॥ 45 ॥
दादू पंचों ये परमोध ले, इन्हीं को उपदेश।
यहु मन अपणा हाथ कर, तो चेला सब देश ॥ 46 ॥
दादू पंचों का मुख मूल है, मुख का मनवां होइ।
यहु मन राखै जतन कर, साधु कहावै सोइ ॥ 47 ॥
दादू जब लग मन के दोइ गुण, तब लग निपना नांहि।
द्वै गुण मन के मिट गये, तब निपनां मिल मांहि ॥ 48 ॥
काचा पाका जब लगै, तब लग अंतर होइ।
काचा पाका दूर कर, दादू एकै सोइ ॥ 49 ॥
मध्य निष्पक्ष
सहज रूप मन का भया, तब द्वै द्वै मिटी तरंग।
ताता शीला सम भया, तब दादू एकै अंग ॥ 50 ॥
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श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
मन
दादू बहुरूपी मन जब लगै, तब लग माया रंग।
जब मन लागा राम सौं, तब दादू एकै अंग ॥ 51 ॥
हीरा मन पर राखिये, तब दूजा चढै न रंग।
दादू यों मन थिर भया, अविनाशी के संग ॥ 52 ॥
सुख दुख सब झांई पड़ै, तब लग काचा मन।
दादू कुछ व्यापै नहीं, तब मन भया रतन ॥ 53 ॥
दादू पाका मन डोलै नहीं, निश्चल रहै समाइ।
काचा मन दह दिशि फिरै, चंचल चहुँ दिशि जाइ ॥ 54 ॥
विरक्तता
सीप सुधा रस ले रहै, पीवै न खारा नीर।
मांहैं मोती नीपजै, दादू बंद शरीर ॥ 55 ॥
मन
दादू मन पंगुल भया, सब गुण गये बिलाइ।
है काया नौ-जोबनी, मन बूढ़ा है जाइ ॥ 56 ॥
दादू कच्छप अपने कर लिये, मन इन्द्री निज ठौर।
नाम निरंजन लाग रहु, प्राणी परिहर और ॥ 57 ॥
जाचक
मन इन्द्री अंधा किया, घट में लहर उठाइ।
साँई सतगुरु छोड़ कर, देख दिवाना जाइ ॥ 58 ॥
दादू कहै राम बिना मन रंक है, जाचै तीनों लोक।
जब मन लागा राम सौं, तब भागे दालिद्र दोष ॥ 59 ॥
इन्द्री के आधीन मन, जीव जंत सब जाचै।
तिणे तिणे के आगे दादू, तिहुं लोक फिर नाचै ॥ 60 ॥
इंद्री अपने वश करै, सो काहे जाचन जाइ।
दादू सुस्थिर आत्मा, आसन बैसै आइ ॥ 61 ॥
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श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
मन मनसा दोनों मिले, तब जीव किया भांड।
पंचों का फेन्या फिरै, माया नचावै रांड ॥ 62 ॥
दादू नकटी आगे नकटा नाचे, नकटी ताल बजावे।
नकटी आगे नकटा गावे, नकटी नकटा भावे ॥ 63 ॥
आन लगन व्यभिचार
पांचों इंद्री भूत हैं, मनवा क्षेत्रपाल।
मनसा देवी पूजिये, दादू तीनों काल ॥ 64 ॥
जीवत लूटै जगत सब, मृतक लूटैं देव।
दादू कहाँ पुकारिये, कर कर मूये सेव ॥ 65 ॥
मन
अग्नि धूम ज्यों नीकलै, देखत सबै बिलाइ।
त्यों मन बिछुटा राम सौं, दह दिश बीखर जाइ ॥ 66 ॥
घर छाड़े जब का गया, मन बहुरि न आया।
दादू अग्नि के धूम ज्यों, खुर खोज न पाया ॥ 67 ॥
सब काहू के होत हैं, तन मन पसरैं जाइ।
ऐसा कोई एक है, उलटा मांहिं समाइ ॥ 68 ॥
क्यों करि उलटा आनिये, पसर गया मन फेरि।
दादू डोरी सहज की, यों आनै घर घेरि ॥ 69 ॥
दादू साधु शब्द सौं मिलि रहै, मन राखै बिलमाइ।
साधु शब्द बिन क्यों रहै, तब ही बीखर जाइ ॥ 70 ॥
चंचल चहुँ दिशि जात है, गुरु बाइक सौं बंध।
दादू संगति साधु की, पारब्रह्म सौं संध ॥ 71 ॥
एक निरंजन नाम सौं, कै साधु संगति मांहि।
दादू मन बिलमाइये, दूजा कोई नांहि ॥ 72 ॥
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श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
तन में मन आवै नहीं, निशदिन बाहर जाइ।
दादू मेरा जीव दुखी, रहै नहीं ल्यौ लाइ ॥ 73 ॥
तन में मन आवै नहीं, चंचल चहुँ दिशि जाइ।
दादू मेरा जीव दुखी, रहै न राम समाइ ॥ 74 ॥
कोटि यत्न कर कर मुये, यहु मन दह दिशि जाइ।
राम नाम रोक्या रहै, नाहीं आन उपाइ ॥ 75 ॥
यहु मन बहु बकबाद सौं, बाय भूत है जाइ।
दादू बहुत न बोलिये, सहजैं रहै समाइ ॥ 76 ॥
स्मरण नाम चितावणी
भूला भौंदू फेर मन, मूरख मुग्ध गँवार।
सुमिर सनेही आपणा, आतम का आधार ॥ 77 ॥
मन माणिक मूरख राखि रे, जण जण हाथ न देहु।
दादू पारिख जौंहरी, राम साधु दोइ लेहु ॥ 78 ॥
दादू माज्यां बिन मानै नहीं, यहु मन हरि की आन।
ज्ञान खड्ग गुरुदेव का, ता संग सदा सुजान ॥ 79 ॥
मन
मन मृगा मारै सदा, ताका मीठा मांस।
दादू खाइबे को हिल्या, तातैं आन उदास ॥ 80 ॥
कह्या हमारा मान मन, पापी परिहर काम।
विषयों का संग छाड़ दे, दादू कह रे राम ॥ 81 ॥
केता कहि समझाइया, मानै नहीं निलज्ज।
मूरख मन समझै नहीं, कीये काज अकज्ज ॥ 82 ॥
सांच
मन ही मंजन कीजिये, दादू दरपण देह।
मांहीं मूरति देखिये, इहि औसर कर लेह ॥ 83 ॥
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श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
आन लगन-व्यभिचार
तब ही कारा होत है, हरि बिन चितवत आन ।
क्या कहिये समझै नहीं, दादू सिखवत ज्ञान ॥ 84 ॥
साच
दादू पाणी धोवैं बावरे, मन का मैल न जाइ ।
मन निर्मल तब होइगा, जब हरि के गुण गाइ ॥ 85 ॥
दादू ध्यान धरे क्या होत है, जो मन नहीं निर्मल होइ ।
तो बग सब ही उद्धरैं, जे इहि विधि सीझै कोइ ॥ 86 ॥
दादू ध्यान धरे क्या होत है, जे मन का मैल न जाइ ।
बग मीनी का ध्यान धर, पसू बिचारे खाइ ॥ 87 ॥
दादू काले थैं धोला भया, दिल दरिया में धोइ ।
मालिक सेती मिलि रह्या, सहजैं निर्मल होइ ॥ 88 ॥
दादू जिसका दर्पण ऊजला, सो दर्शन देखै मांहि ।
जिस की मैली आरसी, सो मुख देखै नांहि ॥ 89 ॥
दादू निर्मल शुद्ध मन, हरि रंग राता होइ ।
दादू कंचन कर लिया, काच कहै नहीं कोइ ॥ 90 ॥
यहु मन अपना थिर नहीं, कर नहीं जानै कोइ ।
दादू निर्मल देव की, सेवा क्यों कर होइ ॥ 91 ॥
दादू यहु मन तीनों लोक में, अरस परस सब होइ ।
देही की रक्षा करैं, हम जनि भीटै कोइ ॥ 92 ॥
दादू देह जतन कर राखिये, मन राख्या नहीं जाइ ।
उत्तम मध्यम वासना, भला बुरा सब खाइ ॥ 93 ॥
दादू हाडौं मुख भव्या, चाम रह्या लिपटाय ।
मांहीं जिभ्या मांस की, ताही सेती खाइ ॥ 94 ॥
दादू नौवों द्वारे नरक के, निशदिन बहै बलाइ ।
शुचि कहाँ लौं कीजिये, राम सुमरि गुण गाइ ॥ 95 ॥
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श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
प्राणी तन मन मिल रह्या, इंद्री सकल विकार ।
दादू ब्रह्मा शूद्र धर, कहाँ रहै आचार ॥ 96 ॥
मन की चपलता
दादू जीवै पलक में, मरतां कल्प बिहाइ ।
दादू यहु मन मसखरा, जनि कोई पतियाइ ॥ 97 ॥
दादू मूवां मन हम जीवित देख्या, जैसे मरघट भूत ।
मूवां पीछे उठ उठ लागै, ऐसा मेरा पूत ॥ 98 ॥
निश्चल करतां जुग गये, चंचल तब ही होहि ।
दादू पसरै पलक में, यहु मन मारै मोहि ॥ 99 ॥
दादू यहु मन मींडका, जल सौं जीवै सोइ ।
दादू यहु मन रिंद है, जनि रु पतीजै कोइ ॥ 100 ॥
मांही सूक्ष्म है रहै, बाहरि पसारै अंग ।
पवन लाग पौढ़ा भया, काला नाग भुवंग ॥ 101 ॥
आशय विश्राम
सपना तब लग देखिये, जब लग चंचल होइ ।
जब निश्चल लागा नाम सौं, तब सपना नांही कोइ ॥ 102 ॥
जागत जहाँ जहाँ मन रहै, सोवत तहँ तहँ जाइ ।
दादू जे जे मन बसै, सोइ सोइ देखै आइ ॥ 103 ॥
दादू जे जे चित बसै, सोई सोई आवै चीति ।
बाहर भीतर देखिये, जाही सेती प्रीति ॥ 104 ॥
सावण हरिया देखिये, मन चित ध्यान लगाइ ।
दादू केते जुग गये, तो भी हऱ्या न जाइ ॥ 105 ॥
जिसकी सुरति जहाँ रहै, तिसका तहँ विश्राम ।
भावै माया मोह में, भावै आतम राम ॥ 106 ॥
जहाँ मन राखै जीवतां, मरतां तिस घर जाइ ।
दादू वासा प्राण का, जहाँ पहली रह्या समाइ ॥ 107 ॥
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