सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 504 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 128

श्री दादूवाणी-चितावणी का अंग 9
दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो बाट न बूझी रे ।
सांई सौं सन्मुख रही, इस मन सौं झूझी रे ॥ 5 ॥
दादू अचेत न होइये, चेतन सौं चित लाइ ।
मनवा सूता नींद भर, सांई संग जगाइ ॥ 6 ॥
दादू अचेत न होइये, चेतन सौं करि चित्त ।
यह अनहद जहाँ थें ऊपजै, खोजो तहाँ ही नित्त ॥ 7 ॥
दादू जन ! कुछ चेत कर, सौदा लीजे सार ।
निखर कमाई न छूटणा, अपने जीव विचार ॥ 8 ॥
स्मरण नाम चितावणी
दादू कर सांई की चाकरी, ये हरि नाम न छोड़ ।
जाना है उस देश को, प्रीति पिया सौं जोड़ ॥ 9 ॥
आपा पर सब दूर कर, राम नाम रस लाग ।
दादू अवसर जात है, जाग सकै तो जाग ॥ 10 ॥
बार बार यह तन नहीं, नर नारायण देह ।
दादू बहुरि न पाइये, जन्म अमोलिक येह ॥ 11 ॥
एका एकी राम सौं, कै साधु का संग ।
दादू अनत न जाइये, और काल का अंग ॥ 12 ॥
दादू तन मन के गुण छाड़ि सब, जब होइ नियारा ।
तब अपने नैनहुं देखिये, प्रगट पीव प्यारा ॥ 13 ॥
दादू झांती पाये पसु पिरी, अंदरि सो आहे ।
होणी पाणे बिच्च में, महर न लाहे ॥ 14 ॥
दादू झांती पाये पसु पिरी, हाणे लाइ न बेर ।
साथ सभौंई हल्लियो, पोइ पसंदो केर ॥ 15 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा

  • 128 -