सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
चरणहुँ अनत न जाइये, सब उलटा मांहि समाइ ।
उलट अपूठा आप में, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 61 ॥
दादू दूजे अंतर होत है, जनि आने मन मांहि ।
तहाँ ले मन को राखिये, जहँ कुछ दूजा नांहि ॥ 62 ॥
भ्रम विध्वंस
भ्रम तिमिर भाजै नहीं, रे जिय आन उपाइ ।
दादू दीपक साज ले, सहजैं ही मिट जाइ ॥ 63 ॥
दादू सो वेदन नहीं बावरे, आन किये जे जाइ ।
सब दुख भंजन सांइयाँ, ताहि सौं ल्यौ लाइ ॥ 64 ॥
दादू औषध मूली कुछ नहीं, ये सब झूठी बात ।
जे औषध ही जीविये, तो काहे को मर जात ॥ 65 ॥
पतिव्रत
मूल गहै सो निश्चल बैठा, सुख में रहै समाइ ।
डाल पान भ्रमत फिरै, वेदों दिया बहाइ ॥ 66 ॥
सो धक्का सुनहाँ को देवै, घर बाहर काढै ।
दादू सेवक राम का, दरबार न छाड़े ॥ 67 ॥
साहिब का दर छाड़ि कर, सेवक कहीं न जाय ।
दादू बैठा मूल गह, डालों फिरै बलाय ॥ 68 ॥
दादू जब लग मूल न सींचिये, तब लग हरा न होइ ।
सेवा निष्फल सब गई, फिर पछताना सोइ ॥ 69 ॥
दादू सींचे मूल के, सब सींच्या विस्तार ।
दादू सींचे मूल बिन, बाद गई बेगार ॥ 70 ॥
सब आया उस एक में, डाल पान फल फूल ।
दादू पीछे क्या रह्या, जब निज पकड़या मूल ॥ 71 ॥
खेत न निपजै बीज बिन, जल सींचे क्या होइ ।
सब निष्फल दादू राम बिन, जानत है सब कोइ ॥ 72 ॥
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