सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-मन का अंग 10
तन में मन आवै नहीं, निशदिन बाहर जाइ।
दादू मेरा जीव दुखी, रहै नहीं ल्यौ लाइ ॥ 73 ॥
तन में मन आवै नहीं, चंचल चहुँ दिशि जाइ।
दादू मेरा जीव दुखी, रहै न राम समाइ ॥ 74 ॥
कोटि यत्न कर कर मुये, यहु मन दह दिशि जाइ।
राम नाम रोक्या रहै, नाहीं आन उपाइ ॥ 75 ॥
यहु मन बहु बकबाद सौं, बाय भूत है जाइ।
दादू बहुत न बोलिये, सहजैं रहै समाइ ॥ 76 ॥
स्मरण नाम चितावणी
भूला भौंदू फेर मन, मूरख मुग्ध गँवार।
सुमिर सनेही आपणा, आतम का आधार ॥ 77 ॥
मन माणिक मूरख राखि रे, जण जण हाथ न देहु।
दादू पारिख जौंहरी, राम साधु दोइ लेहु ॥ 78 ॥
दादू माज्यां बिन मानै नहीं, यहु मन हरि की आन।
ज्ञान खड्ग गुरुदेव का, ता संग सदा सुजान ॥ 79 ॥
मन
मन मृगा मारै सदा, ताका मीठा मांस।
दादू खाइबे को हिल्या, तातैं आन उदास ॥ 80 ॥
कह्या हमारा मान मन, पापी परिहर काम।
विषयों का संग छाड़ दे, दादू कह रे राम ॥ 81 ॥
केता कहि समझाइया, मानै नहीं निलज्ज।
मूरख मन समझै नहीं, कीये काज अकज्ज ॥ 82 ॥
सांच
मन ही मंजन कीजिये, दादू दरपण देह।
मांहीं मूरति देखिये, इहि औसर कर लेह ॥ 83 ॥
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