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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 504 में से

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पृष्ठ 131

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
थोरे थोरे हठ किये, रहेगा ल्यौ लाइ।
जब लागा उनमनि सौं, तब मन कहीं न जाइ ॥ 5 ॥
आड़ा दे दे राम को, दादू राखै मन।
साखी दे सुस्थिर करै, सोई साधू जन ॥ 6 ॥
सोई शूर जे मन गहै, निमख न चलने देइ।
जब ही दादू पग भरै, तब ही पकड़ि लेइ ॥ 7 ॥
जेती लहर समंद की, ते ते मनहि मनोरथ मार।
वैसे सब संतोंष कर, गहि आत्म एक विचार ॥ 8 ॥
दादू जे मुख मांहीं बोलतां, श्रवणहुँ सुनतां आइ।
नैनहुँ माँहैं देखतां, सो अंतर उरझाइ ॥ 9 ॥
दादू चुम्बक देख कर, लोहा लागै आइ।
यों मन गुण इन्द्री एक सौं, दादू लीजै लाइ ॥ 10 ॥
मन का आसन जे जीव जानै, तौ ठौर ठौर सब सूझै।
पंचों आनि एक घर राखै, तब अगम निगम सब बूझै ॥ 11 ॥
बैठे सदा एक रस पीवै, निर्वैरी कत जूझै।
आत्माराम मिलै जब दादू, तब अंग न लागै दूजै ॥ 12 ॥
जब लग यहु मन थिर नहीं, तब लग परस न होइ।
दादू मनवा थिर भया, सहज मिलैगा सोइ ॥ 13 ॥
दादू बिन अवलम्बन क्यों रहै, मन चंचल चल जाइ।
सुस्थिर मनवा तो रहै, सुमिरण सेती लाइ ॥ 14 ॥
सतगुरु चरण शरण चलि जांहीं, नित प्रति रहिये तिनकी छांहीं।
मन स्थिर करि लीजै नाम, दादू कहै तहाँ ही राम ॥ 15 ॥
हरि सुमिरण सौं हेत कर, तब मन निश्चल होइ।
दादू बेध्या प्रेम रस, बीष न चालै सोइ ॥ 16 ॥

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