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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 504 में से

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पृष्ठ 122

श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
पतिव्रत
नारी सेवक तब लगै, जब लग सांई पास।
दादू परसै आन को, ताकी कैसी आस ॥ 50 ॥
आन लगन व्यभिचार
दादू नारी पुरुष को, जाने जे वश होइ।
पीव की सेवा ना करै, कामणिगारी सोइ ॥ 51 ॥
करूणा
कीया मन का भावता, मेटी आज्ञाकार।
क्या ले मुख दिखलाइये, दादू उस भर्तार ॥ 52 ॥
आन लग्न व्यभिचार
करामात कलंक है, जाकै हिरदै एक।
अति आनन्द व्यभिचारिणी, जाके खसम अनेक ॥ 53 ॥
दादू पतिव्रता के एक है, व्यभिचारिणी के दोइ।
पतिव्रता व्यभिचारिणी, मेला क्यों कर होइ ॥ 54 ॥
पतिव्रता के एक है, दूजा नांही आन।
व्यभिचारिणी के दोइ हैं, पर घर एक समान ॥ 55 ॥
सुन्दरी सुहाग
दादू पुरुष हमारा एक है, हम नारी बहु अंग।
जे जे जैसी ताहि सौं, खेलैं तिस हि रंग ॥ 56 ॥
पतिव्रत
दादू रहता राखिये, बहता देइ बहाइ।
बहते संग न जाइये, रहते सौं ल्यौ लाइ ॥ 57 ॥
जनि बाझैं काहू कर्म सौं, दूजै आरंभ जाइ।
दादू ऐकै मूल गहि, दूजा देइ बहाइ ॥ 58 ॥
बावें देखि न दाहिने, तन मन सन्मुख राखि।
दादू निर्मल तत्त्व गह, सत्य शब्द यहु साखि ॥ 59 ॥
दादू दूजा नैन न देखिये, श्रवणहुँ सुने न जाइ।
जिह्या आन न बोलिये, अंग न और सुहाइ ॥ 60 ॥

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