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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 504 में से

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पृष्ठ 125

श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
घट अजरावर ह्वै रहै, बन्धन नांही कोइ ।
मुक्ता चौरासी मिटै, दादू संशय सोइ ॥ 85 ॥
लाँबि रस
निकटि निरंजन लाग रहु, जब लग अलख अभेव ।
दादू पीवै राम रस, निहकामी निज सेव ॥ 86 ॥
परिचय पतिव्रत
सालोःय संगति रहै, सामीप्य सन्मुख सोइ ।
सारूप्य सारीखा भया, सायुज्य एकै होइ ॥ 87 ॥
राम रसिक वांछै नहीं, परम पदारथ चार ।
अठसिधि नव निधि का करै, राता सिरजनहार ॥ 88 ॥
आन लग्न व्यभिचार
स्वारथ सेवा कीजिये, ताथैं भला न होइ ।
दादू ऊसर बाहि कर, कोठा भरै न कोइ ॥ 89 ॥
सुत वित मांगैं बावरे, साहिब सी निधि मेलि ।
दादू वे निष्फल गये, जैसे नागर बेलि ॥ 90 ॥
फल कारण सेवा करै, जाचै त्रिभुवन राव ।
दादू सो सेवक नहीं, खेलै अपना दाव ॥ 91 ॥
सहकामी सेवा करैं, मागैं मुग्ध गँवार ।
दादू ऐसे बहुत हैं, फल के भूँचनहार ॥ 92 ॥
स्मरण नाम महात्म
तन मन लै लागा रहै, राता सिरजनहार ।
दादू कुछ मांगैं नहीं, ते बिरला संसार ॥ 93 ॥
दादू सांई को संभालतां, कोटि विघ्न टल जांहि ।
राई मन बैसंधरा, केते काठ जलांहि ॥ 94 ॥

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